भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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( १८ ) रूप से विद्यमान रहता है। इस सादृश्य को इस दर्शन में मयूराण्डरस न्याय कहते हैं। समस्त विश्व का अधिष्ठान चित् या संवित् है। चित्र-विचित्र, सदा परिवर्तनशील आभास उसी चित् के आविर्भाव मात्र हैं। जो कुछ भी किसी भी रूप में प्रकट है, चाहे प्रमेय के रूप में, चाहे प्रमाताके रूप में, चाहे ज्ञान के रूप में, चाहे ज्ञान के साधन या इन्द्रियों के रूप में, वह सब कुछ उसी परमचित् का 'आभास' मात्र है। 'आभास' का अर्थ है 'आ' ( ईषत् अर्थात् संकुचित रूप में) 'भासः (प्रकाशन) 'कुछ संकुचित रूप में भासन या प्रकाशन' आभास कहलाता है। सभी प्रकार का आविर्भाव परिसीमित होता है। जो कुछ भी विद्यमान है वह आभासों का विन्यास मात्र है। दर्पणबिम्बेयद्वन् नगरग्रामादिचित्रमविभागि । भातिविभागेनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥ विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वत् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ( परमार्थसार : श्लो० १२, १३) । जैसे स्वच्छ दर्पण में चित्र-विचित्र नगर, ग्राम इत्यादि के प्रतिबिम्ब दर्पण से अभिन्न होते हुए भी, परस्पर और दर्पण से भी भिन्न भासित होते हैं, वैसे ही यह जगत् परमशिव के विमल संवित् से अभिन्न होते हुए भी परस्पर और उस संवित् से भी भिन्न भासित होता है। आभास दर्पण में प्रतिबिम्बित आकारों के समान हैं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब उससे भिन्न नहीं किन्तु भिन्न भासित होता है, इसी प्रकार आभास भी शिव से भिन्न नहीं हैं, किन्तु भिन्न भासित होते हैं। जैसे दर्पण में प्रति- बिम्बित नगर, ग्राम, नदी, वृक्ष इत्यादि यद्यपि दर्पण से अभिन्न हैं तथापि उससे भिन्न भासित होते हैं, उसी प्रकार महेश्वर के संवित् में प्रतिबिम्बित जगत् उससे भिन्न नहीं है। इस दर्पण की उपमा में दो अपवाद मननीय हैं। (१) दर्पण में कोई बाह्य पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है। महेश्वर की सार्वभौम चेतना में उसी की ही सृष्टिकल्पना प्रतिबिम्बित होती है, कोई बाह्य पदार्थ नहीं। दर्पण में एक बाह्य प्रकाश के द्वारा ही प्रतिबिम्ब सम्भव है, महेश्वर की सार्वभौम चेतना स्वयं अपना प्रकाश है, वह सब प्रकाशों का प्रकाश है, उसे किसी बाह्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है।