भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 187 में से

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पृष्ठ 29

( १६ )

(२) दर्पण अचेतन है। उसे अपने भीतर के प्रतिबिम्बों का बोध नहीं है, किन्तु महेश्वर तो चेतन है। उसकी चेतना में जो प्रतिबिम्बवत् कल्पनाएं प्रकट होती हैं उनका उसको पूरा बोध रहता है। आभास जो कि पशु या परिच्छिन्न जीवों को बाह्य रूप में प्रतीत होते हैं परम चेतना की कल्पनाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद् विचित्ररचना मुकुरान्तराले । बोधः पुननिजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा ॥ ( प० सा० में योगराज द्वारा उद्धृत पृ० ३६ ) जैसे चित्र-विचित्र पदार्थ दर्पण के भीतर प्रकट होते हैं, वैसे ही परम संवित् में जगत् प्रकट होता हैं। किन्तु परमसंवित् को विमर्शशक्ति के द्वारा उसका बोध रहता है, दर्पण में उस प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का बोध नहीं रहता । समुद्र में तरंग के समान चेतना में आभास उठते हैं। जैसे तरंगों के उत्थान और पतन से, समुद्र को न तो कोई लाभ है, न हानि, वैसे ही आभासों के उत्थान और पतन से परम चेतना को न कोई लाभ है, न हानि । आभास प्रकट और लीन होते रहते हैं, किन्तु उनकी अधिष्ठानरूपी चेतना में कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता । अभास महेश्वर की कल्पनाओं का वहिः प्रक्षेप मात्र हैं। चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ( ई० प्र० वि० पृ० १८५ ) चित्स्वरूप देव अन्तः स्थित पदार्थ समूह को अपनी इच्छा द्वारा बाहर प्रका- शित करता है जैसे योगी (संकल्प द्वारा कोई वस्तु बाहर आभासित कर देता है)। जैसे कुम्भकार मिट्टी लेकर बर्तन बनाता है उस प्रकार महेश्वर सृष्टि नहीं करता। सृष्टि का केवल अर्थ है अन्तः स्थित कल्पनाओं को बाहर आभा- सित कर देना । महेश्वर को इसके लिए किसी बाह्य उपादान की आव- श्यकता नहीं होती। वह अपनी इच्छा द्वारा ही ऐसा करने में समर्थ है। जो पदार्थ महेश्वर के ज्ञान-स्वरूप हैं वे उसकी इच्छा से ज्ञेय के रूप में प्रकट होते हैं, जो उसके अहं स्वरूप हैं वे इदं या विश्व के रूप में प्रकट होते हैं। जीवों को वे बाह्य रूप में आभासित होते हैं ।

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