भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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२ ( १७ ) परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य है'। परावाक्, विमर्श, ऐश्वर्य इत्यादि स्वातंत्र्य के पर्यायवाची शब्द हैं। “सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः” (ई० प्र० वि० १,२०७-८) यह (चिति) वह स्फुरत्ता है जो अपने में विकार-हीन होते हुए सब विकारों की जननी है। यह महासत्ता है, क्योंकि सब कुछ होने में यह स्वतंत्र है। यह देश और काल से परे है। यह परमशिव का हृदय-स्वरूप है। स्वातंत्र्य या माहेश्वर्य का भाव है 'बिना किसी बाह्य उपादान के, बिना किसी बाधा के अपने आप सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य ।' “स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य अविघातः” स्वातंत्र्य का भाव है अपनी इच्छा के अनुसार, उस इच्छा के प्रसर में बिना किसी रुकावट के सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य । स्वातंत्र्यवाद की व्याख्या अभिनवगुप्त ने बहुत सुन्दर शब्दों में इस प्रकार की है। “तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातंत्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूप- तया च अनतिरिक्त्यापि अतिरिक्त्या इव स्वरूपानाच्छादिकया संविद्रूपनान्तरी- यकस्वातंत्र्यमहिम्ना प्रकाश इति अयं स्वातंत्र्यवादः प्रोन्मीलितः (ई० प्र० वि० वि० पृ०६) । “इसलिए प्रकाशविमर्शस्वरूप संविद्रूपी परमशिव जिसका कभी भी अपलाप नहीं किया जा सकता, जो सदा उदित है अपने स्वातंत्र्य के माहात्म्य से ही जो कि संवित् से पृथक् नहीं है रुद्र से लेकर स्थावर तक प्रमाता के रूप में और नील, सुख इत्यादि प्रमेय के रूप में प्रकट होता है। ये प्रमाता और प्रमेय उससे अभिन्न होते हुए भी भिन्न की भांति भासित होते हैं, किन्तु ये उसके स्वरूप को कभी ढक नहीं सकते। इस प्रकार स्वातंत्र्यवाद का प्रस्तुती- करण किया गया है। आभासवाद :- महेश्वर के सर्जन की दृष्टि से यह दर्शन स्वातंत्र्यवाद कहलाता है, उसकी अभिव्यक्ति या आविर्भाव की दृष्टि से यह आभासवाद कहलाता है। जैसे मयूर का सुन्दर रंग-बिरंगा पिच्छकलाप (पंख) उसके अंडे के रस में अविभिन्नरूप से निहित रहता है वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर में अविभिन्न