प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) ये सब इन्द्रियां शक्तियां हैं जो भिन्न इन्द्रियावयवों द्वारा अपना कार्य करती हैं। (ग) पंचतन्मात्राएं-ये भी अहंकार के परिणाम हैं। ये विशेष प्रत्यक्ष के सामान्य तत्त्व हैं :- १. शब्दतन्मात्र, २-स्पर्शतन्मात्र ३-रूपतन्मात्र ४-रसतन्मात्र, ५-गन्ध- तन्मात्र। viii-भौतिक तत्त्व : ३२-३६ : पंचमहाभूत । ये पंचमहाभूत पंचतन्मात्राओं के परिणाम हैं। (१) शब्दतन्मात्र का परिणाम है आकाश (२) स्पर्शतन्मात्र ” ” वायु (३) रूपतन्मात्र ” ” अग्नि या तेज (४) रसतन्मात्र ” ” आप (जल) (५) गन्धतन्मात्र ” ” पृथिवी ३-स्वातंत्र्यवाद और आभासवाद :- इस दर्शन में परमार्थ या परमसत् को चित्, परमशिव या महेश्वर कहते हैं। प्रकृति में दिखलाई देनेवाली प्ररचना और विन्यास के आधार पर साधा- रणतः जो ईश्वरनामक एक आद्य कारण का अनुमान किया जाता है उस अर्थ में इस दर्शन में परमार्थ को महेश्वर नहीं कहते हैं। परम सत् को उसकी इच्छा की निरपेक्ष पूर्ण प्रभुता अथवा स्वातंत्र्य की दृष्टि से महेश्वर कहते हैं। निरपेक्ष, निर्बाध प्रभुता या स्वातंत्र्य एक अन्ध शक्ति नहीं है। यह चित् का स्वभाव है। यह स्वातंत्र्य ही महेश्वर की कल्पना का वेद्यरूपेण उपस्थापन करता है। यह शक्ति स्वतंत्र इसलिए कहलाली है क्योंकि यह अपने से बाह्य किसी उपादान या उपकरण पर आश्रित नहीं है। यह कुछ भी होने या करने में स्वतंत्र और समर्थ है। यह देश, काल कारण इत्यादि से परे है, क्योंकि इनकी अपनी सत्ता उसी के द्वारा है। “चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यम् तदैश्वर्य परमात्मनः” (ई० प्र० वि० १ पृ० २० ३-४) 'महेश्वर की शक्ति चिति कहलाती है। इसका स्वरूप स्वसंवित्ति है। इसे परावाक् भी कहते हैं। यह स्वयं नित्योदित है। यही स्वातंत्र्य है। यही