प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५ ) पुरुष वेदक है, प्रकृति वेद्यमात्र है। प्रकृति अपने गुणों की साम्यावस्था में रहती है। प्रकृति की अवधारणा सांख्य और त्रिक की थोड़ी भिन्न है। सांख्य यह मानता है कि प्रकृति एक है और सभी पूरुषों के लिए सामान्य है। त्रिक यह मानता है कि प्रत्येक पुरुष की प्रकृति भिन्न है। प्रकृति वेद्य की योनि है। प्रकृति के तोन गुण हैं-सत्व, रजस् और तमस्। प्रकृति शिव की सान्ता शक्ति है और सत्व, रजस् और तमस् उनकी ज्ञान, इच्छा और क्रिया शक्ति के स्थूल रूप हैं। पुरुष भोक्ता और प्रकृति भोग्या है। iv-मानस व्यापार के तत्व: १४-१६ बुद्धि, अहंकार और मनस् प्रकृति के विशेष हैं - अन्तः करण, इन्द्रिय और भूत । अन्तःकरण का अर्थ है आन्तरिक साधन । इसमें बुद्धि, अहंकार और मनस् अन्तर्भूत हैं । १. बुद्धि प्रकृति का प्रथम तत्त्व है। यह व्यवसायात्मिका (निश्चयात्मिका) होती हैं। बुद्धि के दो प्रकार के अनुभव हैं : (१) बाह्य जो इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य है, जैसे घट (२) आन्तरिक-संस्कारों द्वारा उद्भूत कल्पनाएं । २. अहंकार-जिसके द्वारा अहं प्रतीति होती है और सब ग्राह्य यां वेद्य अभिमत होते हैं अर्थात् वे अपने माने जाते हैं। अहंकार बुद्धि का परिणाम है। ३. मनस्-यह अहंकार का परिणाम है। यह इन्द्रियों के सहयोग से प्रत्यक्ष का अनुभव करता है और संकल्प-विकल्प करता रहता है। v-vii-प्रत्यक्ष करने के तत्व : १७-३१: (क) ज्ञानेन्द्रियां या बुद्धीन्द्रियां - ये अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्न- लिखित हैं :- १. घ्राणेन्द्रिय २--रसनेन्द्रिय, ३--चक्षुरिन्द्रिय ४--स्पर्शनेन्द्रिय, ५- श्रवणेन्द्रिय । (ख) कर्मेन्द्रियां-ये भी अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्नलिखित हैं:- १. वागिन्द्रिय, २-हस्तेन्द्रिय ३-पादेन्द्रिय ४-पायु (इन्द्रिय) ५-उपस्थ ( इन्द्रिय )