प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिपादित विषयों का संक्षिप्त सार सूत्र १—'स्वतंत्र चिति ही विश्व की सिद्धि का हेतु है' । इस संदर्भ में 'विश्व' का अर्थ है सदाशिव से लेकर पृथिवी तक सब कुछ । 'सिद्धि' का अर्थ है सृष्टि, स्थिति और संहार । चिति ही सृष्टि करती है । माया या प्रकृति सृष्टि का कारण नहीं है । यतः चिति ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण तीनों का उत्स या मूल हैं, अतः कोई प्रमाण अपने मूल को जिसके द्वारा वह स्वयं जन्य है सिद्ध नहीं कर सकता । सिद्धि का अर्थ भोग या मोक्ष भी हो सकता है । इनका भी हेतु स्वतंत्र चिति ही है । हेतु का अर्थ केवल कारण नहीं है, साधन भी है । चिति ही वह साधन है जिसके द्वारा व्यक्ति परम चेतना की ओर आरोहण करता है जहां कि उसकी चेतना का भागवती चेतना से तादात्म्य हो जाता है । चिति का एकवचन में प्रयोग यह दर्शाने के लिए हुआ है कि वह देश और काल से अपरिच्छिन्न है । इसे 'स्वतंत्र' यह बतलाने के लिए कहा गया है कि यह बिना माया इत्यादि की सहायता के स्वयं विश्व की सृष्टि में समर्थ है । इस प्रकार चिति ही विश्व का हेतु शिवत्व-योजना का उपाय और परमार्थ है । इस सूत्र में समस्त ग्रन्थ का सार निहित है । सूत्र २- अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति ( आधार ) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है । वह अपनी ही इच्छा से विश्व को प्रकट करती है, किसी बाहरी कारण या प्रेरणा से नहीं । विश्व उसमें अव्यक्त रूप से रहता ही है, वह उसे व्यक्त करती है । सूत्र ३-विश्व ( परस्पर ) अनुरूप ग्राह्य और ग्राहक के भेद से नाना प्रकार का है । प्रमाता और प्रमेय के भेद से विश्व में नानात्व है । संक्षेप में यह भेद निम्नप्रकार का है :—