प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) १. सदाशिव तत्त्व—इसमें 'अहं' परामर्श प्रधान रहता है, 'इदं' या विश्व का परामर्श एक प्रारम्भिक अवस्था में रहता है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह मंत्रमहेश्वर कहलाता है। वह सदाशिव द्वारा निदेशित होता है। उसने सदाशिव तत्व का साक्षात्कार कर लिया है। उसका परामर्श होता है 'अहमिदम्'। इस अवस्था में 'इदं' 'अहं' से पूर्णतः भिन्न नहीं होता। २ ईश्वरतत्त्व—इसमें 'अहं' और 'इदं' दोनों का परामर्श तुल्यरूप से स्पष्ट होता है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह मंत्रेश्वर कहलाता है। इस अवस्था में विश्व का परामर्श स्पष्ट होता है, किन्तु उसका अहं से तादात्म्य रहता है। मंत्रेश्वर ईश्वर द्वारा निदेशित होता है। ३. विद्यातत्त्व—इसमें 'इदं' और 'अहं' दोनों तुल्यरूप से भिन्न प्रतीत होते हैं। इसमें नानात्व का अनुभव होता है किन्तु उसमें एकत्व की भावना विद्यमान रहती है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह 'मंत्र' कहलाता है। उसका निदेशक अनन्तभट्टारक होता है। ४. विज्ञानाकल—इसका स्तर शुद्धविद्या से नीचे और माया से ऊपर है। सकल और प्रलयाकल उसके अनुभव के क्षेत्र हैं। ५. प्रलयकेवली या प्रलयाकल—माया में स्थित प्रमाता प्रलयाकल कह- लाता है। न तो उसे 'अहं' की ही स्पष्ट चेतना होती है, न 'इदं' की ही। उसकी चेतना शून्यप्राय की होती है। ६. सकल—माया से लेकर पृथ्वी तक के प्रमाता सकल कहलाते हैं। सकल का अनुभव नानात्व का रहता है। साधारण जीव सब सकल होते हैं। शिव इन सबसे परे है। उसमें शाश्वत आनन्द है। उसका सदाशिव से लेकर पृथ्वी तक सबसे तादात्म्य है। वस्तुतः शिव ही इन सब अवस्थाओं में स्फुरित होता है। सूत्र ४—वह जीव भी जिसमें चिति संकुचित हो गई है संकुचित रूप में विश्वमय ही है। चित् या शिव ही संकोच को धारण कर संकुचित प्रमाता और संकुचित विश्व बन जाता है। सूत्र ५—चिति चेतनपद से उतरकर चित्त बन जाती है, क्योंकि चेत्य के अनुकूल वह संकुचित हो जाती है।