भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

प्रत्यभिज्ञाहृदय ४५ अत्र साक्षी । अन्यस्य तु मायाप्रकृत्यादेः चित्प्रकाशभिन्नस्य अप्रकाश- मानत्वेन असत्त्वात् न क्वचिदपि हेतुत्वम्; प्रकाशमानत्वे तु प्रकाशै- कात्म्यात् प्रकाशरूपा चितिरेव हेतुः; न त्वसौ कश्चित् । अत एव देशकालाकारा एतत्स्सृष्टा एतदनुप्राणिताश्च नैतत्स्वरूपं भेत्तुमलम्;- इति व्यापक-नित्योदित-परिपूर्णरूपा इयम्-इत्यर्थलभ्यमेव एतत् । ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित्; अभेदे च कथं हेतुहेतुमद्भावः ? उच्यते । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति,-इत्येतावत्परमार्थोऽयं कार्यकार- रणभावः । यतश्च इयमेव प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेयमयस्य विश्वस्य इस पराचिति के ही प्रसरण से जगत् का अस्तित्व और स्थिति होती है इसका प्रसरण जब समाप्त हो जाता है तब जगत् का संहार हो जाता है । इसमें अपना अनुभव ही साक्षी है । अन्य किसी वस्तु का, माया, प्रकृति इत्यादि का जो चित्प्रकाश से भिन्न है, अतः अप्रकाशित होने के कारण जिसका अस्तित्व ही नहीं है, कभी भी विश्व की सिद्धि में कारणत्व नहीं हो सकता । यदि कहो कि माया, प्रकृति इत्यादि भी तो प्रकाशित है, तो वे प्रकाश से अभिन्न हो जायँगी । अतः प्रकाशरूपी चिति (विश्वसिद्धि में) हेतु है, न कि माया इत्यादि कोई वस्तु । अतएव देश, काल और आकार जिनकी सृष्टि इसी (चिति) से ही हुई है और जो इसी (चिति) से अनुप्राणित हैं इसके स्वरूप के भेदन करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि यह (चिति) व्यापक, नित्य उदित है और (अपने आप में) परिपूर्ण है । (सब सूत्र के) अर्थ से यही समझना चाहिए । यह शंका की जा सकती है (ननु) कि (यदि चित् ही सब कुछ है तब जगत् तो चित् से भिन्न होने के कारण कुछ नहीं है (अर्थात् इसका कोई अस्तित्व नहीं है) यदि (चित् और जगत् में) अभेद माना जाय, तो कार्य-कारण-भाव कैसे बन सकता है ? *

  • कार्य-कारण-भाव में कार्य कारण से भिन्न समझा जाता है । चित् जगत् का कारण माना गया है, किन्तु यदि चित् और जगत् में अभेद है, तो जगत् चित् का कार्य कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्य को तो कारण से भिन्न होना चाहिए ।