प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय सिद्धौ-प्रकाशने हेतुः, ततोऽस्याः स्वतन्त्रापरिच्छिन्नस्वप्रकाशरूपायाः सिद्धौ अभिनवार्थप्रकाशनरूपं न प्रमाणवराकमुपयुक्तम् उपपन्नं वा। तदुक्तं त्रिकसारे 'स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते । पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथेयं बैन्दवी कला ॥' इति । यतश्च इयं विश्वस्य सिद्धौ पराद्वयसामरस्यापादनात्मनि च संहारे हेतुः, तत एव स्वतन्त्रा। प्रत्यभिज्ञातस्वातन्त्र्या सती, भोग- (उत्तर में कहा जाता है कि) स्वच्छ और स्वतंत्र होने के कारण भगवती चित् ही नाना प्रकार के अनन्त जगत् के रूप में उल्लसित होती है। कार्य कारण भाव यहाँ पर परमार्थ ❊ में प्रयुक्त हुआ है और केवल इतना ही उसका यहाँ तात्पर्य है। यतः चित् ही प्रमातृ २४-प्रमाण २५-प्रमेय २६-मय विश्व की सिद्धि अर्थात् प्रकाशन में हेतु है अतः इस स्वतंत्र अपरिच्छिन्न (असीम), स्वप्रका- शरूप चित् को सिद्ध करने में बेचारा प्रमाण जिसका नये नये अर्थों के प्रकाशन करने का स्वभाव है न तो उपयुक्त ही है, न उपपन्न ही † यह बात त्रिकसार में (इस प्रकार) कही गयी है । जैसे जब कोई अपने सिर की छाया को अपने पैर से लांघना चाहता है, तो सिर कभी भी पैर के स्थान पर नहीं होता, वैसे ही ( वैसा ही तथ्य ) इस वैन्दवी कला २७ (के विषय में है) यह (चिति) विश्व की सिद्धि में तथा परम अद्वय (चित्) से समरस २८ कर देने वाले संहार में भी हेतु है, इसलिए यह स्वतंत्र है २९ है। [यतः चिति विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों का हेतु है अतः वह स्वतंत्र है।] जब इसके स्वातन्त्र्य की पहचान हो जाती है, तो यह चित शक्ति भोगमोक्ष- ❊ परमार्थ में कार्य-कारण भाव में क्रम नहीं है। क्रम में ही कार्य कारण से भिन्न होता है। चित् का स्फुरण ही जगत् का उन्मेष है। दोनों का यौगपद्य (एक साथ होना) है। क्रम नहीं है। † कहने का तात्पर्य यह है कि प्रमाण का तो कार्य है किसी नये अर्थ को सिद्ध करना। जो सदा वर्तमान है उसे प्रमाण क्या सिद्ध करेगा ?