प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यभिज्ञाहृदय ४७ मोक्षस्वरूपाणां विश्वसिद्धीनां हेतुः ।-इति आवृत्त्या व्याख्येयम् । अपि च 'विश्वं'-नील-सुख-देह-प्राणादि; तस्य या 'सिद्धिः'- प्रमाणोपारोहक्रमेण विमर्शमयप्रमात्रावेशः, सैव 'हेतुः'-परिज्ञाने उपायो यस्याः । अनेन च सुखोपायत्वमुक्तम् । यदुक्तं श्रीविज्ञान- भट्टारके 'ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं संबन्धे सावधानता ॥' इति । 'चितिः'-इति एकवचनं देशकालाद्यनवच्छिन्नताम् अभिदधत् समस्तभेदवादानाम् अवास्तवतां व्यनक्ति । 'स्वतन्त्र'-शब्दो रूपी १० विश्वसिद्धि का भी हेतु होती है। इस दूसरे प्रकार से भी इसकी व्याख्या कर लेनी चाहिए । ( अब हेतु शब्द को उपाय के अर्थ में लेकर व्याख्या करते हैं ) विश्व का अर्थ नील (इत्यादि बाह्य पदार्थ), सुख (इत्यादि आन्तरिक संवेदन ), देह, प्राण ( इत्यादि परिमित प्रमाता ) उसकी जो सिद्धि अर्थात् प्रमाण के आरोहक्रम ११ से विमर्शमय प्रमाता में आवेश है, वही सिद्धि उस चिति शक्ति के पहिचान में हेतु अर्थात् उपाय है । उपाय यहां आसान उपाय के अर्थ में कहा गया है जैसा कि श्री विज्ञानभट्टारक में कहा गया है । (विज्ञान भैरव श्लोक १०६ ) “ज्ञेय और ज्ञाता का ज्ञान सभी देहधारियों के लिए सामान्य है, किन्तु योगियों की विशेषता यह है कि वह इस संबंध के विषय में सजग रहता है ।” ( अर्थात् वह यह समझता है कि ग्राह्य या ज्ञेय सर्वदा ग्राहक या ज्ञाता से सम्बद्ध रहता है । बिना ज्ञाता से सम्बद्ध हुए कोई ज्ञेय हो ही नहीं सकता जहां से ज्ञाता का उदय होता है और जिसमें उसकी विश्रान्ति होती है उसका योगी को सदा भान रहता है ) (सूत्र में) चिति जो एकवचन में है यह बतलाते हुए कि वह देश, काल इत्यादि से परिसीमित नहीं है समस्त भेदवादों की अवास्तविकता को व्यक्त करती है ।