प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय ब्रह्मवादवैलक्षण्यम् आचक्षाणः चितो माहैश्वर्यसारतां ब्रूते । ‘विश्व’- इत्यादिपदम् अशेषशक्तित्वं, सर्वकारणत्वं, सुखोपायत्वं महाफलं च आह ॥ १ ॥ ननु विश्वस्य यदि चितिः हेतुः, तत् अस्या उपादानाद्यपेक्षायां भेदवादापरित्यागः स्यात्-इत्याशङ्क्य आह स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥ ‘स्वेच्छया’ न तु ब्रह्मादिवत् अन्येच्छया तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया,-एवं हि प्रागुक्तस्वातन्त्र्यहान्या चित्त्वमेव न घटेत-‘स्व भित्तौ’, न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं ‘विश्वं’ दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव ‘उन्मीलयति’ । उन्मीलनं च अव- (सूत्र में) स्वतंत्र शब्द ब्रह्मवाद३२ से विलक्षणता बतलाते हुए यह भी बतलाता है कि चित् का सार है महान् ऐश्वर्य । (सूत्र में) विश्व इत्यादि पद यह बतलाते हैं कि चिति की शक्ति अपरि- सीमित है, वही सबका कारण है, वही (उसी का परिज्ञान) (मोक्ष का) सरल उपाय है, और वही जीवन का परम फल है । यहाँ यह शंका उठती है (ननु) कि यदि चिति विश्व सिद्धि का हेतु है तो उसको उपादान इत्यादि की आवश्यकता होने से भेदवाद का परित्याग नहीं हो सकता । ऐसी शंका करके (उत्तर में) कहते हैं । सूत्र २-(अनुवाद) अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति (आधार) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है । भाष्य (अनु०) स्वेच्छया अपनी ही इच्छा से, दूसरे (मायाइ०) की इच्छा से नहीं जैसा कि ब्रह्मवादी (वेदान्ती) मानता है, उसी (इच्छा ही) के द्वारा, न कि उपादान (वस्तु तैयार करने की सामग्री) आदि के भरोसे । ऐसा होने पर (अर्थात् उपादान कारण आदि के भरोसा करने पर) पहले कहे हुए (प्रथम सूत्र में कहे हुए) स्वातंत्र्य के अभावके कारण उसका चित् होना ही (चित्त्वं) नहीं सम्भव हो सकता (अर्थात् चित् और स्वातंत्र्य अवियोज्य हैं ।) 'स्वभित्तौ' अपनी ही भित्ति पर, अपने ही आधार पर और कहीं नहीं । पहले (प्रथम सूत्र में) निश्चित रूप से बतलाये हुए विश्व को दर्पण में नगर के समान अभिन्न होते हुए भी भिन्न के समान व्यक्त करती है ।३३