प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यभिज्ञाहृदय ५३ अयं च अत्राशयः--ग्राहकोऽपि अयं प्रकाशैकात्म्येन उक्तागम- युक्त्या च विश्वशरीरशिवैकरूप एव, केवलं तन्मायाशक्त्या अन- भिव्यक्तस्वरूपत्वात् संकुचित इव आभाति; संकोचोऽपि विचार्यमाणः चिदैकात्म्येन प्रथमानत्वात् चिन्मय एव, अन्यथा तु न किंचित् ।-इति सर्वो ग्राहको विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव । तदुक्तं मयैव 'अख्यातिर्यदि न ख्याति ख्यातिरेवावशिष्यते । ख्याति चेत् ख्यातिरूपत्वात् ख्यातिरेवावशिष्यते ॥' इति । अनेनैव आशयेन श्रीस्पन्दशास्त्रेषु 'यस्मात्सर्वमयो जीवः.........।' इत्युपक्रम्य 'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ॥' (इस कथन का) यहाँ यह अभिप्राय है- ग्राहक या प्रमाता उस शिव से जिसका विश्व शरीर है अभिन्न है क्योंकि ग्राहक (शिवके समान) प्रकाश स्वरूप है और क्योंकि पूर्वोक्त आगम ने (इसके लिए) युक्ति (तर्क) भी दी है। केवल उसकी (शिव की) माया शक्ति के कारण वह (ग्राहक) अपने स्वरूप के अभिव्यक्त न होने के कारण संकुचित जैसा लगता है। विचार करने पर (यह स्पष्ट हो जायगा) कि संकोच भी चिन्मय अर्थात् चिद्रूप होने के कारण ही वह प्रथमान अर्थात् प्रकाशित होता है, नहीं तो संकोच कुछ भी नहीं रह जायगा। (अर्थात् यदि संकोच प्रकाशित नहीं होता, तो वह कुछ नहीं है; यदि प्रकाशित होता है तो वह चिद्रूप ही हैं) इस प्रकार सभी ग्राहक वह पूज्य शिव ही हैं जिसका विश्व शरीर है। यह मैंने ही (अन्यत्र) कहा है। 'यदि यह कहा जाय कि अख्याति (अज्ञान) वह है जो प्रकाशित नहीं होती तो फिर ख्याति (ज्ञान) ही बच रहती है (क्योंकि जो प्रकाशित ही नहीं होता वह कुछ नहीं है)। यदि यह कहा जाय कि अख्याति प्रकाशित होती है तब तो (और भी) ख्यातिरूप होने के कारण (अर्थात् प्रकाशित होने के कारण) ख्याति ही बच रहती है। (अर्थात् ख्याति (ज्ञान) जो चिद्रूप है वही सब कुछ है। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।) इसी आशय