भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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इत्यादिना शिवजीवयोरभेद एव उक्तः । एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः, एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव च बन्धः;-इति भविष्यति एव एतत् ॥ ४ ॥ ननु ग्राहकोऽयं विकल्पमयः, विकल्पनं च चित्तहेतुकं; सति च चित्ते, कथमस्य शिवात्मकत्वम् ?-इति शङ्कित्वा चित्तमेव निर्णेतुमाह चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् ॥५॥ न चित्तं नाम अन्यत् किंचित्, अपि तु सैव भगवती तत् । तथा हि सा स्वं स्वरूपं गोपयित्वा यदा संकोचं गृह्णाति, तदा द्वयी गतिः ; कदाचित् उल्लसितमपि संकोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति, कदाचित् संकोचप्रधानतया । चित्प्राधान्यपक्षे सहजे, प्रकाशमात्र- प्रधानत्वे विज्ञानाकलता; प्रकाशपरामर्शप्रधानत्वे तु विद्याप्रमा- से स्पन्दशास्त्र में “क्यों कि जीव विश्वमय है (अर्थात् विश्व से अभिन्न है) यहां से प्रारम्भ करके, “इस कारण चाहे शब्द हो, चाहे अर्थ हो, चाहे चिन्तन हो- कोई भी ऐसी अवस्था नहीं है जो शिव नहीं है”४८ इससे उपसंहार करते हुए शिव और जीव का अभेद ही कहा है । इसी तत्त्व का ज्ञान मुक्ति हैं, इसी तत्त्व का अज्ञान बन्धन है । यह बात आगे स्पष्ट होगी ही ॥४॥ यहां एक प्रश्न उठता है--ग्राहक (ज्ञाता) विकल्पमय ४९ है, विकल्प की क्रिया चित्त के कारण होती है, तो चित्त के रहते हुए ज्ञाता शिवरूप कैसे हो सकता है (क्योंकि शिव तो निर्विकल्प है) । ऐसी शंका करके चित्त का ही निश्चित रूप बतलाने के लिए कहते हैं । सूत्र ५-चिति (परा संविद्, समष्टि संविद्) ही चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर का चित्त (व्यष्टिगत संविद्) बन जाती है क्योंकि चेत्य (चेतनाद्वाराग्राह्यपदार्थ) के अनुकूल वह संकुचित हो जाती है । भाष्य-चित्त और कुछ नहीं है; चिति ही चित्त है । जब वह अपने स्वरूप को छिपाकर संकोच ग्रहण करती है, तो दो गति होती है- कभी जो संकोच प्रारम्भ हो रहा है उसे गौण करके चित् की प्रधानता के रूप में प्रका- शित होती है, कभी संकोच की प्रधानता के रूप में (प्रकाशित होती है) । जब चित् की प्रधानता स्वाभाविक रूप में प्रकट होती है, तो प्रकाशमात्र (अर्थात्- विमर्श रहित) प्रधान होने पर विज्ञानाकल ५० की अवस्था होती है और