प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय इत्यादिना स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रिया-मायाशक्ति- रूपा पशुदशायां संकोचप्रकर्षात् सत्त्व-रजस्तमःस्वभावचित्तात्मतया स्फुरति; इति श्रीप्रत्यभिज्ञायामुक्तम् । अत एव श्रीतत्त्वगर्भस्तोत्रे विकल्पदशायामपि तात्त्विकस्वरूपसद्भावात् तदनुसरणाभिप्रायेण उक्तम् 'अत एव तु ये केचित्परमार्थानुसारिणः । तेषां तत्र स्वरूपस्य स्वज्योतिष्ट्वं न लुप्यते ॥' इति ॥ ५ ॥ चित्तमेव तु मायाप्रमातुः स्वरूपम्-इत्याह तन्मयो मायाप्रमाता ॥ ६ ॥ इसी प्रकार श्री प्रत्यभिज्ञा (उत्पलदेव की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा १.४.३) में कहा है—पति (शिव) की जो ज्ञान, क्रिया और तीसरी माया शक्तियाँ हैं वे ही अपने अंगरूप पदार्थों के विषय में पशुदशा में (अणुमें, जीव में) क्रमशः सत्त्व, रजस् और तमस् बन जाती हैं। इससे और इसी प्रकार की अन्य उक्तियों से (यह स्पष्ट है कि) चिति शक्ति ही जिसका स्वातंत्र्य स्वरूप है, जो ज्ञान, क्रिया और माया शक्ति रूप ५५ है पशु (जीव) की दशा में संकोच के बढ़ जाने के कारण सत्व, रज और तम् ५६ के स्वभाव वाले चित्त के रूप में प्रकट होती है। विकल्पदशा ५७ में भी जीव अर्थात् व्यष्टि की अन्तश्चेतना तात्त्विक स्वरूप में ही रहती है इसीलिए उसके (तात्त्विक स्वरूप के) अनु- सरण के अभिप्राय से श्री गर्भस्तोत्र में कहा है :- अतएव जो कोई परमार्थ का अनुसरण करते हैं उनके लिए स्वरूप के (अर्थात् आत्मा के वास्तविक स्वभाव का) स्वप्रकाशत्व का लोप नहीं होता। चित्त ही मायाप्रमाता का स्वरूप है, इसलिए कहते हैं। सूत्र ६—तन्मयोमायाप्रमाता ॥ ६ ॥ अर्थात् मायाप्रमाता ५८ तत् (चित्त) मय होता है। (माया से आवृत्त जो अणु है वह चित्त-प्रधान है)।