भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

प्रत्यभिज्ञाहृदय ५७ देहप्राणपदं तावत् चित्तप्रधानमेव; शून्यभूमिरपि चित्तसंस्कार- वत्येव; अन्यथा ततो व्युत्थितस्य स्वकर्तव्यानुधावनाभावः स्यात्;- इति चित्तमय एव मायीयः प्रमाता। अमुनैव आशयेन शिवसूत्रेषु वस्तुवृत्तानुसारेण 'चैतन्यमात्मा' (१-१) इत्यभिधाय, मायाप्रमातृलक्षणावसरे पुनः 'चित्तमात्मा' (३-१) इत्युक्तम् ॥६॥ अस्यैव सम्यक् स्वरूपज्ञानात् यतो मुक्तिः, असम्यक् तु संसारः, ततः तिलश एतत्स्वरूपं निर्भङ्क्तुमाह भाष्य—देह और प्राण के क्षेत्र में चित्त प्रधान है ही, शून्य-भूमि में भी (अर्थात् जिस अवस्था में केवल शून्य का ही भान होता है) उसमें भी चित्त का संस्कार रहता हैं। नहीं तो शून्य के अनुभव के बाद व्युत्थानदशा में आने में अपने कर्त्तव्य का अनुसरण सम्भव न होता (अर्थात् शून्य के अनुभव की अवस्था में यदि चित्त का संस्कार न बना रहता, यदि उस दशा में चित्त निर्मूल हो जाता तो शून्य के अनुभव से उठने के बाद फिर अपने कर्त्तव्य का ही पता न लगता। शून्य दशा में भी यद्यपि चित्त क्रियाशील नहीं रहता तथापि उसके संस्कार वर्तमान रहते हैं। उन्हीं संस्कारों के कारण ही हम शून्य के अनुभव की अवस्था से फिर व्यवहार दशा में आने पर अपने कार्यों के सूत्र को पकड़ लेते हैं)। इसलिए मायायुक्त प्रमाता चित्तमय ही है। इसी आशय से शिवसूत्रों में वस्तुस्थिति को बतलाने के समय चैतन्यमात्मा (अर्थात् चैतन्य ही—समष्टि चित्—ही आत्मा है (१-१) यह कहकर माया प्रमाता के लक्षण को बतलाने के समय चित्तमात्मा (३०१) यह कहा है। (अर्थात् माया प्रमाता की दृष्टि से चित्त—व्यष्टि चेतना—ही आत्मा है) ॥ ६ ॥ यतः इसी (आत्मा) के स्वरूप के सम्यक् ज्ञान से मुक्ति होती है और असम्यक् ज्ञान से संसरण (नाना योनियों में भ्रमण) होता है, अतः उनके स्वरूप का एक एक करके विश्लेषण करने के अभिप्राय से कहते हैं—