प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंष्ठुवम् अधिशयाना, नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । तत्रापि च पलाश- पर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्रात् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्ति- ब्रह्माश्चयमध्यमनाडीरूपतया प्राधान्येन स्थिता; तत एव सर्ववृत्तीनाम् उदयात्, तत्रैव च विश्रामात् । एवंभूतापि एषा पशूनां निमीलित- स्वरूपैव स्थिता । यदा तु उक्तयुक्तिक्रमेण सर्वान्तरतमत्वे मध्यभूता संविद्भगवती विकसति, यदि वा वक्ष्यमाणक्रमेण मध्यभूता ब्रह्मनाडी विकसति, तदा 'तद्विकासात् चिदानन्दस्य' उक्तरूपस्य 'लाभ:'-प्राप्ति- र्भवति । ततश्च प्रागुक्ता जीवन्मुक्तिः ॥ १७ ॥ मध्यविकासे युक्तिमाह विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकासवाहच्छेदाद्यन्त- कोटिनिभालनादय इहोपायाः ॥ १८ ॥ 'इह' मध्यशक्तिविकासे 'विकल्पक्षयादय उपायाः' । प्रागुपदिष्टपञ्च- हुई सहस्र नाड़ी के मार्ग का अवलम्बन किया । वहाँ भी (अर्थात् व्यक्ति में भी) वह मुख्यतः ब्रह्मरन्ध्र १४२ से अधोवक्त्र १४३ तक पलाशपत्र १४४ की मध्य तन्तुके समान मुख्यतः मध्यम नाड़ी १४५ के रूप में स्थित है जिसका आश्रय प्राणशक्ति रूपी ब्रह्म है। (उसको मध्यमनाड़ी इसलिए कहते हैं) क्योंकि सभी चित्त- वृत्तियों का वहीं से उदय होता है और वहीं लय होता है । इस प्रकार होते हुए भी वह पशुओं के लिए (अर्थात् अज्ञानी जीवों के लिए) अपने स्वरूप को छिपाये हुए स्थित है। जब कि सबके अन्तरतम में मध्यरूप से रहनेवाली भगवती संवित् का पहले कहे हुए युक्ति के क्रम से (पंचकृत्य १४६ के अभ्यास से) विकास होता है अथवा आगे बतलाये जानेवाले क्रम से जब मध्यरूपी ब्रह्म- नाड़ी १४७ का विकास १४८ होता है, तब उसके विकास से उक्त रूप चिदानन्द का लाभ अर्थात् प्राप्ति होती है। उसके अनन्तर पूर्ववर्णित जीवन्मुक्ति होती है। मध्य के विकास में उपाय बतलाते हैं :- सूत्र १८-विकल्प-क्षय, शक्ति का संकोच और विकास, बाहों का ध्वंस, आदि और अन्त कोटियों (अन्तों) का अभ्यास इत्यादि यहाँ (मध्य के विकास में) उपाय हैं। भाष्य-इह : यहाँ अर्थात् मध्यशक्ति के विकास में विकल्पक्षय आदि उपाय हैं। यह पहले कहा ही जा चुका है कि संविद् (चेतना) जो कि सब