प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ प्रत्यभिज्ञाहृदय विधकृत्यकारित्वाद्यनुसरणेन सर्वमध्यभूतायाः संविदो विकासो जायते- इति अभिहितप्रायम् । उपायान्तरम् अपि तु उच्यते;-प्राणायाम- मुद्राबन्धादिसमस्तयन्त्रणातंत्रत्रोटनेन सुखोपायमेव, हृदये निहितचित्तः, उक्तयुक्त्या स्वस्थितिप्रतिबन्धकं विकल्पम् अकिंचिच्चिन्तकत्वेन प्रशमयन्, अविकल्पपरामर्शेन देहाद्यकलुषस्वचित्प्रमातृतानिभालनप्रवणः, अचिरादेव उन्मिषद्विकासां तुर्य-तुर्यातीतसमावेशदशाम् आसादयति तथोक्तम् 'विकल्पहानेनैकाग्र्यात्क्रमेणेश्वरतापदम् ।' इति श्रीप्रत्यभिज्ञायाम्। श्रीस्पन्देऽपि 'यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥' कुछ का केन्द्र है—का विकास पहले बतलाये हुए पाँच प्रकार के कृत्यों के करने के अनुसरण से होता है । अब दूसरा उपाय भी बतलाया जा रहा है । एक सरल उपाय है जिसके द्वारा प्राणायाम१४९, मुद्रा१५०, बन्ध१५१ इत्यादि कष्टकर साधनाओं से छुटकारा पाया जा सकता है । (वह उपाय यह है)—जब साधक अपने चित्त को हृदय१५२ (संविद्) में स्थापित अर्थात् एकाग्र करके, बतलाये हुए उपाय से, अपनी वास्तविक दशा के बाधक विकल्प१५३ को, बिना अन्य किसी प्रकार के चिन्तन के, रोक कर, अविकल्प के आश्रय के द्वारा, जो देह इत्यादि से दूषित नहीं है ऐसी अपनी पारमार्थिक चेतना को प्रमाता (वास्तविक ज्ञाता) समझने का अभ्यास कर लेता है, तब वह शीघ्र ही विकास की ओर उन्मुख हुई तुर्य१५४ और तुर्यातीत१५५ में समावेश की दशा को प्राप्त कर लेता है जैसा कि श्री ईश्वर प्रत्यभिज्ञा में कहा गया है :— “साधक विकल्प के त्याग से और एकाग्रता से, क्रमशः ईश्वरता पद को प्राप्त कर लेता है (दे० ई० प्र० च० अ०, प्र० आ०, का० ११, ।” श्री स्पन्द में भी कहा है :— “जब (मानसिक) क्षोभ लीन हो जाता है, तब परम पद की प्राप्ति होती है” (दे० स्पन्द का० नि० १ का० ६)