प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइति। श्रीज्ञानगर्भेऽपि 'विहाय सकलाः क्रिया जननि मानसीः सर्वतो विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्ज्वलम्। स्थितैस्तवदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥' इति। अयं च उपायो मूर्धन्यत्वात् प्रत्यभिज्ञायां प्रतिपादितत्वात् आदौ उक्तः। शक्तिसंकोचादयस्तु यद्यपि प्रत्यभिज्ञायां न प्रतिपादिताः, तथापि आम्नायिकत्वात् अस्माभिः प्रसङ्गात् प्रदर्श्यन्ते; बहुषु हि प्रदर्शितेषु कश्चित् केनचित् प्रवेक्ष्यति इति। 'शक्तेः संकोच'-इन्द्रियद्वारेण प्रसरन्त्या एव आकुञ्चनक्रमेण उन्मुखीकरणम्। यथोक्तम् आथर्वणिकोपनिषत्सु कठवल्ल्यां चतुर्थ- वल्लीप्रथममन्त्रे। श्री ज्ञानगर्भ में भी (कहा गया हैं) : “हे जननी, जब लोग सारी मानसिक क्रियाओं को छोड़कर, इन्द्रियों की क्रियाओं की अनुसरण रूपी परतंत्रता से मुक्त होकर शुद्ध भाव में स्थित होते हैं जब तुम्हारे अनुग्रह से तत्काल उस उत्कृष्ट दशा की अनुभूति होती है जो कि अक्षुण्ण निरूपम सुख रूपी अमृत की वर्षा करती है।” यह उपाय सर्वप्रथम कहा गया है, क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ है और प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में प्रतिपादित हुआ है। शक्ति का संकोच इत्यादि उपाय यद्यपि प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में नहीं प्रतिपादित हुए हैं, तथापि वे आगम की परम्परा द्वारा विहित हैं, इसलिए प्रसंगवश हम उन्हें भी बतला देते हैं। बहुत से उपाय बतलाये जाने पर कोई किसी एक उपाय से समावेश दशा में प्रवेश कर सकेगा। शक्ति संकोच :- इसका अर्थ है शक्ति का संकोच। इसका भाव है “इन्द्रियों के द्वारा (विषयों की ओर) जाती हुई शक्ति का आकुंचन क्रम से (सिकोड़कर, समेट कर) प्रत्यागात्मा की ओर उन्मुख करना”। जैसा कि अर्थवेद की कठवल्ली-उपनिषद् की चतुर्थवल्ली के प्रथम मंत्र में कहा गया है :-