भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 96

८६ प्रत्यभिज्ञाहृदय 'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभू- स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन् ॥' इति। प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च सर्वतो निवर्तनम् । यथोक्तम् । 'तदपोद्धृते नित्योदितस्थितिः ।' इति । 'शक्तेर्विकासः' अन्तर्निगूढाया अक्रममेव सकलकरणचक्रविस्फा- रणेन 'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः ।' इति। भैरवीमुद्रानुप्रवेशयुक्त्या बहिः प्रसरणम् । यथोक्तं कक्ष्यास्तोत्रे "स्वयंभू (आप से आप होनेवाला अर्थात् प्रजापति) ने इन्द्रियों को बहिर्मुखी बना दिया। इसलिए जीव बाहर की ओर देखता है, अन्तरात्मा की ओर नहीं। कोई बुद्धिमान व्यक्ति अमृतत्व के अनुभव की इच्छा करता हुआ आंख को लौटा कर अन्तरात्मा को देखता है।" अथवा (शक्ति का संकोच हो सकता है) इन्द्रियों की बाहर फैली हुई शक्ति को चारों ओर से बटोर कर भीतर की ओर पलटना जैसे कछुआ भय के समय अपने अंगों को सिकोड़ कर भीतर की ओर पलट लेता है। जैसा कि कहा है "उसके पलटने पर नित्योदित१५७ को स्थिति होती है।" शक्ति विकास— शक्ति का विकास होता है भीतर छिपी हुई शक्तियों का एक साथ ही सब इन्द्रियों के प्रसार द्वारा । "लक्ष्य भीतर रहे, और दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष के (अर्थात् आंख बिना बन्द या खोले हुए एक टक) बाहर की ओर रहे।" चित्त के भीतर अनुप्रवेश के साथ इन्द्रियों का बाहर फैलाव यह भैरवी मुद्रा है जैसा