भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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६० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ बालुका राव का बीसलदेवजी के पास श्रीकंठ भट्ट को भेज संदेसा कहाना ॥ श्रीकंठ भट चहुवान पास। तुम जाय कहौ इचि विधि प्रकास ॥ श्री कंठ भट गय अरि सु थान। बीसलदे भेष्यौ चाहुवान ॥ कूं० ॥ ४४२ ॥ आसीस दई उच्चारि हथ्य । बालुका राइ की कत्ती कथ्य ॥ जितनैं नृपति सौं रुदै काम । तितनैं रयति सौं कौन काम ॥ कूं० ॥ ४४३ ॥ तुम बुरी करी करि रयति बंदि । ऐसी न करें हिंदू नरिंद ॥ अब कुंडि रयति फिरि जाहु धाम। अजमेर सहर मंडौ विश्राम ॥ कूं० ॥ ४४४ ॥ हैं। वल्ल राय जुध करन जोग । जुध आजि जाउं तो परै सोग ॥ हम मरन दिवस है संगनीक । ओ पास जिते नृप सुद्ध लीक ॥ कूं० ॥ ४४५ ॥ हम तुस्म नहीं कबहू विरुद्ध। इह जानि जाहु फिरि तजौ जुद्ध ॥ हम तुस्म काम इचि खेत आजं । को रहै खेत को जाइ भाजि ॥ कूं० ॥ ४४६ ॥ ॥ यह सुनते ही बीसलदेवजी का लड़ने को आज्ञा देना ॥ इतनी जु सुनत ही चाहुवान । तिचि वार हुकम करि द्यौ निसान ॥ पषरेत किये है वर मतंग । संनाह पचरि सब नरनि अंग ॥ कूं० ॥ ४४७ ॥ दोउ फौज निजर दिठाल मिक्षि । उपहै सिंधु जनु लहरि जह्नि ॥ कूं० ॥ ४४८ ॥ रु० ॥ २१५ ॥ ॥ बीसलदेवजी का चक्रव्यूह और बालुकराय का अहिव्यूह रचना ॥ दूहा ॥ चक्रव्यूह चहुवान क्रिय। अधि मन बालुक राइ । कै भेदै कै मधि रहै । दई करय निरवाह ॥ कूं० ॥ ४४६ ॥ रु० ॥ २१६ ॥ २१५ पाठान्तरः-राव । चालुक । मंगाय । भव्यौ । अंजुलि । विप्र । धारीय । जुहु । करों । काल्हि । काल । जौ । जाउं । जाऊं । भजि । गोतमालि । काय । अडो । फिर । षषरै । पषरेंत । गज । कसे । सजि । भए । जाहुं । कहो । यांन । सं० १७१० में 'भेट्यो वीसलदे चाहुवान" । दीन । दइ । उभारि । हथ । राय । कथ । जितनैं । सों । कांम । तितनैं । सों । कौम । कांम । बुरीय । करी । करै । हिंदू । धांम । विश्रांम । हो । ब्रह्म वंस । भागि । झाऊं । पासि । शुद्ध । तुम । तुंम । नही । विरुध । तुंम । कांम । जाय । चाहुवांन । निसांन । हैंवर । हैं वर । दोऊ । २१६ पाठान्तर :-चाहुवांन । वालुका । राय । दइ ।