भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६६ कवित्त ॥ धन अप्पिय सब ब्रह्म । उच्चर तिय ध्यान सु धारिय ॥ चिंतवि पुच्छकर तिष्य । रित्तु ग्रीषम मति चारिय ॥ पंच अगनि वर सीस । मेघ धारा धर मंडिय ॥ वरषा काल प्रचंड । सीत जल मड़ि सु बुड्डिय ॥ खंडिय सु वास संसार सुख । जोति निरंजन उर सचिय ॥ डूम कंक नालि मंडिय गगन । पीयै वाम दक्षिण मुचिय ॥ कूं० ॥ ४९८ ॥ रू० ॥ २४७ ॥ पद्धरी ॥ पहु समय तिष्य वर सजर किन्न । उर नयर धारि तिन भुवन चिन्न ॥ रुष च्यार देव पद भेटि ठौर । मन धऱ्यौ ध्यान सब तिष्य मौर ॥ कूं० ॥ ४९९ ॥ वढि बाच मास तिन पान कीन । सिर अद्ध उड़ दिग वरन दीन ॥ सचि वेद अध्ध कवि पंच मंडि । दत्ति दर्प दर्प मन मयन षंडि ॥ कूं० ॥ ५०० ॥ विहसित्त नगर नन प्रसध साध । सिर द्रवत उदक विष प्रातमाध ॥ चव वरष अम्र घर धार भूमि । गिरि गुरनि गिरनि गन लूम लूमि ॥ कूं० ॥ ५०१ ॥ परि मुहुँ उड्डं उपलंत बिन्द । गहराय वाय दस दिसनि हून्द ॥ घर हरत अंग जल धार धार । हर थटिय गंग जट मुकट पार ॥ कूं० ॥ ५०२ ॥ धरि ध्यान ग्यांन तिन अग्र ईस । षंड्यौ स जग्ग मंडै जगीस ॥ उर धरे देव तिन अंग गूढ । रुचि पदम पाय सामन सरूढ ॥ कूं० ॥ ५०३ ॥ जुग पानि नाभि ताछी बनाय । रमि दिष्ट सृिष्ट गिरवान राय ॥ तरपटी सान्न सिद्ध कमल भूर । इचि भंति भाव तप तवनि जूर ॥ कूं० ॥ ५०४ ॥ रू० ॥ २४८ ॥ २४७ पाठान्तरः-ब्रह्म । ताय । ध्यांन । तिष्य । रितु । चारीय । शीस । मंडय । शीत । मधि । बुडय । साव । ज्योति । बंक । वांम । दषिन ॥ २४८ पाठान्तरः-तिष्ठ । किंन । धार । चिन्ह । ध्यांन । तिष्य । पांन । कींन । संचि । दर्प दर्पं । मैंन । विहसित । विहसीत । नगन । माध । आभ्य । अम्र । घर । भूम । लूंबि । भूमि । मूहुँ । विंद । गहराव । वाव । दह । दिसा । इंद । भार । सुमुष । ध्यांन । ग्यांन । संरूढ । पांति । शिष्ट । गिरवरन । राइ । मूल । इहिं ॥ इस रूपक के अंत की पांच तुकों को कवि पिछले रूपक २४६ में भी कह आया है। यह चंद की संस्कृत-काव्य-सम शैली का एक उदाहरण है और ऐसे उदाहरण इस महाकाव्य में अनेक आवेंगे। कवियों की ऐसी निज शैलियों को देखकर भाषा के क्षुद्र और अपरिपक्व कवि झट चंद जैसे हिन्दी भाषा के वास्तविक कविराज को दोष देने लग जाते हैं परंतु संस्कृत भाषा के