भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

९८ पृथ्वीराजरासौ ! [ आदि पर्व दूहा ॥ तो सुत्र सुत्त उद्दार मति । गति तिन देव प्रकास ॥ धर मंडन डंडन भरन । सो तुम कर हु सु वास ॥ कूं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २४२ ॥ ॥ तपस्वनी के कोप से बीसलदेवजी का सांप के काटने से अलोप होना ॥ कवित्त ॥ सपत दिवस अनुसिष्ष । सुष्ष मधि दिग्ग प्रजारिय ॥ असि विष वड़ैन अंग । अगनि गन दनुज उदारिय ॥ सहस अङ्ग तन बङ्ग । झार मुष चार विकारिनि । सर्व असन करि असम । सैन छिन चैन निकारनि ॥ आहुट्ठ दीघ साहुट्ठ मधि । पलप पदम बिन कदम बिन ॥ गृह गवरि ग्यान गन गल्ह करि । रम्य राज आरन्न छिन ॥ कूं० ॥ ४८४ ॥ रु० ॥ २४३ ॥ दूहा ॥ भय दिवाच आहुट्ठ दुति । तप सरनी कौ दोष ॥ जल बेली विहु ब्राग विष । ते छिन भये अलोप ॥ कूं० ॥ ४८५ ॥ रु० ॥ २४४ ॥ ॥ जिस तपस्वनी के शाप से बीसलदेवजी असुर हुए उस के तप का आना की मा सविस्तर वर्णन करती है ॥ दूहा ॥ सुनंच पुत्त तिन तपनि तप । भिन्न भिन्न परिमान ॥ जिद्दि दुसिष्ष नृप असुर हुअ । रच्यौ सवर बुरमान ॥ कूं० ॥ ४८६ ॥ रु० ॥ १४५ ॥ बनिक पुच्च मन इम धरिय । मो पति ताप अपार ॥ जो तप्पह मंडौं प्रबख । तौ कुछौं संसार ॥ कूं० ॥ ४८७ ॥ रु० ॥ २४६ ॥ २४२ पाठान्तर :- सुत सुत । उद्दार । मंड ॥ २४३ पाठान्तर :- अनुसिष । सुष । द्विग । उद् भच्चिय । वार । विकारनि । सैन । चैन । आहुठ । साहुठ । ग्यांन । गल्ह । आरंन ॥ २४४-४६ पाठान्तर :- भये । भए । आंगुठ । कौ । कोपु । विहुं । वृष । भए ॥ २४४ ॥ भिंने । भिंन । परिमांन । जिहिं । दुसिष । नृप । भय । वरमांन ॥ २४५ ॥ धरीय । मो तन पाप अपार । मो पित ताप अपार । जो तप मंडौ निय प्रवल ॥ २४६ ॥