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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

९८ पृथ्वीराजरासौ ! [ आदि पर्व दूहा ॥ तो सुत्र सुत्त उद्दार मति । गति तिन देव प्रकास ॥ धर मंडन डंडन भरन । सो तुम कर हु सु वास ॥ कूं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २४२ ॥ ॥ तपस्वनी के कोप से बीसलदेवजी का सांप के काटने से अलोप होना ॥ कवित्त ॥ सपत दिवस अनुसिष्ष । सुष्ष मधि दिग्ग प्रजारिय ॥ असि विष वड़ैन अंग । अगनि गन दनुज उदारिय ॥ सहस अङ्ग तन बङ्ग । झार मुष चार विकारिनि । सर्व असन करि असम । सैन छिन चैन निकारनि ॥ आहुट्ठ दीघ साहुट्ठ मधि । पलप पदम बिन कदम बिन ॥ गृह गवरि ग्यान गन गल्ह करि । रम्य राज आरन्न छिन ॥ कूं० ॥ ४८४ ॥ रु० ॥ २४३ ॥ दूहा ॥ भय दिवाच आहुट्ठ दुति । तप सरनी कौ दोष ॥ जल बेली विहु ब्राग विष । ते छिन भये अलोप ॥ कूं० ॥ ४८५ ॥ रु० ॥ २४४ ॥ ॥ जिस तपस्वनी के शाप से बीसलदेवजी असुर हुए उस के तप का आना की मा सविस्तर वर्णन करती है ॥ दूहा ॥ सुनंच पुत्त तिन तपनि तप । भिन्न भिन्न परिमान ॥ जिद्दि दुसिष्ष नृप असुर हुअ । रच्यौ सवर बुरमान ॥ कूं० ॥ ४८६ ॥ रु० ॥ १४५ ॥ बनिक पुच्च मन इम धरिय । मो पति ताप अपार ॥ जो तप्पह मंडौं प्रबख । तौ कुछौं संसार ॥ कूं० ॥ ४८७ ॥ रु० ॥ २४६ ॥ २४२ पाठान्तर :- सुत सुत । उद्दार । मंड ॥ २४३ पाठान्तर :- अनुसिष । सुष । द्विग । उद् भच्चिय । वार । विकारनि । सैन । चैन । आहुठ । साहुठ । ग्यांन । गल्ह । आरंन ॥ २४४-४६ पाठान्तर :- भये । भए । आंगुठ । कौ । कोपु । विहुं । वृष । भए ॥ २४४ ॥ भिंने । भिंन । परिमांन । जिहिं । दुसिष । नृप । भय । वरमांन ॥ २४५ ॥ धरीय । मो तन पाप अपार । मो पित ताप अपार । जो तप मंडौ निय प्रवल ॥ २४६ ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६६ कवित्त ॥ धन अप्पिय सब ब्रह्म । उच्चर तिय ध्यान सु धारिय ॥ चिंतवि पुच्छकर तिष्य । रित्तु ग्रीषम मति चारिय ॥ पंच अगनि वर सीस । मेघ धारा धर मंडिय ॥ वरषा काल प्रचंड । सीत जल मड़ि सु बुड्डिय ॥ खंडिय सु वास संसार सुख । जोति निरंजन उर सचिय ॥ डूम कंक नालि मंडिय गगन । पीयै वाम दक्षिण मुचिय ॥ कूं० ॥ ४९८ ॥ रू० ॥ २४७ ॥ पद्धरी ॥ पहु समय तिष्य वर सजर किन्न । उर नयर धारि तिन भुवन चिन्न ॥ रुष च्यार देव पद भेटि ठौर । मन धऱ्यौ ध्यान सब तिष्य मौर ॥ कूं० ॥ ४९९ ॥ वढि बाच मास तिन पान कीन । सिर अद्ध उड़ दिग वरन दीन ॥ सचि वेद अध्ध कवि पंच मंडि । दत्ति दर्प दर्प मन मयन षंडि ॥ कूं० ॥ ५०० ॥ विहसित्त नगर नन प्रसध साध । सिर द्रवत उदक विष प्रातमाध ॥ चव वरष अम्र घर धार भूमि । गिरि गुरनि गिरनि गन लूम लूमि ॥ कूं० ॥ ५०१ ॥ परि मुहुँ उड्डं उपलंत बिन्द । गहराय वाय दस दिसनि हून्द ॥ घर हरत अंग जल धार धार । हर थटिय गंग जट मुकट पार ॥ कूं० ॥ ५०२ ॥ धरि ध्यान ग्यांन तिन अग्र ईस । षंड्यौ स जग्ग मंडै जगीस ॥ उर धरे देव तिन अंग गूढ । रुचि पदम पाय सामन सरूढ ॥ कूं० ॥ ५०३ ॥ जुग पानि नाभि ताछी बनाय । रमि दिष्ट सृिष्ट गिरवान राय ॥ तरपटी सान्न सिद्ध कमल भूर । इचि भंति भाव तप तवनि जूर ॥ कूं० ॥ ५०४ ॥ रू० ॥ २४८ ॥ २४७ पाठान्तरः-ब्रह्म । ताय । ध्यांन । तिष्य । रितु । चारीय । शीस । मंडय । शीत । मधि । बुडय । साव । ज्योति । बंक । वांम । दषिन ॥ २४८ पाठान्तरः-तिष्ठ । किंन । धार । चिन्ह । ध्यांन । तिष्य । पांन । कींन । संचि । दर्प दर्पं । मैंन । विहसित । विहसीत । नगन । माध । आभ्य । अम्र । घर । भूम । लूंबि । भूमि । मूहुँ । विंद । गहराव । वाव । दह । दिसा । इंद । भार । सुमुष । ध्यांन । ग्यांन । संरूढ । पांति । शिष्ट । गिरवरन । राइ । मूल । इहिं ॥ इस रूपक के अंत की पांच तुकों को कवि पिछले रूपक २४६ में भी कह आया है। यह चंद की संस्कृत-काव्य-सम शैली का एक उदाहरण है और ऐसे उदाहरण इस महाकाव्य में अनेक आवेंगे। कवियों की ऐसी निज शैलियों को देखकर भाषा के क्षुद्र और अपरिपक्व कवि झट चंद जैसे हिन्दी भाषा के वास्तविक कविराज को दोष देने लग जाते हैं परंतु संस्कृत भाषा के

१०० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व कवित्त ॥ देव चरित रमि धाइ । इक्क कार हीय मद्धि धरि ॥ सु रचि तिथ्य अडसट्ठि । मान पहुकर प्रकास करि ॥ दिग अंबर उर धारि । तारि तारी तप तारनि ॥ मन सुर भाग समान । खाइ रष्यै परि पारनि ॥ बर तर्प चंद अन दर्प करि । तामस द्रिग विकराल मन ॥ सस गवरि अंग अंग सिष उसिष । नृपति समंतन असुर वन ॥ छं० ॥ ५०५ ॥ रू० ॥ २४८ ॥ ॥ श्राप से विमुक्त होने के विचार से बीसलदेवजी का गोकर्ण की यात्रा के लिये बीसल सरवर पर प्रस्थान करना ॥ दूहा ॥ तजि नरिंद अजमेर पुर । चित गोक्रन हर थान ॥ बीसल सरवर ऊपरैं । बीसल दिय प्रस्थान ॥ छं० ॥ ५०६ ॥ रू० ॥ २५० ॥ ॥ तपस्विनी के श्राप से बीसलदेवजी की बुद्धि का चल विचल होना ॥ दूहा ॥ काम कुमत्तौ उप्पन्नौ । दीय तपसनी स्वाप ॥ बीसल दे बुधि चल विचल । प्रगटि पुब्ब कौ पाप ॥ छं० ॥ ५०७ ॥ रू० ॥ २५१ ॥ महाकाव्यादि के पठित विद्वानों को चंद कवि पर तो नहीं किन्तु इन दोष देने वालों की कुशाग्र बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य होगा क्योंकि संस्कृत काव्यों तथा अन्य बड़े २ ग्रंथों में प्रायः ऐसे उदाहरण मिलते हैं। देखो माघ के चतुर्थ सर्ग के २१ वें श्लोक में सहरितालसमाननवांशुकः । दो वार प्रयोग हुआ है और रघुवंश के दूसरे सर्ग के श्लोक ३१ की अंत की पंक्ति चित्रार्पितारम्भइवावतस्थे ॥ कुमारसंभव के तीसरे सर्ग के ४२ वें श्लोक में भी महाकवि कालिदासजी ने प्रयोग कियी है। तथा रघुवंश के सातवें सर्ग के ६ छठे श्लोक से लेकर ग्यारहवें ११ तक के सब श्लोक जैसे के तैसे कुमारसंभव के सातवें ७ सर्ग के ५७ सत्तावनवें श्लोक से ६२ बासठवें तक महाकवि कालिदासजी ने प्रयोग किये हैं ॥ २४८ पाठान्तरः-द्वार । इक्क । रहिय । रहीय । मधि । तिथ । अडसठि । मांन । उधारि । समांन । रषे । पारन तर्प । दर्प । अंग अंग ॥ २५०-५१ पाठान्तरः-तेजिं । नरेंद्र । चिंत । गऊकन । यांन । उपरे । प्रस्थांन ॥ २५० ॥ कांम । कुमती । ऊपनों । दिय । तपशिनी । सराप । कों ॥ २५१ ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०१ ॥ बीसलदेवजी को सांप का काटना और उस से उन का मरना ॥ दूहा ॥ वार रवी तिथि सत्तमी । चलि रथ सुतर सतंग ॥ तिहि वेरां आयौ कहै । डेरा माँचि पनंग ॥ छं० ॥ ५०८ ॥ रु० ॥ २५२ ॥ कवित्त ॥ देषि राज करि क्रोध । वान को दंड धरिय कर ॥ वेधि पनग फन छिक्कि । पद्यौ धर तरफत बेसिर ॥ कुट तिहि बेर सतंग । खेल देषन कौं धायौ ॥ एक मोजरी मढ़ि । पनग फन आनि लुकायौ ॥ फिरि राय आय हेंवर चढ्यौ । पहरत मोजे पग डस्यौ ॥ भवितव्य बात आघात गति । इतनी कहि राजन ढस्यौ ॥ छं० ॥ ५०९ ॥ रु० ॥ २५३ ॥ दूहा ॥ ओषद मंच अनंत जप । कितने करे उपाय ॥ ज्यों ज्यों तन लहरत चढत । त्यों त्यों दुचितौ राय ॥ छं० ॥ ५१० ॥ रु० ॥ २५४ ॥ कवित्त ॥ राज मरन उपनो । सब्ब जन सोच उपन्नौ ॥ पट रागिनि पावार । निकसि तब ही सत किन्नौ ॥ तिन मुष इम उच्चरौ । होइ जदवनि सपुत्तय ॥ यो असीस इह फुरौ । तुम्म भोगवहु धरत्तिय ॥ जिन रथी मढ़ि उठे अतुर । धपै ज्वाल तिन मुष विषय ॥ नर भषय जहां लसकर* सहर । मिलै मनिष ते ते अभय ॥ छं० ॥ ५११ ॥ रु० ॥ २५५ ॥ २५२ पाठान्तर :-तिथ । सपतमी । तिथि । कह्यो । डेरां । मांहि । माहि । पबंग ॥ २५३ पाठान्तर :-वांन । बंड । नाग । छिक्र । वेंसिर । छुट्यो । सं० १७९० और १६४७ में “मिलि राजन मोजरीय” । को । आयौ । मधि । पनंग । आंनि । आय राय ॥ २५४ पाठान्तर :-उपद्द । उपाइ । ज्यों ज्यों । लहरी । त्यो त्यो । दुचितो ॥ २५५ पाठान्तर :-उपनौ । ऊपनौ । उपंतो । निकसी । कीनो । इह । उच्चलौ । सपुतय । सपुतह । कुरौं । भोगवो । धरतय । इन । मधि उठै । भपै । शहर । मिले । मनुष । भपै ॥

  • हिं० लसकर (SK: लश To be skilful or clever, to do anything skilfully and scien- tifically or लस To play or sport, to work and कर Who or what does, makes or causes.) Hence a camp or cantonment &c.

५०२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ बीसलदेवजी के मरण और असुर हो नर भक्षण करने की बात सुनकर सारंगदेवजी का अपनी राणी को रणथंभ भेजना और आप उन से युद्ध करने को तयार होना ॥ दूहा ॥ सुनिय बात तो तात तब । हौं पठई रिनथंभ ॥ संच वद्दि तिन तेग बल । जुद्ध जुरन आरंभ ॥ छं० ॥ ५१२ ॥ रु० ॥ २५६ ॥ ॥ सारंगदेवजी की राणी गवरी का चिंता करना ॥ दूहा ॥ उन गति मो गति इक्क होइ । कै अवगत्ति मिलंत ॥ हास मिटै दुष को संधै । इहय चित्त मो चिंत ॥ छं० ॥ ५१३ ॥ रु० ॥ २५७ ॥ ॥ सारंगदेवजी का सेना लेकर ढुंढा राक्षस से युद्ध करने को अजमेर पहुँचना ॥ दूहा ॥ एक सल्ल भरि सध्य करि । सवल सकर दिय फेरि ॥ द्वै निसान चहुवान चढि । पहुँचिय गढ अजमेर ॥ छं० ॥ ५१४ ॥ रु० ॥ २५८ ॥ ॥ सारंगदेवजी का तीन दिन कोट में रहना, वहां असुर का न मिलना और अजमेर की भ्रष्ट और भयानक दशा देखकर चिंता करना ॥ कवित्त ॥ अति उद्यान सब थान । भये गढ धाम भयानक ॥ दिष्ट देषि सारंग । दैव चिंते तब बानिक ॥ ताकै कुल उपनीय । तपनि चम कौ कुल षोयौ ॥ तात पुकारे नीर । भरे नैनन्ह घन रोयौ ॥ दिन तीन रहत हुअ कोट मधि । असुर नयन दिष्यौ नहियँ ॥ तब सुचित भए सारंग दे । पुरी बसाऔं इह कहिय ॥ छं० ॥ ५१५ ॥ रु० ॥ २५९ ॥ ५६-५८ पाठान्तर :-वत्त । हों । मो । रन । वंदि । बर । जुध ॥ २५६ ॥ इन । हुंक । हुव । कैं । अवगति । चित ॥ २५७ ॥ भर । सद्य । निसांन । चहुआंन । चहुवांन । पहुचिय ॥ २५८ ॥ २५९ पाठान्तर :-उद्यांन । यांन । धांम । वांनिक । वाकै । नैननं । रहंत । बसावौ । बसावौं । कहीय ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०३ ॥ सारंगदेवजी और उन के पिता ढूंढा दानव का परस्पर युद्ध होकर सारंगदेवजी का मारा जाना ॥ कवित्त ॥ एका दसमी दिवस । प्रान दानव पुर आयौ ॥ सकल सेन लै सस्त्र । उठि लरिवे कौं धायौ ॥ वे वाहैं तरवारि । इहै मुष पकरि सु कहै ॥ ज्यों वेनी द्रुम सघन । देषि मरकट फल चुहै ॥ किय पिता पुत्त जुध सम असम । गिर सौ जनु सारँग गिर्यौ ॥ मन जानि असुर नर घुसि रचै । सब ढूंढा ढूंढत फिर्यौ ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ ३६० ॥ ३६० पाठान्तर :-दशमी । सेंन । शस्त्र । उठि । कों । वाहे । ज्या । चुट्टै । किय पिता जुध सम अरु असम । सो । सारंग ॥ पाठक महाशयो ! चंद की वर्णन कियी हुई बीसलदेवजी की यह दानव कथा आप को अद्भुत मालूम होगी और इस में कुछ संदेह भी नहीं है कि मनुष्य मरकर फिर दानव नहीं हो सक्ता और न ऐसे चरित्र कर सक्ता है कि जैसे चंद ने वर्णन किये हैं। देखो अद्भुत वही पदार्थ है कि जो स्वयम् तौ अद्भुत हो और दूसरों को अद्भुत ही प्रतीत हो परंतु जो आप किंचित सूक्ष्म विचार करेंगे तो आप को ज्ञात होगा कि चंद ने जो कुछ कहा है वह सत्य है अर्थात् जो आप को अद्भुत मालूम होकर असत्य निश्चय होता है वह वास्तविक सत्य ही है। जब तक मैं जो कुछ अंत में आप को कहना चाहता हूं वह नहीं कहूंगा तब तक मेरा वहां तक का कहना भी आप को अद्भुत ही प्रतीत होगा और वह वास्तव में है भी ऐसा ही क्योंकि जब तक कोई ताला कि जिस का खुलना विचार करने से भी कठिन दीखता हो और वह ऐसी सरलता से खुल न जाय कि जैसे कि “एक तिनके की ओट पहाड़" तौ वह निःसंदेह अद्भुत ही प्रतीत होगा । खैर, अब आप चंद की इस कठिनता के ताले को इस कुंजी से खोलकर अद्भुत वस्तु को देखिये, कि जो कुछ वृत्त चंद ने बीसलदेवजी की दानव कथा में लिखे हैं, वह सब उनके जीवन समय में वरते थे अर्थात् वे वाजीकरण की औषधियों के खाने, कुकर्मों के करने और सांप के काटने से बहुत ही पागल हो गये थे और उन्होंने इस पागलपने में अपने इकलौते पुत्र सारंगदेवजी तक को अपने हाथ से मारडाले थे और राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। इस वृत्तान्त को चंद ने अपनी काव्य शास्त्र संबन्धी विद्वत्ता दिखाने के लिये अद्भुत रस में लिखा है। अब आप इस प्रसंग को ध्यान देकर पढके समझ लेंगे कि महाकवि चंद ने ठीक अद्भुत रस दिखा दिया है। यह आप के ध्यान में होगा कि ग्रंथकर्ता ने पृष्ठ २३ छंद ८३ रूपक ३६ में कि जो चंद की अनेक कठिनताओं के खोलने की कुंजियों के गुच्छों में से एक बड़ा भारी गुच्छा है उस में कवि ने इस महाकाव्य को “नवं रसं" से नव रसों में लिखा कहा है कि अब यह हमारा काम है कि इस हिन्दी भाषा की महाभारत में से नवों रसों के प्रसंग खोज कर काटें। भला जो हम इस अथवा

१०४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना की मा का उसे कहना कि मनुष्यों को ढूंढ २ कर खाने से ढूंढा नाम पड़ा और उसने रम्य अजमेर को वेराम कर दिया ॥ दूहा ॥ ढूंढि ढूंढि खाये नरनि । तातैं ढूंढा नाम ॥ देवपुरी अजमेर पुर । रम्य करी वेराम * ॥ छं० ॥ ५१७ ॥ रू० ॥ २६१ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि अभी जाकर मैं उसे मार आऊं ॥ दूहा ॥ मात सुनौ तपसनि वचन । अरु दिय असिस पवारि ॥ अबहि जाय अजमेर गढ । अरि कौं आऊं मारि ॥ छं० ॥ ५१८ ॥ रू० ॥ २६२ ॥ ॥ गवरी का आना को असंतन मंत कहकर शिक्षा करना ॥ दूहा ॥ गवरि असंतन संत कहि । रषसि तोहि कुमार ॥ अरि रष्यस भर नग्ग सें। प्रजा राज संघार ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ २६३ ॥ कवित्त ॥ गवरि मात सिष्षवै । पुत्त आनल्ल इहि सिष्षिय ॥ मानव सैं मानवह । भिरंत दानव न पिष्यिय ॥ बहुत काल बहि गए । भरे जंगल धर पूरन ॥ म्रिग मयंद खंडियहि । ढूंढि पंषिय पति सूरन ॥ जं जीव वनजि मातुल घरह । अंजन घट मंगन करहि ॥ उर धरनि और रष्यस कहत । आनिन रष्यस उर अरहि ॥ छं० ॥ ५२० ॥ रू० ॥ २६४ ॥ ऐसी अन्य कथाओं को जो आगे आवेंगी अद्भुत रस में लिखी हुई न मानें तो फिर आप विचार करें कि अद्भुत रस क्या होता है और उसका लेख कैसा होता है। मेरी सम्मति में तो चंद ने जहां जहां जो २ रस लिखा है वह ऐसा ही उत्तम लिखा है कि यदि हम उसको न भी मानें तथापि हमको लाचार होकर उसे वही संज्ञा देनी पड़ती है जैसे कि यहां हम अद्भुत रस में लिखी हुई यह दानव कथा न भी मानें तथापि हम को यही कहना पड़ेगा कि यह अद्भुत बात है कि मनुष्य मरकर दानव नहीं होता न ऐसे चरित्र कर सक्ता है ॥

  • विराम से वेराम बना मालूम होता है ॥ २६१-६३ पाठान्तरः-ढूंढ । पाए । तातें । नांम । वे राम ॥ २६१ ॥ दीय । असीस । अबै । जाई । कूं । कों। आंऊं ॥ २६२ ॥ मत । करि । रखसि । अहिर रकंस भर नगमं ॥ २६३ ॥ २६४ पाठान्तरः-सिषवै । पुत्र । सिषिय । सों । मानव । दानव । अह । पिषिय । मग । पंषि । पंषी जीवनहु तंज़ि मातुल घरह । रखसं । गहंत । आनन । रष्यस । करहि ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १०५ दूहा ॥ उचरि मात समंत दूच । जीवन मरन न सिद्ध ॥ दुहुं विधि घर वासन करौ । आराधन कि विरुद्ध ॥ छं० ॥ ५२१ ॥ रू० ॥ २६५ ॥ पुत्त असमंत जु सिप्पयौ । सिष्यौ उरव्ह दहंत ॥ ढूंढौ नर ढुंढै भषन । तू सेवनह कहंत ॥ छं० ॥ ५२२ ॥ रू० ॥ २६६ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि या तो मैं सिर समपूंगा वा छत्र धारूंगा ॥ दूहा ॥ तब आनल्ल अैसी कत्थिय । मुचि सुभिक्षय यह वत्त ॥ कै सिर उनहि समप्पि हौँ । कै सिर धरि हौं छत्त ॥* छं० ॥ ५२३ ॥ रू० ॥ २६७ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि सेवा ऐसी है कि जिस से सब कार्य सिद्धी होती है ॥ कवित्त ॥ सेव देव रंजियै । सेव रष्षस वसि सव्वह ॥ सेव सिंघ पत्तियै । सेव विष जरै न जल्लह ॥ सेव वैर भंजियै । सेव रच पति पावन ॥ सेव दह्रै नह दहन । सेव बहु द्रव्य उपावन ॥ जिहिं सेव देव रष्षस धरहि ! जियन मात तन जाइ नन ॥ आमूढ ढुंढ धावत भषन । नहि सु देव नहि दानवन ॥ छं० ॥ ५२४ ॥ रू० ॥ २६८ ॥ २६५-६६ उचरि । सु मंत्र । सिद्धि । दुहुँ । बर । करो । करौं ॥ २६५ ॥ पुत । सिपियौ । सिप्यौ । भवन ॥ २६६ ॥

  • यह रूपक सं० १६४७ और १७१० की पुस्तकों में नहीं है और जब तक वह किसी और प्राचीन लिखित पुस्तक में न मिले तब तक हम उसे प्रसन्नतापूर्वक क्षेपक संज्ञा नहीं प्रदान कर सक्ते ॥ २६७ पाठान्तर :-सुभिय । वत । कैं । उतहि । हो । हो ॥ २६८ पाठान्तर :-रंजीयै । न सेव सिंघं पत्तियै । जलह । भंजीयै । रचै । सेवव्ह नह दहन । द्विव्य । जिन्हि । नह । सो नह ॥

१०६ [space] पृथ्वीराजरासौ । [space] [ आदि पर्व ॥ आना की माता का तो उसे शत्रु न सेवने को कहना किंतु उस का अजमेर जाना ॥ दूहा ॥ मातं बरज्जत रत्त हुअ । सचु न सेव न खेवं ॥ आइ अनल अजमेर बन । असुर निरष्वन भेव ॥ छं० ॥ ५२५ ॥ रू० ॥ २६९ ॥ ॥ ढुंढा दानव का अजमेर बन में बहुतदिनों तक मन्तु होकर रहना ॥ सो दानव अजमेर बन । रह्यो दीघ घन अंत ॥ सुंन दिसांनन जीव को । थिरं थांवरं जंग मंत * ॥ छं० ॥ ५२६ ॥ रू० ॥ २७० ॥ ॥ अजमेर की नष्ट भ्रष्ट दशा और आना का खड्ग लेकर प्रेत के पास जाना ॥ चोटक ॥ तहँ सिंघ न म्रग्ग न पंषि वनं । दिसि सून भई डर जीव घनं ॥ नव सातव संत अमंत कियं । पिय की धरनी रव तंत लियं ॥ छं० ॥ ५२७ ॥ तहँ ठाम भयानक सोच तयं । तहँ ठाम कलां कल्ल सोधि वयं ॥ तिहँ ठाम भरे नर नारि ननं । तिहँ ठाम न पंथिय पंथ कनं ॥ छं० ॥ ५२८ ॥ तिहँ ठाम गजं वर बाजि ननं । तिहँ ठाम न सिद्धय सांध कनं ॥ तिहँ ठाम न दारिद द्रव्य गनं । हिय मातं न तात न सोच मनं ॥ छं० ॥ ५२९ ॥ लय षग्ग रमक्किये प्रेत दिसं । बर बीर सु मंडिय चित्त रसं ॥ अविलंब करी सक्करं विपिनं । रिपु थान सपंत सु मैं न मनं ॥ छं० ॥ ५३० ॥ नर दिष्यं अचंभ कियौ सु हियं । कचि आज बिधं भल भष दियं ॥ क्षुध प्यास रु निंदयं राज ननं । सु गयौ वर दानव ताप तनं ॥ छं० ॥ ५३१ ॥ रू० ॥ २७१ ॥ २६९-७० पाठान्तरः-बरजत । रत । आंय । अनल । निरषन ॥ २६९ ॥ सून । सुंचा । दधिर ॥ २७० ॥

  • हिं० मंत = सं० म॑न्तु = राजाँ से बना है। यहाँ यह मंत्र का अपभ्रंश नहीं है ॥ २७१ पाठान्तर :-तहो । तहं । मृग । डर । वनं । म॑सु । पीयकी । तत । तत्ति । लीयं । तहां । तिह्वां । टांम । भयानक । तहां । ठांम । तिहां । ठांम । तिहां । ठाम । नमं । तिहां रूक्क सु पंथि रु पंथि जनं । तिहां । ठांम । तिहां ठांम । तिहां । ठांम । द्रव । लै । लग । रु । मुकिय । अविलंव । यांन । संपंत । सपत्त । दिषि । कीयौ । कोई । कोई आज भलो इहं भ्रप दियं । बुध । न निद्रय । दांनव ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०७ ॥ आना का अपने मन में विचार कर कहना ॥ श्लोक ॥ मनसाधार्य पुंसा स्याद् । विधिश्चिंतति नान्यथा ॥ ब्रह्माज्ञां लंघनेनापि । स्वयंपूरकमांघवः ॥ क० ॥ ५३२ ॥ रु० ॥ २७२ ॥ कवित्त ॥ सो पूरक माधव्व । जगत जांनन अधिकारिय ॥ थावर जंगम दैन । कठिन चिंता न विचारिय ॥ सरव भूत है जाम । मध्य चरि दैन भूगतिय ॥ किं कारन नर झुरै । देइ मन वंछित बत्तिय ॥ सा पुरस चित्त धरकै नहीं । धरक चित्त कायर करचि ॥ तिन्हि काज देषि दानव वनिय । बज्र बलिष्ट गुन उच्चरचि ॥ क० ॥ ५३३ ॥ रु० ॥ २७३ ॥ २७२ पाठान्तर :- स्यात् । विधिचिंतति । ब्रह्माज्ञां । माधव ॥ हमारे पाठकों को ज्ञात होगा कि इस ग्रंथ को क्रित्रिम बना हुआ कहनेवालों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वचन भी कहा है कि इस महाकाव्य के बनानेवाले को अनुस्वार और विसर्ग तक का भी ज्ञान न था । परंतु हमने इसी ग्रंथ में और इसी आदिपर्व में इस रूपक के पहिले आये हुए संस्कृत भाषा के श्लोक आप की दृष्टि के आगे धरे हैं कि आप न्याय कर सकें और ऐसे श्लोक आगे इस ग्रंथ में बहुत आवेंगे क्योंकि हमने इस महाकाव्य को कई आवृत्ति करके पढ़ा है । वैसे ही इस श्लोक को भी आप पढ़कर देखें कि पढ़ने में तो यह कैसा सरल है और अभिप्राय में कैसा विद्वानों के विचारने योग्य है । साधारण संस्कृत जाननेवाले से यह श्लोक लगना कठिन है अतएव हम उस का अन्वय नीचे संस्कृत भाषा में भी लिखते हैं :- अन्वयः ॥ पुंसा मनसा आंधार्य यत् स्यात् तत् स्वयंपूरक = माधवः, विधिः ब्रह्माज्ञालंघने नांपि चिंतति अन्यथा न चिंतति ॥ अर्थ । पुरुष करके मनसे धारके जो काम हो सकता है उसको स्वयं पूरा करनेवाला परमेश्वर (विधि) दैव विधान वा कर्म ब्रह्मा की आज्ञा को उल्लंघन करके भी सोचता है अन्यथा अर्थात् उस से उलटा नहीं सोचता ॥ सारांश यह है कि उद्योग के अनुसार हीं फल दैव भी देता है चाहे प्रारब्ध उस से उलटा भी हो । इस से केवल उद्योग की प्रधानता कही है ॥ हे पाठको ! क्या आप के अपक्षपात से विभूषित हृदय में यह दोष कुछ भी जंच सकता है कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चाहे कोई भी हो ऐसा निर्बोध था कि जिस को अनुस्वार और विसर्ग तक का बोध न था ? २७३ पाठान्तर :- सँ । माधव । जांनन । अधिकारीय । देन । दैन । विचारीय । सर्वे । जांम । दैन । देन । भुंगतिय । दैव । नहीं । तिन्हिं । दांनव । उच्चरहिं ॥

१०८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना का दानव को कंदरा में देखना और उसको खड्ग मारने पर दानव का गाजना ॥ पद्धरी ॥ दिष्यौ सु बीर कंदला गेह । सैं पंच हथ्थ ता हथ्थ देह ॥ असि असी हथ्थ झारच्चि झनंक्क । मन सदस पाइ तो डर षनंक्क ॥ छं० ॥ ५३४॥ अग्रोष्ट उड्ड जठिय अनंक । उठतै सु रोम रोमनि सनंक ॥ बुल्यौ सु बैन निय सत्त मान । देषंत चष्ष वालल्ल विनान ॥ छं० ॥ ५३५ ॥ अति सुषम वचन मधु मधुर कंत । दिष्यौ सु अंस राजन सुभंत ॥ जंभाइ वीर दसनं लहक्क ॥ उठ्यौ सु रोम रोमच्च पहक्क ॥ छं ॥ ५३६ ॥ उर चंपि भग्ग सिर नाइ राज । गहराय इंद्र दांनव सु गांज ॥ छं० ॥ ५३७ ॥ रू० ॥ २७४ ॥ ॥ इस पर दानव का आना से उसके मा बाप आदि के नाम पूछना ॥ कवित्त ॥ भेद वचन तन भेद । सुनन पंडुर चढि आइय ॥ उष्ट थरहर कंपि । सुनन प्राक्रम जं इय ॥ चरन सु थिर मन लीन । जीव धर धर धर कांतिय ॥ कैन भाव कवि चंद । बलिय सात्वक रस भांतिय ॥ पुच्छन सु बाल बुल्यौ बलिय । करि सु चिंत अतिंत चित ॥ को मात तात कछि नान को । को साँसूँ साधक सु मति ॥ छं० ॥ ५३८ ॥ रू० ॥ २७५ ॥ ॥ ढुंढा दानव का आना के सिर पर हाथ धर गल्ह पूछना ॥ दूहा ॥ खरग हथ्थेनी वाम पर । ढुंढै मेलि अनल्ह ॥ करुना करि सिर हथ्थ धरि । पूछि विवर सब गल्ह ॥ छं० ॥ ५३६ ॥ रू० ॥ २७६ ॥ *

२७४ पाठान्तर :- कंदरा । येह । हथ । हथ । हथ । पाय । टोडर । उठिय । रोमह । बैन । सत । मांति । चषु । विनांन । सुषम । वाचन । करांत । राज राजन । जंभाय । हसनं । लहक । नांइ । गहरा इंद्र द्वा दानव कि माज ॥ २७५ पाठान्तर :- दुर दुर । कंप । प्राकंम । प्राकंप । धरा धर । कांनीय । कौन । भाइ । भांनीय । पुछन । बुल्ल्यौ । चिंत । अत्यंत । चिंत । कुमति ॥

  • इस के आगे के अर्थात् रूपक २७६ से २७८ तक सं० १६४७ और १७७० की लिखित

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०६ गाथा ॥ असुर घयेली चंदं । विस्तागं कही यह यवा ईरं ॥ सुकता फन्न परिमानं । ता मध्ये खोचीयं आना ॥ छं० ॥ ५४० ॥ रु० ॥ २७७ ॥ * ॥ आना का मन में चिंता करना कि जो ढूंढा मुझे निगलेगा तौ मैं उस का पेट चीर कर निकलूंगा ॥ दूहा ॥ आंनें चिंतिय रान । जो मुहि ढूंढा निगत्ति है ॥ इंद्र ब्रतासुर जेम । निकसैं उदर छिदारि षग ॥ छं० ॥ ५४१ ॥ २७८ ॥* ॥ आना का उत्तर देना कि जिस से बीसलदेवजी का मन मैन होगया ॥ दूहा ॥ गवरि मात उर उड्डयो । पित वीसल मन मैन ॥ इत आवन मन् तरसयौ । तुअ तन देषन नैन ॥ छं० ॥ ५४२ ॥ रु० ॥ २७९ ॥ साटक ॥ किं दारिद्र सु दुष्ट कुष्ट तनयं । किं भूमि सचू घरं ॥ किं वनिता च वियोग दैव विपदा । निर्वासितां किं नरं ॥ किं जन मानत रुष्ट जुष्ट जुग्ता । किं आपितं सद्गुरं ॥ किं माता म्रित रंग भंग सरसां । आलिंगता सुंदरी ॥ छं० ॥ ५४३ ॥ रु० ॥ २८० ॥ * पुस्तकों में नहीं हैं किन्तु इधर की लिखी पुस्तकों में मिलते हैं। जब तक इन से भी पुरानी पुस्तकों में यह रूपक न मिलें तब तक उन को हम क्षेपक कहना योग्य नहीं समझते हैं ॥ २७६ पाठान्तर :- करग । कर । गह । थैली । मेहि । अनन्त । हथ ॥ २७८ पाठान्तर :- ढुंढा । निकसों । बिहारी ॥ † यह आज कल सोरठा छंद कहलाता है किन्तु प्राचीन समय में हिन्दी भाषा के कवि इस को दोहा भी कहते थे क्योंकि दोहा के जितने भेद भाषा के छंद ग्रंथों में लिखे हैं उन में सोरठा भी है अतएव चंद का यह दूहा संज्ञा. देना कुछ आश्चर्यदायक नहीं है ॥ २७९ पाठान्तर :- वल । मैंन । आवनम । तुम । नैन ॥ २८० पाठान्तर :- सचु । दैवपिवपदा । निर्वासितं । मांस । जुगता । जगता । सतगुरं सरसा । आलिंगिता ॥ यह भी ध्यान में रहने जैसी बात है कि पुरानी हिन्दी भाषा की लिखित पुस्तकों में मृत और नृप जैसे शब्द म्रित और न्रिप लिखे देखने में आते हैं ॥

११० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व साटक ॥ नो दारिद्र न कुष्ट दुष्टन तनं । सत्रू धरा नो हरं ॥ नो वनिता च वियोग दैव विपद्दा । निर्वासितो नो नरं ॥ नो सन्मानस रुष्ट जुष्ट जगता । नो आपिता सत् गुरुं ॥ मातुर्नाञ्चित रंग अंग सरसा । ना लिंगिता सुंदरी ॥ छंदं ॥ ५४४ ॥ रू० ॥ २८१ ॥ दूहा ॥ ना दारिद्र न कुष्ट तन । ना मुग्धा रस भेव ॥ नानुरत्त संसार सुख । तो पग रत्तौ खेव ॥ छंदं ॥ ५४५ ॥ रू० ॥ २८२ ॥ साटक ॥ नैवां दुष न सुख साहंस रने । नैवांन कालं कृतं ॥ नैवां मात पिता न चैव धनयं । नैवांन कित्ती रतूं ॥ नैवांनं चित्त मित्त साजन रसं । नैवांन किं रुष्टयं ॥ त्वं देवं तुअ हेव देव सरनं । तोयं जयं राज्यं ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० ॥ २८३ ॥ दूहा ॥ तब लगि कुष्ट दरिद्र तन । तब लगि लघु सुहि गात ॥ जब लगि हैं आयौ नहीं । तो पाहन खेवात ॥ छंदं ॥ ५४७ ॥ रू० ॥ २८४ ॥ ॥ दानव का आना से पूछना कि तू क्यों राज अरत्त है ॥ दूहा ॥ आलिंगन दै हत्थ धरि । अरु पुच्छिय इक बत्त ॥ जा जीवन रत्तौ जगत । तू क्यों राज अरत्त ॥ छंदं ॥ ५४८ ॥ रू० ॥ २८५ ॥ ॥ आना का बीसलदेवजी दानव को उत्तर दै कहना ॥ दूहा ॥ जिय न रत्त नह एन दुष । भूमि न घर मुझ देव ॥ तिन उचाट जिउँ कै मरौं । तुम पय रत्तौ सेव ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० २८६ ॥ २८१ पाठान्तर :- नां । धरा नं । नां । विनता । नां । ना । ता । सन्मांतस । आपितो । गुरुं । मातुर्नाम्रित ॥ २८२ पाठान्तर :-न । न मुगहु । नांनुरत्त । नरतु । तुअ पग रतो सेव ॥ २८३ पाठान्तर :-दुष । सुष । रस । पितं । मितं । सजन । तुं । तुय ॥ २८४-८५ पाठान्तर :-तब । हूं । नहीं । तौ ॥ २८४ ॥ दे । हथ । पुछिय । रत्तौ । सो तू केम आरत्ति ॥ २८५ ॥ २८६ पाठान्तर :-रत । तहि । भूमिंन । तिहिं । जीऊं । जिउं । कि । मरौं । पैं । रत्तौ ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १११ दूहा ॥ राजा ज दिन बुलाइ चै । मुह सुझझै इच्छ मत्त ॥ कै सिर तुम द्वि समप्पि हैं । कै सिर धरि हैं कत्त ॥ छं० ॥ ५५० ॥ रु० ॥ २८७ ॥ इच्छ धरनी मुझ पित प्रपित । आदि अनादि सु देव ॥ सो मंगन तुम पाय हैं । आयौ आतुर सेव ॥ छं० ॥ ५५१ ॥ रु० ॥ २८८ ॥ ॥ ढंूढा दानव का प्रसन्न होकर आना को अजमेर का राज देना ॥ चोटक ॥ सु प्रसन्नह देषित ईत तनं । नर रूप धरन्न कियौ सु मनं ॥ तुअ पुत्रह पौत्र बधू उरनं । जन मानस राज करों धरनं ॥ छं० ॥ ५५२ ॥ असि इच्छ जियै असमान गयौ । पग टोडर कंदल छी जु ठयौ । तव पुज्जन कों रवि वार कह्यौ । चहुआन सु आनन राज दयौ ॥ छं० ॥ ५५३ ॥ रु० ॥ २८९ ॥ ॥ ढंूढा का आना को राज देकर गंगा की ओर उड़कर जाना ॥ दूहा ॥ दयौ राज आनल्ल गढ । उड़ि ढुंढा पछ मग्ग ॥ दिसि गंगा तव गमन क्रिय । उच्चर चिषा अति लग्ग ॥ छं० ॥ ५५४ ॥ रु० ॥ २९० ॥ ॥ ढंूढा का नेमऋषि के उपदेश से गंगा की ओर जाते हुए दिल्ली पहुंचना ॥ पद्धरी ॥ नव द्वार रुकि तप पवन जोर । आयौ सु नेम रिष तथ्य ठौर ॥ दिषि रिष्य लग्गि निसच्चर सु पाय । कचि रिष्य कवन तो कवन काय ॥ छं० ॥ ५५५ ॥ बीसल्लह राज कांधि पुब्ब कत्थ । जरौं ताप उघरौं केम नत्थ ॥ तुअ षिचि कौन इच्छ ठांउ धारि । कासी सु जाइ लै तिष्य धार ॥ छं० ५५६ ॥ तें पाप कीन आनन्त मर्म । तिचि डैरि खुब्ब कुद्है सु कर्म ॥ सुनि श्रवन उड़्यौ राषिस अकास । आयौ सु पंथ कमि दिल्ली वास ॥ छं० ॥ ५५७ ॥

२८७-८८ पाठान्तर :- जा । द्विंन । मुहि । सूझै । मसि । कैं । हों । कैं । हूं । हों । कत्र ॥ २८७ ॥ प्रमित । हों ॥ २८८ ॥ २८९ पाठान्तर :- प्रसंवह । धरंन । कीयो । मांस । कहै । हथ । असमांम । कूं । पूजन । को । चहुआंन । चहुवांन । आंनल ॥ २९० पाठान्तर :- दीयो । आंनलहुं । कीय ॥

सुर थान निगम बोधह सुरंङ्ग । जल जमन आइ राखिस सुसंग ॥ कालिंद्र दह सु अति गंहर वारि । पावन परम सीतल सु चारि ॥ छं० ॥ ५५८ ॥ रु० ॥ २८१ ॥ ॥ ढूँढा का हारिफ ऋषि से मिलना, अपनी पूर्व कथा कहना और तीन सौ अस्सी वर्ष महातप करके ऋषि से उपदेश ग्रहण करना ॥ कवित्त ॥ सीतल वारि सु चंग । तहां गय चलि निसाचर ॥ लगि पिपास श्रम अंग । वारि पिन्नौ अंदोलि वर ॥ भौ सीतल सब अंग । करै अति वारि विचारह ॥ रिष हारिफ गुह तपै । छोर सुनि आय निचारह ॥ दिषि प्रबन्न रिष पूच्छौ प्रसंन । कंव रूप कीजै सु जल ॥ निसि मद्धि अद्ध राखिस वचहि । पाइ परस पुव्वह सकल ॥ छं० ॥ ५५९ ॥ रु० ॥ २८२ ॥ दूहा ॥ ढिंग जुग्गिनिपुर सरित तट । अचवन उदक सु आय ॥ तहँ इक तापस तप तपत । ताजी ब्रह्म लगाय ॥ छं० ॥ ५६० ॥ रु० ॥ २८३ ॥ कवित्त ॥ ताकी पुच्छिय ब्रह्म । दिषि इक असुर अदभुत ॥ दिग्ध देह चष सीस । मुष करुना जस जप्पत ॥ तिन रिषि पूच्छिय ताहि । कवन कारन इत अंगस ॥ कवन थान तुम नाम । कवन दिसि करिय सु जंगम ॥ २८१ नैनं । तथ । ठार । रिप । लागि । पाइ । रिषि । बीसलह कथ कथि राज कथ । जोरों । उद्दुरौं । नथ । तुव । कोन । इहि । ठाडं । जाउं । ल्यौ । तिथ । आनंत । आनत । अध्रम्म । तिहिं । ठोरि । सब । ति । क्रम्मं । उड्डो । दिलिं । सुर सुर । यांन । आय । राखिसमंग । कालिंद । पाबन् । परंम । सू सांरि ॥ २८२ पाठान्तर :-तिहां । चलि । सु निसाचर । भ्रम । पीनौ । अंदोलि । भय । सब्ब । देह । करैं । रिषि । पुछ्यो । कीलौ । मंदु । चवहि । पांय परसि गय आप्प सकल ॥ २८३ पाठान्तर :-तहां । आइ । लगाई । लगाइ ॥ २८४ पाठान्तर :-बोलिय । बंम्ह । दिपि । अदभुत । दिग्ध । चषु । रस जंपत् । पुछिय । थांन । नांम । करीय । नांम । नृपति । आप् । लभीय दइत । तजत । कंत ॥

पृथ्वीराजरासौ । ११३ जो नाम ढुंढ वीसन व्रणनि । साप देह जशिय दयत ॥ छुहन सु तेह गंगा दरस । तजन देह जन संत कृत ॥ छं० ॥ ५६१ ॥ रु० ॥ २८४ ॥ दूहा ॥ तजन देह जन संत कृत । सजन अजैपुर राज ॥ निय तन असि वर पंडि हैं। मधि गंगा रिपराज ॥ छं० ॥ ५६२ ॥ रु० ॥ २८५ ॥ तन सु पाप तापह तपन । किम उधार मो होइ ॥ तुम रिषराज वसिष्ट वर । यौ उपदेसह मोहि ॥ छं० ॥ ५६३ ॥ रु० ॥ २८६ ॥ तब मुनि वर हसि यौ कहिय । बिन तप लहिय न राज ॥ अन धन सुत द्वारा मुदित । लहौ सबै सुख साज ॥ छं० ॥ ५६४ ॥ रु० २८७ ॥ तब सु तहां उपदेस किय । लगि धारन हरि ध्यांन ॥ तपत तप्प तिन रिपि गुहा । अंग उपज्यौ ग्यान ॥ छं० ॥ ५६५ ॥ रु० ॥ २८८ ॥ रिष सु उठि तीरथ गयौ । दरी सु दानव खंडि ॥ जौ लौं आऊं निथ्य करि । तौ लौं तू तप मंडि ॥ छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ २८९ ॥ गाथा ॥ तपत निसाचर तप्पं । वीते वरष तीन सै असीयं ॥ भय बाधा विण अंगं । लग्यो राम धारना ध्यानं ॥ छं० ॥ ५६७ ॥ रु० ॥ ३०० ॥ दूहा ॥ ढुंढा रिषि उपदेस किय । तिन्हि ढिग दरिय उधोर ॥ वरष तीन सत् असिअ लगि । महा प्रबल तप घोर ॥ छं० ॥ ५६८ ॥ रु० ॥ ३०१ ॥ २८५-६६ पाठान्तरः-कृत । है । हैं। ॥ २८५ ॥ सोह । सोइ ॥ २८६ ॥ यो । लहों । सबै ॥ २८७ ॥ उहां ध्यांन । तप तप्पै । अंग अंग उपज्यौ ग्यांन । अंग उपज्यौ ग्यांन ॥ २८८ ॥ उठि । दानव । लो । आंऊं । तिथ तूं ॥ २८९ ॥ ३०० सनिचर । तांपं । सें । भो । वादक सब अंगं । लग्गों । ध्यानं ॥ ३०१ ' पाठान्तरः - तिहिं । गदरीय । वरष तीन सै असीय लगि । अस अगल ॥ ८

११४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ अनंगपाल राजा का दिल्ली बसाना ॥ दूहा ॥ पंडव बंस अनंग नृप । पति हथिनापुर ठाम ॥ एक समै जमुना तटह । वसिय राज तहँ गाम ॥ छं० ॥ ५६६ ॥ रु० ॥ ३०२ ॥ अनंग पाल तूंअर तहां । दिल्लि बसाई आनि ॥ राज प्रजा नर नारि सब । वसे सकल मन मानि ॥ छं० ॥ ५७० ॥ रु० ॥ ३०३ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का निगमबोध कालिंद्री तट पर गौरी पूजने जाना ॥ कवित्त ॥ अनंग पाल तूंअर । नरिंद घरमाधि राइ गुर ॥ सुता तास अति सुभग । बरष अठ्ठह सरूप बर ॥ सषी सु आनि समानि । सीख गुन वर अठ्ठह तर ॥ सावन आवन मास । गवरि नित करै पुज्ज उर ॥ निगम-बोध कालिंदि तट । गई सकल पूजन गवरि ॥ तिह्नि काल मेघ ब्रष्षह प्रबल । * भई लग्गि भींजन कुँअरि ॥ छं० ॥ ५७१ ॥ रु० ॥ ३०४ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का ढंढा को पूजना और उस का कारण पूछना ॥ कवित्त ॥ अनगपाल नृप सुता । संग पुच्ची ति पंच सित ॥ प्रोचित पुची एक । पुचि सा चंडि सेव चित ॥ सब मिलि जमना तीर । गई अस्नान सवारिय ॥ दिषि देवल मृत पिंड । तेह्र ढंढा तप धारिय ॥ ३०२-३ पाठान्तर :-ठांम । यमुना । तहां । गांम । ३०२५ तोअर । दिल्लि । आनि । प्रज । बसे सकल तहां आंनि । मांनि ॥ । * भई लगि भींजन = यह प्राचीन हिन्दी की वाग रीति अर्थात् मुहावरा है ॥ ३०४ पाठान्तर :-तूवर । राय । अठह । सषी आनि समांग । आंनि । समांनि । सीत । अठोतर । सावन । स पुज वर । निगमोघ । कालिदि । गइ । वरसि । लगि । भीजन । कुवरि ॥ ३०५ पाठान्तर :- अनगपाल पुत्री सु एक । सथ साथिणी पंचच सत । पंच सत । ता मइ । मंदि । जमुना । वपु स्रान । मृत । तिह्नि । ढुंढा । धारीय । पूजा । करीय । इय । दैत । पूज्यै । तिनहि ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११५ सब मिलि सु ताहि पुज्जा करिय । वरप पंच दुअ मास दिन ॥ दिन अवधि दइत पूछिय तिनह । को तुम कारन काम किन ॥ छं० ॥ ५७२ ॥ रू० ॥ ३०५ ॥ ॥ अनंगपाल की सुता का ढूंढा को वर चाहने को पूजने का कहना ॥ गाहा ॥ इह सुनि अनंग नरिंदं । पुत्ती सित पंच अवर दुज राजं ॥ वर चाहत तुम पासं । ए वर बीर वास इक ठामं ॥ छं० ॥ ५७३ ॥ रू० ॥ ३०६ ॥ ॥ ढूंढा का राज-स्त्रियों की सेवा से संतुष्ट होना ॥ दूहा ॥ दिल्ली ढिग गहरिय गुफा । ढूंढा तहां वयट्ठ ॥ अठ्ठोत्तर सौ राज त्रिय । सेवा करत सु तुट्ठ ॥ छं० ॥ ५७४ ॥ रू० ॥ ३०७ ॥ ॥ ढूंढा का वर देकर काशी को उड़ जाना ॥ पहरी ॥ दिय वाच वान्ध दानव सु राज । सज्जौ सु अप्प वर वचन साज ॥ उड़ि चल्यौ अप्प कासी समग्ग । आयौ सु गंग तट कज्ज जग्ग ॥ ५७५ ॥ सत अट्ठ पिंड करि अंग अब्बि । होमे सु अप्प वर मझि छब्बि ॥ मंग्यौ सु ईस पहि वर पसाय । सत अट्ठ पुत्र अवतरन काय ॥ ५७६ ॥ तन रह्यौ जोति गय देव थान । मिलि ताहि अक्कूशिय करत गान ॥ छं० ॥ ५७७ ॥ रू० ॥ ३०८ ॥ ॥ ढूंढा का फिर जन्म लेना और उसका वृत्तान्त चंद का वर्णन करना ॥ दूहा ॥ इम आतम उद्धार करि । जनम लियो भुअ आइ ॥ सो वृतंत कवि चंद कहि । बरन्यौ कवित बनाइ ॥ छं० ॥ ५७८ ॥ रू० ॥ ३०९ ॥ ॥ ढूंढा का वर दैना और काशी में यज्ञ कर तन त्यागना ॥ दूहा ॥ तब ढूंढा वर दान दिय । सुति सत अट्ठ प्रसन्न ॥ कासी जाय रु जग्ग किय । सित्त पिंड किय तन्न ॥ छं० ॥ ५७९ ॥ रू० ॥ ३१० ॥ ३०६ पाठात्तर :- अगंग । पुत्ती सय । काम वास ॥ ३०७ पाठान्तर :- ढिल्ली । गुफा । ढूंठा । वयठ । अठोत्तर । सो । तुठ ॥ ३०८ पाठान्तर :- दीय । दानवह । स । अप । पंचन । चल्यौ मग । समग । कज जग । अठ अबि । स । मधि । छवि । सब्ब । स । यसाई । पसाइ । आठ । आठ । अवतार । काइ । ज्योति । थांन । अकुरीस । भ्यांन ॥ ३०९-१० पाठान्तर :- उधार । लीया । भूअ । आइ । वृतांत । चंदनै । वरन्यो सकल बनाय ॥ ३०९.॥ ढुंढै । वरदांन । आठ । कीय । सत्त । कीय ॥ ३१० ॥

९१६ पृथ्थीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ ढूँढा के दानव शरीर का मान और स्वरूप वर्णन ॥ कवित्त ॥ अंगह मान प्रमान । पंच सै हथ्थ उने कह ॥ दूह उंचैा उनमान । विनय लक्ष्किनह विवेकह ॥ हथ्थ षडग विकराल । मुख्य ज्वालंघन सहह ॥ आनळ दिन्नो राज । गयौ राषिस तन महह ॥ जोगिनियं गुफा बोधह निगम । तप आदर किन्नो सु मन ॥ साधंत पवन तप उग्र करि । इस रष्यौ उद्धार मन ॥ छं० ॥ ५८० ॥ रू० ॥ ३११ ॥ ॥ ढूँढा का दिल्ली में पाषाणरूप हो जाना और स्त्रियों का उसे पूजना ॥ कवित्त ॥ असी वरस सत तीन । गुफा किन्नों तप भारिय ॥ बैस वंस षिचिअ भ्रम । भरै जमुना जल नारिय ॥ सारँग बज्यौ वाउ । घटा बंधे जल बुट्टौ ॥ दौरी सब गृह मज्झ । रूप पाषान सु दिट्टौ ॥ मिलि नारि सबन अचरिज्ज करि । जल धोए उज्ज्वल कस्यौ ॥ साषंड धूप दीपक चरिच । सित मन सिद्धौ आवस्यौ ॥ छं० ॥ ५८१ ॥ रू० ॥ ३१२ ॥ ॥ ढूँढा का अनंगपाल की सुता को वीर पुत्र होने का वर देना ॥ कवित्त ॥ दिय वीसल बरदान । कुष उपजै साचा अर ॥ बोरा रस उत्तान । जुद्ध मंडै न कोइ नर ॥ बीर जोति अवतार । भद्द जिह्वा तन भारिय ॥ नयन जोति संजोगि । 'पत्ति कुल पिता सँघारिया ॥ ३११ पाठान्तर :—कहि अंग । मांन । प्रमांन । हथ । उन । लछनह । हथ । मुष । प्रानल । दीनौ । जो गिनीय । कीनौ । पंवच । रक्ष्यौ ॥ ३१२ पाठान्तर :—अशी । बरस । शत । कीनौ । भारीय । पत्री अधम । वित्तीय अधम । वित्तिय अधम । भरे । जमना । भारीय । नारीय । सारंग । बज्यौ । वज्या । वाय । वधे । बुठौ । दोरी । मन्झ । सुदिट्ठौ । दीठौ । अरिज । धोय । उजल । संन मनि सुधि आवस्यौ । तन मन सुधि आवस्यौ ॥ ३१३ पाठान्तर :—दीय । वीशल । वरदांनि । कुष । कुष्य । उपजे । महा । रस । उत्तांन ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ११७ दिप्पे सु नयन पुछ करि अनघ । कियौ पाप इन ध्रुव करि ॥ उप्यजै नारि अति रूप तिन । तेन खिन्न जाइ सु धर ॥ छं० ॥ ५८२ ॥ रु० ॥ ३१३ ॥

॥ ढूॅंढा का वर देकर कासी जाना, वहां दानव योनि से मुक्त हो अवतार लेना-सोमेसर की परिग्रह के प्रबंध के लिये क्षत्रियों का उत्पन्न होना-जिन में से बीस अजमेर में और अन्य अन्यत्र हुए-सोमेस के वीर पुत्र पृथ्वीराज हुए ॥

कवित्त ॥ वर दिनौ ढुंढा नरिन्द । जाय कासी तट सिद्धौ ॥ अस्त लियौ अवतार । भह रसना रस पिद्धौ ॥ सोमेसर परिगह्र । प्रबंध सित उपने पिच्चि नर ॥ हुण वीस अजमेर । विण उप्यने अपर धर ॥ सोमेस वीर सुत पिथ्थ हुच्च । ठौर ठौर जपजि वलिय ॥ विधि विधि विनान अवलोक गति । अवर सूर आए मिलिय ॥ छं० ॥ ५८३ ॥ रु० ॥ ३१४ ॥

॥ पृथ्वीराज जी के परिग्रह के सामंतों के नाम और जन्म स्थानादि का वर्णन ॥

कवित्त ॥ हुआ निक्खंभर कन्नवज्ज । जैत सन्र्ष अव्बूगढ ॥ मंडोवर परिहार । करण कंगुर चाहुत्ति दिढ ॥ बन्हि भद्र सु नागौर । चंद उप्यजि लाहौरह ॥ दिक्खिय अत्ता ताइ । विया धर सामत सोरह ॥

ज्याति । जीठू । भारीय । पति । संघारिय । संघारीय । देपे । प्रसिद्ध । कीयै । द्रूव । उप्यजी नारी । उपजी । तेन् लिंन जाइ सुधिर । तेन लिंत जासे सुधर ॥* ३१४ पाठान्तरः-दीनौ । दीधौ । सिधौ । सिंधौ । आस्ति । लीयौ । रशना । रश । सोमे- शर । परिग्रह । सिंत । शक्त । उप्पने । पिञ्च । हुए । भये । वीए । वीरा । अपने । अवर । पिद्ध । उपजि । विनांन । आय मिलीय ॥

  • पाठकों को इस रूपक से फिर सावधान होकर पढ़ना चाहिये क्योंकि कवि इस रूपक से पृथ्वीराजजी के जन्मादि की कथा की भूमिका बांध कर वृत्त वर्णन करता है ॥