भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०६ गाथा ॥ असुर घयेली चंदं । विस्तागं कही यह यवा ईरं ॥ सुकता फन्न परिमानं । ता मध्ये खोचीयं आना ॥ छं० ॥ ५४० ॥ रु० ॥ २७७ ॥ * ॥ आना का मन में चिंता करना कि जो ढूंढा मुझे निगलेगा तौ मैं उस का पेट चीर कर निकलूंगा ॥ दूहा ॥ आंनें चिंतिय रान । जो मुहि ढूंढा निगत्ति है ॥ इंद्र ब्रतासुर जेम । निकसैं उदर छिदारि षग ॥ छं० ॥ ५४१ ॥ २७८ ॥* ॥ आना का उत्तर देना कि जिस से बीसलदेवजी का मन मैन होगया ॥ दूहा ॥ गवरि मात उर उड्डयो । पित वीसल मन मैन ॥ इत आवन मन् तरसयौ । तुअ तन देषन नैन ॥ छं० ॥ ५४२ ॥ रु० ॥ २७९ ॥ साटक ॥ किं दारिद्र सु दुष्ट कुष्ट तनयं । किं भूमि सचू घरं ॥ किं वनिता च वियोग दैव विपदा । निर्वासितां किं नरं ॥ किं जन मानत रुष्ट जुष्ट जुग्ता । किं आपितं सद्गुरं ॥ किं माता म्रित रंग भंग सरसां । आलिंगता सुंदरी ॥ छं० ॥ ५४३ ॥ रु० ॥ २८० ॥ * पुस्तकों में नहीं हैं किन्तु इधर की लिखी पुस्तकों में मिलते हैं। जब तक इन से भी पुरानी पुस्तकों में यह रूपक न मिलें तब तक उन को हम क्षेपक कहना योग्य नहीं समझते हैं ॥ २७६ पाठान्तर :- करग । कर । गह । थैली । मेहि । अनन्त । हथ ॥ २७८ पाठान्तर :- ढुंढा । निकसों । बिहारी ॥ † यह आज कल सोरठा छंद कहलाता है किन्तु प्राचीन समय में हिन्दी भाषा के कवि इस को दोहा भी कहते थे क्योंकि दोहा के जितने भेद भाषा के छंद ग्रंथों में लिखे हैं उन में सोरठा भी है अतएव चंद का यह दूहा संज्ञा. देना कुछ आश्चर्यदायक नहीं है ॥ २७९ पाठान्तर :- वल । मैंन । आवनम । तुम । नैन ॥ २८० पाठान्तर :- सचु । दैवपिवपदा । निर्वासितं । मांस । जुगता । जगता । सतगुरं सरसा । आलिंगिता ॥ यह भी ध्यान में रहने जैसी बात है कि पुरानी हिन्दी भाषा की लिखित पुस्तकों में मृत और नृप जैसे शब्द म्रित और न्रिप लिखे देखने में आते हैं ॥

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 120, कुल 470 में से · BharatKosha