पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें११० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व साटक ॥ नो दारिद्र न कुष्ट दुष्टन तनं । सत्रू धरा नो हरं ॥ नो वनिता च वियोग दैव विपद्दा । निर्वासितो नो नरं ॥ नो सन्मानस रुष्ट जुष्ट जगता । नो आपिता सत् गुरुं ॥ मातुर्नाञ्चित रंग अंग सरसा । ना लिंगिता सुंदरी ॥ छंदं ॥ ५४४ ॥ रू० ॥ २८१ ॥ दूहा ॥ ना दारिद्र न कुष्ट तन । ना मुग्धा रस भेव ॥ नानुरत्त संसार सुख । तो पग रत्तौ खेव ॥ छंदं ॥ ५४५ ॥ रू० ॥ २८२ ॥ साटक ॥ नैवां दुष न सुख साहंस रने । नैवांन कालं कृतं ॥ नैवां मात पिता न चैव धनयं । नैवांन कित्ती रतूं ॥ नैवांनं चित्त मित्त साजन रसं । नैवांन किं रुष्टयं ॥ त्वं देवं तुअ हेव देव सरनं । तोयं जयं राज्यं ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० ॥ २८३ ॥ दूहा ॥ तब लगि कुष्ट दरिद्र तन । तब लगि लघु सुहि गात ॥ जब लगि हैं आयौ नहीं । तो पाहन खेवात ॥ छंदं ॥ ५४७ ॥ रू० ॥ २८४ ॥ ॥ दानव का आना से पूछना कि तू क्यों राज अरत्त है ॥ दूहा ॥ आलिंगन दै हत्थ धरि । अरु पुच्छिय इक बत्त ॥ जा जीवन रत्तौ जगत । तू क्यों राज अरत्त ॥ छंदं ॥ ५४८ ॥ रू० ॥ २८५ ॥ ॥ आना का बीसलदेवजी दानव को उत्तर दै कहना ॥ दूहा ॥ जिय न रत्त नह एन दुष । भूमि न घर मुझ देव ॥ तिन उचाट जिउँ कै मरौं । तुम पय रत्तौ सेव ॥ छंदं ॥ ५४६ ॥ रू० २८६ ॥ २८१ पाठान्तर :- नां । धरा नं । नां । विनता । नां । ना । ता । सन्मांतस । आपितो । गुरुं । मातुर्नाम्रित ॥ २८२ पाठान्तर :-न । न मुगहु । नांनुरत्त । नरतु । तुअ पग रतो सेव ॥ २८३ पाठान्तर :-दुष । सुष । रस । पितं । मितं । सजन । तुं । तुय ॥ २८४-८५ पाठान्तर :-तब । हूं । नहीं । तौ ॥ २८४ ॥ दे । हथ । पुछिय । रत्तौ । सो तू केम आरत्ति ॥ २८५ ॥ २८६ पाठान्तर :-रत । तहि । भूमिंन । तिहिं । जीऊं । जिउं । कि । मरौं । पैं । रत्तौ ॥