पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
DevanagariHindipublished470 पृष्ठ
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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १११ दूहा ॥ राजा ज दिन बुलाइ चै । मुह सुझझै इच्छ मत्त ॥ कै सिर तुम द्वि समप्पि हैं । कै सिर धरि हैं कत्त ॥ छं० ॥ ५५० ॥ रु० ॥ २८७ ॥ इच्छ धरनी मुझ पित प्रपित । आदि अनादि सु देव ॥ सो मंगन तुम पाय हैं । आयौ आतुर सेव ॥ छं० ॥ ५५१ ॥ रु० ॥ २८८ ॥ ॥ ढंूढा दानव का प्रसन्न होकर आना को अजमेर का राज देना ॥ चोटक ॥ सु प्रसन्नह देषित ईत तनं । नर रूप धरन्न कियौ सु मनं ॥ तुअ पुत्रह पौत्र बधू उरनं । जन मानस राज करों धरनं ॥ छं० ॥ ५५२ ॥ असि इच्छ जियै असमान गयौ । पग टोडर कंदल छी जु ठयौ । तव पुज्जन कों रवि वार कह्यौ । चहुआन सु आनन राज दयौ ॥ छं० ॥ ५५३ ॥ रु० ॥ २८९ ॥ ॥ ढंूढा का आना को राज देकर गंगा की ओर उड़कर जाना ॥ दूहा ॥ दयौ राज आनल्ल गढ । उड़ि ढुंढा पछ मग्ग ॥ दिसि गंगा तव गमन क्रिय । उच्चर चिषा अति लग्ग ॥ छं० ॥ ५५४ ॥ रु० ॥ २९० ॥ ॥ ढंूढा का नेमऋषि के उपदेश से गंगा की ओर जाते हुए दिल्ली पहुंचना ॥ पद्धरी ॥ नव द्वार रुकि तप पवन जोर । आयौ सु नेम रिष तथ्य ठौर ॥ दिषि रिष्य लग्गि निसच्चर सु पाय । कचि रिष्य कवन तो कवन काय ॥ छं० ॥ ५५५ ॥ बीसल्लह राज कांधि पुब्ब कत्थ । जरौं ताप उघरौं केम नत्थ ॥ तुअ षिचि कौन इच्छ ठांउ धारि । कासी सु जाइ लै तिष्य धार ॥ छं० ५५६ ॥ तें पाप कीन आनन्त मर्म । तिचि डैरि खुब्ब कुद्है सु कर्म ॥ सुनि श्रवन उड़्यौ राषिस अकास । आयौ सु पंथ कमि दिल्ली वास ॥ छं० ॥ ५५७ ॥
२८७-८८ पाठान्तर :- जा । द्विंन । मुहि । सूझै । मसि । कैं । हों । कैं । हूं । हों । कत्र ॥ २८७ ॥ प्रमित । हों ॥ २८८ ॥ २८९ पाठान्तर :- प्रसंवह । धरंन । कीयो । मांस । कहै । हथ । असमांम । कूं । पूजन । को । चहुआंन । चहुवांन । आंनल ॥ २९० पाठान्तर :- दीयो । आंनलहुं । कीय ॥