भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 470 में से

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पृष्ठ 118

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०७ ॥ आना का अपने मन में विचार कर कहना ॥ श्लोक ॥ मनसाधार्य पुंसा स्याद् । विधिश्चिंतति नान्यथा ॥ ब्रह्माज्ञां लंघनेनापि । स्वयंपूरकमांघवः ॥ क० ॥ ५३२ ॥ रु० ॥ २७२ ॥ कवित्त ॥ सो पूरक माधव्व । जगत जांनन अधिकारिय ॥ थावर जंगम दैन । कठिन चिंता न विचारिय ॥ सरव भूत है जाम । मध्य चरि दैन भूगतिय ॥ किं कारन नर झुरै । देइ मन वंछित बत्तिय ॥ सा पुरस चित्त धरकै नहीं । धरक चित्त कायर करचि ॥ तिन्हि काज देषि दानव वनिय । बज्र बलिष्ट गुन उच्चरचि ॥ क० ॥ ५३३ ॥ रु० ॥ २७३ ॥ २७२ पाठान्तर :- स्यात् । विधिचिंतति । ब्रह्माज्ञां । माधव ॥ हमारे पाठकों को ज्ञात होगा कि इस ग्रंथ को क्रित्रिम बना हुआ कहनेवालों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वचन भी कहा है कि इस महाकाव्य के बनानेवाले को अनुस्वार और विसर्ग तक का भी ज्ञान न था । परंतु हमने इसी ग्रंथ में और इसी आदिपर्व में इस रूपक के पहिले आये हुए संस्कृत भाषा के श्लोक आप की दृष्टि के आगे धरे हैं कि आप न्याय कर सकें और ऐसे श्लोक आगे इस ग्रंथ में बहुत आवेंगे क्योंकि हमने इस महाकाव्य को कई आवृत्ति करके पढ़ा है । वैसे ही इस श्लोक को भी आप पढ़कर देखें कि पढ़ने में तो यह कैसा सरल है और अभिप्राय में कैसा विद्वानों के विचारने योग्य है । साधारण संस्कृत जाननेवाले से यह श्लोक लगना कठिन है अतएव हम उस का अन्वय नीचे संस्कृत भाषा में भी लिखते हैं :- अन्वयः ॥ पुंसा मनसा आंधार्य यत् स्यात् तत् स्वयंपूरक = माधवः, विधिः ब्रह्माज्ञालंघने नांपि चिंतति अन्यथा न चिंतति ॥ अर्थ । पुरुष करके मनसे धारके जो काम हो सकता है उसको स्वयं पूरा करनेवाला परमेश्वर (विधि) दैव विधान वा कर्म ब्रह्मा की आज्ञा को उल्लंघन करके भी सोचता है अन्यथा अर्थात् उस से उलटा नहीं सोचता ॥ सारांश यह है कि उद्योग के अनुसार हीं फल दैव भी देता है चाहे प्रारब्ध उस से उलटा भी हो । इस से केवल उद्योग की प्रधानता कही है ॥ हे पाठको ! क्या आप के अपक्षपात से विभूषित हृदय में यह दोष कुछ भी जंच सकता है कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चाहे कोई भी हो ऐसा निर्बोध था कि जिस को अनुस्वार और विसर्ग तक का बोध न था ? २७३ पाठान्तर :- सँ । माधव । जांनन । अधिकारीय । देन । दैन । विचारीय । सर्वे । जांम । दैन । देन । भुंगतिय । दैव । नहीं । तिन्हिं । दांनव । उच्चरहिं ॥