भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 470 में से

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पृष्ठ 115

१०४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना की मा का उसे कहना कि मनुष्यों को ढूंढ २ कर खाने से ढूंढा नाम पड़ा और उसने रम्य अजमेर को वेराम कर दिया ॥ दूहा ॥ ढूंढि ढूंढि खाये नरनि । तातैं ढूंढा नाम ॥ देवपुरी अजमेर पुर । रम्य करी वेराम * ॥ छं० ॥ ५१७ ॥ रू० ॥ २६१ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि अभी जाकर मैं उसे मार आऊं ॥ दूहा ॥ मात सुनौ तपसनि वचन । अरु दिय असिस पवारि ॥ अबहि जाय अजमेर गढ । अरि कौं आऊं मारि ॥ छं० ॥ ५१८ ॥ रू० ॥ २६२ ॥ ॥ गवरी का आना को असंतन मंत कहकर शिक्षा करना ॥ दूहा ॥ गवरि असंतन संत कहि । रषसि तोहि कुमार ॥ अरि रष्यस भर नग्ग सें। प्रजा राज संघार ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ २६३ ॥ कवित्त ॥ गवरि मात सिष्षवै । पुत्त आनल्ल इहि सिष्षिय ॥ मानव सैं मानवह । भिरंत दानव न पिष्यिय ॥ बहुत काल बहि गए । भरे जंगल धर पूरन ॥ म्रिग मयंद खंडियहि । ढूंढि पंषिय पति सूरन ॥ जं जीव वनजि मातुल घरह । अंजन घट मंगन करहि ॥ उर धरनि और रष्यस कहत । आनिन रष्यस उर अरहि ॥ छं० ॥ ५२० ॥ रू० ॥ २६४ ॥ ऐसी अन्य कथाओं को जो आगे आवेंगी अद्भुत रस में लिखी हुई न मानें तो फिर आप विचार करें कि अद्भुत रस क्या होता है और उसका लेख कैसा होता है। मेरी सम्मति में तो चंद ने जहां जहां जो २ रस लिखा है वह ऐसा ही उत्तम लिखा है कि यदि हम उसको न भी मानें तथापि हमको लाचार होकर उसे वही संज्ञा देनी पड़ती है जैसे कि यहां हम अद्भुत रस में लिखी हुई यह दानव कथा न भी मानें तथापि हम को यही कहना पड़ेगा कि यह अद्भुत बात है कि मनुष्य मरकर दानव नहीं होता न ऐसे चरित्र कर सक्ता है ॥

  • विराम से वेराम बना मालूम होता है ॥ २६१-६३ पाठान्तरः-ढूंढ । पाए । तातें । नांम । वे राम ॥ २६१ ॥ दीय । असीस । अबै । जाई । कूं । कों। आंऊं ॥ २६२ ॥ मत । करि । रखसि । अहिर रकंस भर नगमं ॥ २६३ ॥ २६४ पाठान्तरः-सिषवै । पुत्र । सिषिय । सों । मानव । दानव । अह । पिषिय । मग । पंषि । पंषी जीवनहु तंज़ि मातुल घरह । रखसं । गहंत । आनन । रष्यस । करहि ॥
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 115, कुल 470 में से · BharatKosha