भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०३ ॥ सारंगदेवजी और उन के पिता ढूंढा दानव का परस्पर युद्ध होकर सारंगदेवजी का मारा जाना ॥ कवित्त ॥ एका दसमी दिवस । प्रान दानव पुर आयौ ॥ सकल सेन लै सस्त्र । उठि लरिवे कौं धायौ ॥ वे वाहैं तरवारि । इहै मुष पकरि सु कहै ॥ ज्यों वेनी द्रुम सघन । देषि मरकट फल चुहै ॥ किय पिता पुत्त जुध सम असम । गिर सौ जनु सारँग गिर्यौ ॥ मन जानि असुर नर घुसि रचै । सब ढूंढा ढूंढत फिर्यौ ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ ३६० ॥ ३६० पाठान्तर :-दशमी । सेंन । शस्त्र । उठि । कों । वाहे । ज्या । चुट्टै । किय पिता जुध सम अरु असम । सो । सारंग ॥ पाठक महाशयो ! चंद की वर्णन कियी हुई बीसलदेवजी की यह दानव कथा आप को अद्भुत मालूम होगी और इस में कुछ संदेह भी नहीं है कि मनुष्य मरकर फिर दानव नहीं हो सक्ता और न ऐसे चरित्र कर सक्ता है कि जैसे चंद ने वर्णन किये हैं। देखो अद्भुत वही पदार्थ है कि जो स्वयम् तौ अद्भुत हो और दूसरों को अद्भुत ही प्रतीत हो परंतु जो आप किंचित सूक्ष्म विचार करेंगे तो आप को ज्ञात होगा कि चंद ने जो कुछ कहा है वह सत्य है अर्थात् जो आप को अद्भुत मालूम होकर असत्य निश्चय होता है वह वास्तविक सत्य ही है। जब तक मैं जो कुछ अंत में आप को कहना चाहता हूं वह नहीं कहूंगा तब तक मेरा वहां तक का कहना भी आप को अद्भुत ही प्रतीत होगा और वह वास्तव में है भी ऐसा ही क्योंकि जब तक कोई ताला कि जिस का खुलना विचार करने से भी कठिन दीखता हो और वह ऐसी सरलता से खुल न जाय कि जैसे कि “एक तिनके की ओट पहाड़" तौ वह निःसंदेह अद्भुत ही प्रतीत होगा । खैर, अब आप चंद की इस कठिनता के ताले को इस कुंजी से खोलकर अद्भुत वस्तु को देखिये, कि जो कुछ वृत्त चंद ने बीसलदेवजी की दानव कथा में लिखे हैं, वह सब उनके जीवन समय में वरते थे अर्थात् वे वाजीकरण की औषधियों के खाने, कुकर्मों के करने और सांप के काटने से बहुत ही पागल हो गये थे और उन्होंने इस पागलपने में अपने इकलौते पुत्र सारंगदेवजी तक को अपने हाथ से मारडाले थे और राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। इस वृत्तान्त को चंद ने अपनी काव्य शास्त्र संबन्धी विद्वत्ता दिखाने के लिये अद्भुत रस में लिखा है। अब आप इस प्रसंग को ध्यान देकर पढके समझ लेंगे कि महाकवि चंद ने ठीक अद्भुत रस दिखा दिया है। यह आप के ध्यान में होगा कि ग्रंथकर्ता ने पृष्ठ २३ छंद ८३ रूपक ३६ में कि जो चंद की अनेक कठिनताओं के खोलने की कुंजियों के गुच्छों में से एक बड़ा भारी गुच्छा है उस में कवि ने इस महाकाव्य को “नवं रसं" से नव रसों में लिखा कहा है कि अब यह हमारा काम है कि इस हिन्दी भाषा की महाभारत में से नवों रसों के प्रसंग खोज कर काटें। भला जो हम इस अथवा