पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ११७ दिप्पे सु नयन पुछ करि अनघ । कियौ पाप इन ध्रुव करि ॥ उप्यजै नारि अति रूप तिन । तेन खिन्न जाइ सु धर ॥ छं० ॥ ५८२ ॥ रु० ॥ ३१३ ॥
॥ ढूॅंढा का वर देकर कासी जाना, वहां दानव योनि से मुक्त हो अवतार लेना-सोमेसर की परिग्रह के प्रबंध के लिये क्षत्रियों का उत्पन्न होना-जिन में से बीस अजमेर में और अन्य अन्यत्र हुए-सोमेस के वीर पुत्र पृथ्वीराज हुए ॥
कवित्त ॥ वर दिनौ ढुंढा नरिन्द । जाय कासी तट सिद्धौ ॥ अस्त लियौ अवतार । भह रसना रस पिद्धौ ॥ सोमेसर परिगह्र । प्रबंध सित उपने पिच्चि नर ॥ हुण वीस अजमेर । विण उप्यने अपर धर ॥ सोमेस वीर सुत पिथ्थ हुच्च । ठौर ठौर जपजि वलिय ॥ विधि विधि विनान अवलोक गति । अवर सूर आए मिलिय ॥ छं० ॥ ५८३ ॥ रु० ॥ ३१४ ॥
॥ पृथ्वीराज जी के परिग्रह के सामंतों के नाम और जन्म स्थानादि का वर्णन ॥
कवित्त ॥ हुआ निक्खंभर कन्नवज्ज । जैत सन्र्ष अव्बूगढ ॥ मंडोवर परिहार । करण कंगुर चाहुत्ति दिढ ॥ बन्हि भद्र सु नागौर । चंद उप्यजि लाहौरह ॥ दिक्खिय अत्ता ताइ । विया धर सामत सोरह ॥
ज्याति । जीठू । भारीय । पति । संघारिय । संघारीय । देपे । प्रसिद्ध । कीयै । द्रूव । उप्यजी नारी । उपजी । तेन् लिंन जाइ सुधिर । तेन लिंत जासे सुधर ॥* ३१४ पाठान्तरः-दीनौ । दीधौ । सिधौ । सिंधौ । आस्ति । लीयौ । रशना । रश । सोमे- शर । परिग्रह । सिंत । शक्त । उप्पने । पिञ्च । हुए । भये । वीए । वीरा । अपने । अवर । पिद्ध । उपजि । विनांन । आय मिलीय ॥
- पाठकों को इस रूपक से फिर सावधान होकर पढ़ना चाहिये क्योंकि कवि इस रूपक से पृथ्वीराजजी के जन्मादि की कथा की भूमिका बांध कर वृत्त वर्णन करता है ॥