भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 470 में से

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पृष्ठ 129

११८ - पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व राम दे राव जालोर धर । गोइंद गढ़ धामनि यसै ॥ दाच्छिम बयानै उप्पन्नौ । प्रित्थियराज परिगह बसै ॥ छं० ॥ ५८४ ॥ रु० ॥ ३१५ ॥ ३१५ पाठान्तर :-निझर । चिनूर । कनवज । जेन सल्तप अधुगठ । दाहुलि । उपजि । अता ताय । समंता रामदे गोइद । गठ । दाहिम । वयाने । प्रियोराज । परिगह ॥ . इस रूपक से कवि ने पृथ्वीराजजी के सामंतो के नाम और उन की उत्पत्ति के स्थानादि का वर्णन करना प्रारंभ किया है। यह विषय पुरातत्त्ववेत्ताओं के ऐतिहासिक शोधों में बहुत उप- योगी होने जैसा है-किन्तु इस ग्रंथ के अकृत्रिम होने में भी एक प्रमाण रूप हो सक्ता है-और यह भी भले प्रकार ध्यान में रखने जैसी बात है कि यहां चंद अपनी उत्पत्ति लाहौर की अर्थात् “चंद उपजि लाहौरह” कहता है । इस महाकाव्य में बहुत से पंजाबी भाषा के शब्द मिलने से पुरातत्ववेत्ता विद्वान चंद की जन्मभूमि के विषय में पंजाब देश का अनुमान किया करते थे और पंजाबी अति वृद्ध यहस्थ भी अपने देश के महाकवि चंद का नाम वंश परंपरा से आज तक सुनते चले आते हैं परंतु अब हमको इस बात का निश्चय हो गया और पंजाब देश हिन्दी भाषा के काव्यों की अनुक्रमणिका में पहिली संख्या पर जाय स्थापन हुआ क्योंकि अब तक इस महाकाव्य से प्राचीन कोई अन्य काव्य नहीं उपलब्ध हुआ है । कोई २ विद्वान जो यह कहते हैं कि चंद कवि का होना केवल इसी महाकाव्य से विदित होता है । उन को अजमेर नगर के कैसरगंज में चांद बावड़ी अपने नेत्रों से देखनी चाहिये और चंद के पुरुषाओं का बनाया हुआ भाटाबाव भी उसी नगर में तारागढ को जाते हुए दृष्टि गोचर करना उचित है कि जो अजमेर के भाटों के कब्जे से निकल कर बहुत समय तक टोंक के नब्वाब साहेब के अधिकार में रहे हैं । फिर उन्होंने एक मोची को चांद बावड़ी दे दियी थी कि अब म्यूनीसीपैल कमैटी ने उस की चारों ओर की दीवार बना दियी है और इस बावड़ी के चारों ओर एक बगीचा भी था कि जिस का हांसल कुछ थोड़े दिनों तक म्यूनीसीपैलीटी में जमा होता रहा है और अब वह बगीचा कट कर वहां बस्ती बसा दियी गई है। चांद बावडी में नीचे उतरते दहिने हाथ की दीवार में प्रशस्ति का स्थान बना है कि जिस के पाषाण लेख को एक ८३ वर्ष का मुसलमान फकीर कर्नल टोड साहब का लेजाना कहता है । इस के महरावदार द्वार के दोनों ओर एक २ पत्थर के फूल खुदे हुए हैं कि जिस को अंग्रेजी में lotus अर्थात् कमल की जाति का फूल कहते हैं । यह फूल शिल्पशास्त्र के सिद्धान्तों में विज्ञ विद्वानों को बावडी की अति प्राचीनता सूचन करने वाला दृष्टि आवेगा । चंद के विषय में कुछ और भी प्रमाण हमारी रचित पृथ्वीराज रासे की प्रथम संस्ता में पाठक देख लें । इस महाकाव्य में प्रायः फारसी शब्द भी प्रयोग हुए हैं उन के विषय में हमने अन्यत्र कई एक प्रमाण प्रकाश किये हैं परंतु यह भी विशेष करके हमारे पाठकों के ध्यान में रहने जैसी बात है कि चंद जिस समय लाहौर में उत्पन्न हुआ था उस के १०० सौ वर्ष पहिले से वहां महमूददी सन्तान का राज्य था । फिर क्या कोई यह अनुमान कर सक्ता है कि उस समय की हिन्दी में एक भी फारसी भाषा का शब्द नहीं मिल सक्ता था ? इन रूपकों में जिन २ सामंतों के नाम आये हैं उन का पूरा २ वर्णन हम ग्रंथ के पूरे छप जाने पर लिखेंगे क्योंकि अभी हमारा काम केवल मूल पाठ शोध कर प्रकाश करने का है ॥