पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १२१ रजसेल चंद फन चमिय ग्रथु । सबर साचि आपन सु गढु ॥ इकदस समंत पंचह समै* । भए थान पंचस सु पहु ॥ छं० ॥ ६०३ ॥ रू० ॥ ३१७ ॥ ॥ आना राजा का उजाड़ी हुई अजमेर को फिर बसाकर राज करना ॥ दूहा ॥ अनल आनि मातह मिल्यो । कहि सब वत्त सुनाइ ॥ लोग महाजन संग लै । भूमि बसाई जाइ ॥ छं० ॥ ६०४ ॥ रू० ॥ ३१८ ॥ पद्धरी ॥ आना नरिंद अजमेर वास । संभरिय कीन सौत्रत्र रास ॥ नियमनाम कन्हा आना नरिंद । अरि धरनि वीर संध्यौ सु दंड ॥ छं० ॥ ६०५ ॥ द्यासान ग्राम तोरन उतंग । बन वढि कढि निधि निधि पुरंग ॥ पसु पंपि सद श्रुत संडलेप्त । जत्न न्हान दान ब्रह्मन सु देस ॥ छं० ॥ ६०६ ॥ हारम्य रम्य फिरि मंडि लोइ । दालिद्र दीन दीसै न कोइ ॥ चौघडि सतं वरषं प्रमान । आना नरिंद तपि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६०७ ॥ ॥ जैसींघ जी का गद्दी पर विराज राज करना ॥ पग अम्भ देम दिय पुत्त छथ्य । जैसींघदेव तपि राज तथ्थ ॥ क्रिति छत्र सीस जैसींघ देव । निधि लई वीर बीसल पनेव ॥ छं० ॥ ६०८ ॥ विंटु लीय वीर आना नरिंद । बीसल तडाग मधि द्रव्य कंद ॥ पायौ न वीर तिन द्रव्य केछ । कंचनह काम मंडाय गेह ॥ छं० ॥ ६०८ ॥ सब द्रव्य दीन तिन विप्र हस्त । भंडार धरिय धन अम्म वस्त ॥ श्रुति सुनहि श्रवन जंपत पुरान । साधरम करम चलि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६१० ॥ कत्ति नीति गरुअ गचि गरुअ मुक्कि । कुछ रीति चित्त रंचक न चुक्कि ॥ सोऽवरस अष्ट तप राज कीन । आनंद मेव सिर छत्र दीन ॥ छं० ॥ ६११ ॥ * यह पाठ हमने सं० १८४९ की पुस्तक का रक्खा है किन्तु सं० १६४७, सं० १७९० और सं० १८४५ की में "इक दस संवत पंचह समै" है कि इन में से जिसे विद्वान ठीक समझें उसे ग्रहण करें ॥ ३१८ पाठान्तर :- अनिल । अनलि । सुनाय । लोग । वसाईय । धसाइय । आय ॥ ३१९ पाठान्तर :- आनां । नरिद । नरंद । सभरीय । सोवंत्र । राशि । नांम । आंना । मंडीं। तोरन । वढि । कढि । पुरंगं । पंप । सदस्तुत । मंडलेस । न्हान । दांन । हारम्य । मंड । लोई । लोय । दारिद्र । दीन दीन । दीसे । कोई । चौ घड़ी । सत । प्रमानं । नरिंदं । चहुवांन । म्रग । हथ । हथ्थ । तथ । छत्रचीस । जैसीह । निघ । बीर संल । पनैव । बिंदुलीय । विटलीय ।