पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वीराजरासौ । १२६ कवित्त ॥ बढन वीर वीरस्स । वीर कमधज सौं जुग्यौ ॥ ता उप्पर गजराज । आइ मद मोप उपग्यौ ॥ इचित संग उब्भारि । विरचि बाची गज मध्यह ॥ जानू ठनंकिय घंट । कंठ सोभा सुभि तथ्यह ॥ गचि संग सूर नीनो हबकि । जै जै सुर आकास कहि ॥ रुधि धार कुट्टि संमुह चली । मनो मेर सरसत्ति बहि* ॥ कूं० ॥ ६५३ ॥ रु० ॥ ३३१ ॥ भंजि मुख गजराज । अप्प सेना उर धारिय† ॥ ता मध्ये सै तीन । फिरग संमुख है डारिय† ॥ ता मध्ये वाघेल । राइ रिपु सल्ल मचा भर ॥ घरी यक रन रंग । तुद्दि धर धार गही धर ॥ जित्तो सु जंग धारह धनिय । विभक्त बीर† बित्तो जहां ॥ भजि और अंत कंडे रिनह । गे राज विजपाल तहां ॥ कूं० ॥ ६५४ ॥ रु० ॥ ३३२ ॥ दूहा ॥ वीर देव सम बीर लरि । भग्गि सेन कमधज्ज ॥ ता पच्छै सोमेस पर । उड्डिसार बज रज्ज ॥ कूं० ॥ ६५५ ॥ रु० ॥ ३३३ ॥
- यह तुकें बूंदी राज के पुस्तकालय की पुस्तक सं० १८४५ की में नहीं हैं ॥ ३३१ पाठान्तर :- बीरंम । कमधंज्जे । सों । सुं । उपर । गजराजं । आय । इहत । उभारि । वाहि । मध्यह । जाय । कंति । तथ्यह । संगि । समूह । संमुह हेडा रिय । चलिय । मनहु । सति । विहि ॥ † पाठको ! हम बीसलदेवजी की दानव कथा को अद्भुत रस में कवि का लिखना टिप्पण २६० में कह आये उसी तरह इस दिल्ली के राजा अनंगपाल जी और कनौज के राजा कमधज्ज विजपाल जी की लड़ाई का वर्णन वीभत्स और वीर रसों में कवि ने लिखा है कि इस बात की वह हम को युक्ति से सूचना अपने "विभक्त बीर बित्तो जहां" वाक्य से करता है । यह महाकाव्य कवि ने नव रसों में लिखा है अतएव जहां हम आप को सचेत न भी करें वहां आप विचार कर रस को समझ लीजिएगा ॥ ३३२ पाठान्तर :- मुखं । सेनहं । धारीयं । मध । संमुह हे । संमुह ह्वै डारीय । मधे । बघेल । बघ्येल । राय । सल । तुदि । गई । गई । जितो । सं । धनीय । जिहां । बोरं । ओर । भत्तं । भित्त । कुंडै । रनह । गंद्यये । गईय । गयै । बिजैपालं तिहां ॥ ३३३ पाठान्तर :- दोहा । वीर । बीर । भग्न । कमधन्त । पिछै । पछै । सौमेस । उडी । रंज ॥ ६