भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

१३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ कमधज्ज का पराजित हो घर जाना और सोमेस का अजमेर को चलना ॥ दूहा ॥ जित्ति भत्ति भारथ्य भौ । गौ फिरि गृह कमधज्ज ॥ उप्पारे अजमेर पहुं । डोला पंच सुरज्ज ॥ छं० ॥ ६६९ ॥ रु० ॥ ३३७ ॥ ॥ अनंगपाल जी का सोमेश्वर जी को कन्यादान करना ॥ कवित्त ॥ अनंग तूंअर नरिंद । अम्म संज्यो उहंग बर ॥ सुभ सोमेस नरिंद । ग्रहन पानिंग मंडि कर ॥ हेम हय गय भार । दासि दीनी जु पंच सय ॥ सत हस्ती है सहस । धथ अप्यौ सु देस लय ॥ हिंसार कोट षच्चर विचर । सुत्ती मान्न सुरंग घन ॥ चल्यौ नरिंद अजमेर दिसि । बलि नरिंद इक बंध मन ॥ ॥ छं० ॥ ६७० ॥ रु० ॥ ३३८ ॥ ॥ सोमेश्वरजी का अजमेर आना और वहां बडा उत्सव होना ॥ कवित्त ॥ श्रृंगारिय गजराज । आय ग्रिह जीतिव जानय ॥ पछिरावन परिवार । जानि रीति माधव मानिय ॥ बाल वृद्ध जुब्बनह । सुष ग्यावत अति मंगल ॥ रुचि रुचि विविध बचन्न । परसपर जानि सुष्ष गन्न ॥ तरु अंब गोष तारुन चिविध । सषिय गोष उभ्भंय सरस ॥ प्रतिबिंब मुष राका दरस । मुछ गावत चहुआन जैस ॥ छं० ॥ ६७१ ॥ रु० ॥ ३३९ ॥ ३३७ पाठान्तर :—जिति । भिति । भारथ । भय । गय । ग्रिहं । कम धज । डौला सुरज ॥ ३३८ पाठान्तर :—अनंगपाल । तुंबर । शुभ । सोमेस । पानिग । मंडि । हैन हय गयं । जु । सित । हथी । हय । हय । सुं । देवसलय । कोट । षच्चर । षच्चह बिहार । मुत्ति । मुक्तिय । दिशि । बल ॥ ३३९ पाठान्तर :—श्रंगारीय । ग्रिहं । गृह । जीतिब । पारिवार । जानि । मांनिय । बुद्धि । जुवन्नह । मुष गांवत । मुंषि गांवत । विविधि । अचंच । जानि । सु पिंगल । ताहनि । त्रिविधि । सषीय । गोषि । उभोय । प्रति बिब मुझं राका दरसन । प्रतिव्यंब । मुष चहुंवांन । चहुवान । चहुआन ॥