पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
हम उस समय विद्वत् मंडली में प्रवेश करेंगे कि जब कोई विद्वान् उन को कृत्रिम होने का दोष देगा । देखिए जोधपुर राज्य के काल-निरूपक राजा जयचंदजी को सं० ११३२ में और शिवजी और सैतरामजी को सं० ११६८ में और जयपुर राज्य वाले पज्जूनजी को सं० ११२७ में होना आज तक निःसंदेह मानते हैं और यह संवत् भी हमारे अन्वेषण किये हुए ९१ वर्ष के अंतर के जोड़ने से सनन्द विक्रमी हो कर संप्रत काल के शोध हुए समय से मिल जाते हैं। इस के अतिरिक्त रावल समरसींजी की जिन प्रशस्तियों को हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्यामलदासजी ने अपने अनुमान के सिद्ध करने को प्रमाण में मानी हैं वह भी एक आन्तरिक हिसाब से indirectly हमारे शोध किये इस आनन्द संवत् को और उस के प्रचार को पुष्ट और सिद्ध करती हैं । देखिए और इन दो ध्रुवों को अपने ध्यान में रख लीजिए कि प्रथम तो रावल बापाजी के नाम पर सब ख्यात की पुस्तकों में सदैव से सं० १६१ लिखा चला आता है कि जिस को कर्नल टौड साहब ने तो बल्लभी के नाश से चीतोड़ प्राप्त होने तक का समय माना है और मेवाड़ के छोटे २ लड़के तक इतना अवश्य जानते हैं कि बापाजी सं० १६१ में हुए और उन्होंने १०१ वर्ष राज्य किया अथवा उनकी वय १०१ वर्ष की हुई और ऐसे आज तक के इस बड़े निश्चय के साथ सर्वसाधारणों के मानने को महामहोपाध्याय कविराजजी भी कदापि अस्वीकार नहीं कर सक्ते हैं। दूसरे रावल समरसींजी के नाम पर भी उसी तरह सर्व साधारणों के दृढ निश्चय के साथ ११०६ का संवत् ख्यातियों में लिखा हुआ बराबर चला आता है । अब आप हमारे पाठक उक्त सब प्रशस्तियों के सब संवत् अर्थात् १३३२, १३३५, १३४२ और १३४४ में से बापा जी के पूर्व का समय १६१ घटा कर देखें तो ११७१, ११७४, ११५१ और ११५३ पावेंगे कि जो हमारे आनन्द विक्रमी से मिलजाते हैं । क्या यह प्रशस्तिये भी हमारे आनन्द विक्रमी संवतों से आंतरिक हिसाब से नहीं मिल जाती हैं? यह क्यों मिल जाती हैं इस बात के भेद को हम हमारी समझ के अनुसार जानते हुए भी अभी प्रकाश नहीं करते हैं किन्तु किसी उचित समय पर उसे शास्त्रार्थ के साथ प्रकाश करके हमारे मेवाड़ राज की वंशावली को शुद्ध और प्रतिपादन कर मेवाड़ देश की एक अमूल्य सेवा करेंगे ॥ ७ सातवें यदि कोई यह तर्क करै कि राजा नन्द के विक्रमादित्यजी से पहिले अथवा पीछे होने का मतान्तर प्राचीन समय के विद्वानों में होना कुछ भी सिद्ध हो जाय तब हम यह अनुमान कर सक्ते हैं कि आनन्द और सनन्द सवतों के भेद अवश्य हो सक्ते हैं। अतएव हमारा कहना यह है कि जिस किसी को इस विषय का कुछ मतान्तर होना समझना हो वह एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के स्थापन-करनेवाले सर विलियम जोन्स साहिब Sir William Jones के लिखित The Chronology of the Hindus हिन्दुओं का काल-निरूपण नामक विषय के अंतिम दो तीन लेख-खंड अर्थात् फिकरे पढ कर समझ लें (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक २ Asiatic Researches Vol. II) परंतु स्मरण रहे कि हम राजा नन्द का विक्रम से पहिले होना हमारे देशी शास्त्रों के अनुसार मानते हैं ॥ पाठको ! रूपक ३५६ भी पुरातत्व विद्या में बडा उपयोगी है । उस में आप को मालूम होगा कि चंद यह तात्पर्य वर्णन करता है कि जिस ११०० अथवा १११५ में पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए हैं वह संख्या कैसी है कि उसी ११०० अर्थात् १११५ में धर्म-सुत हुए थे तथा उसी ११०० अथवा १११५ में विक्रमादित्यजी भी हुए थे और उसी में अर्थात् विक्रम से ११०० अथवा १११५ वर्ष पीछे पृथ्वीराज जी हुए हैं कि जिन का यह तृतीय शक मैं ने विप्रगुप्त (ब्रह्मगुप्त)