भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 470 में से

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पृष्ठ 154

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १४३ समीप कुलीन और अकुलीनों में परस्पर हाड़ बैर का होना कोई आश्चर्यदायक बात नहीं है क्योंकि यह व्यवहार सदा से चला आया है और आज भी मध्य छोटे बड़ों में विद्यमान है अर्थात् कोई अकुलीन चाहे जितनी उन्नति की दशा को क्यों न प्राप्त हो जाय और कोई कुलीन चाहे जैसा दरिद्री भी क्यों न हो जाय किन्तु वह कुलीन उस अकुलीन को संकर ही समझेगा । और इस से सदा दोनों में परस्पर द्वेष रह कर जो जब प्रबल होगा तब वह उस निर्बल को अवश्य नाश कर देगा और वे दोनों अपनी २ वंशावली में अपने २ वैरी का नाम तक नहीं गिनेंगे । इसी कारण से हमारे आर्य-काल-निरूपकों The Arya Chronologists की भी यह शैली होगई है कि जो स्वयम् कुलीन हैं अथवा कुलीनों के पक्षपाती हैं वह उस अकुलीन राजा के नाम और समय को अपनी संपादित ख्यात में नहीं लिखते हैं और उस के समय आदिक को या तो उस के आगे पीछे के किसी कुलीन राजा में मिला देते हैं अथवा ऐसे स्थलों में यह लिख देते हैं कि इतने समय तक "कटार अथवा तरवारि ने राज किया इत्यादि" । इस के अनेक उदाहरण राजपुत्रों की वंशावलियों में मिल सक्ते हैं परंतु एक ऐसा आधुनिक उदाहरण है कि जिस को सर्व साधारण जानते हैं वह मेवाड़ राज की वंशावली में बनवीर का है कि उस से ही विचार देखिये । क्या तो मेवाड़ देश के परम कुलीन महाराणाजी साहब और क्या और कुलीन उमराव सरदार और पासवानादि लोग और क्या हम जो कदाचित् मेवाड़ की ख्यात Chronicles लिखें तौ बनवीर का नाम और उस का समय हमारी कुलीन अवली में न तौ किसी २ ने मिलाया है और न हम मिलावेंगे किन्तु उस का वृत्त सब के जानने के लिये हम एक पृथक टिप्पण में लिख देंगे कि जिस से हम को पुरातत्त्ववेत्ता वृत्त का चोर न ठहरावें और जो कोई कदाचित् हम को ऐसा करने के कारण मुत्तुग्रास्सित्र अर्थात् दुराग्रही भी कहेंगे तौ हम उस को अपनी एक अति प्रिय पदवी समझ कर तथापि अभिमान करेंगे । इसी लिये कुलीन क्षत्रियों के अभिमानी चंद बरदाई ने विक्रमादित्यजी के समय में से अकुलीन मौर्य समय ९० । ८१ वर्ष का ह्रास करके शुद्ध क्षत्रिय समय ग्रहण किया है और उस का नाम विक्रम का अनन्द संवत् अर्थात् पृथ्वीराजजी का तृतीय शक रक्खा है । हम यह यहां तक भी मान कर कह सक्ते हैं कि यदि आज इस विषय को समर्थन करने को कोई भी प्रमाण न मिले तथापि चंद की निज-काल-निरूपण शैली होना तौ स्वयम् सिद्ध ही है ॥ ६ छठें चंद के प्रयोग किये हुए विक्रम के अनन्द संवत् का प्रचार बारहवें शतक तक की राजकीय व्यवहार की लिखावटों में भी हमको प्राप्त हुआ है अर्थात् हम को शोध करते २ हमारे स्वदेशी अंतिम बादशाह पृथ्वीराजजी और रावल समरसींजी और महाराणी पृथा बाईजी के कुछ पट्टे परवाने मिले हैं कि उन के संवत् भी इस महाकाव्य में लिखे संवतों से ठीक २ मिलते हैं और पृथ्वीराजजी के परवानों में जो मुहर अर्थात् छाप है उस में उन के राज्याभिषेक का सं० ११२२ लिखा है । इन परवानों के प्रतिरूप अर्थात् Photo हमने हमारी ओर से ऐशि- याटिक सोसाइटी बंगाल को भेट करने के लिये हमारे स्वदेशी परम प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डाक्टर राय बहादुर राजा राजेन्द्रलाल जी मित्र एल० एल० डी०, सी० आई० ई० के पास भेजे हैं और उन के अकृत्रिम होने के विषय में हमारे परस्पर बहुत कुछ पत्र व्यवहार हुआ है । यदि हमारे राजा साहब अकस्मात् रोग ग्रस्त न हो गये होते तो वे हमारे इस बड़े परिश्रम से प्राप्त किये हुए प्राचीन लेखों को अपने विचार सहित पुरातत्त्ववेत्ताओं की मंडली में प्रवेश किये होते । इन परवानों के अतिरिक्त हम को और भी कई एक प्रमाण प्राप्त होने की दृढाशा है कि जिन को