भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

१४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ] कर लेने के कि वर्तमान विक्रमी में से १३५ वर्ष घटाने से शालिवाहन का शक और ५६ वा ५७ घटाने से ईसवी सन् और इसी प्रकार से अन्य संवत् भी और इसी हिसाब से ईसा मसीह के ५६ वा ५७ वर्ष पहिले कोई विक्रम नाम का राजा हुआ था कि जिस का यह संवत् प्रचलित है, न तो कोई और फल निकला है और न कोई वैसा प्रामाणिक प्रत्यक्ष प्रमाण किसी को मिला है और न कोई आज दे सक्ता है कि जैसा विचारे स्वर्गवासी चंद कवि के लिखे संवतों को सिद्ध करने के लिये बड़ी धूम धाम से हम चाहते हैं । क्या यह न्याय है कि विक्रम के प्रचलित संवत् को सिद्ध करने के समय तो हम गोल माल कर जांवे और चंद के संवत् को सिद्ध करने के लिये दूसरे से प्रत्यक्ष प्रमाण मांगे ? फिर विचार कीजिए कि संस्कृत भाषा के कोषाद्रि में जो यह :- "तत्र शककारकस्य विक्रमादित्यस्य हननात् शालिवाहनस्य शक कर्तृत्वम्" लिखा प्राप्त होता है और आईन अकबरी के ग्रंथकर्त्ता ने भी यही आशय ग्रहण किया है । इस से विक्रमादित्यजी का मरण तो १३५ में होना निश्चित ही है तथा १३५ वर्ष तक राज्य करना भी स्वतः सिद्ध है । अब रहा यह कि विक्रम के संवत् का प्रारंभ उनके जन्म से अथवा गद्दी पर बैठने के दिन से अथवा गद्दी पर बैठने पीछे किसी बड़े कार्य के करने के दिन से हुआ है । यदि ज्योतिर्विदाभरण को कदाचित् सत्य होने की अपेक्षा असत्य ही मानें और उसे किसी भी समय में बना क्यों न ग्रहण करें तथापि उस के अतिरिक्त कोई अन्य प्रमाण दृष्टि में नहीं आता कि जिस के इस :- "निहन्ति यो भूतलमंडले शकान् । सपंचकोट्यञ्जदलप्रमान् कलौ ॥ स राजपुत्रः शककारको भवेत् । नृपाधिराज्ये हुतशाककर्तृ हा ॥” वाक्य के अनुसार पचपन करोड़ शकों को अथवा किसी शक-कर्त्ता को मारने से विक्रमी संवत् का प्रारंभ होना ही अति संभावित प्रतीत होता है । तदनन्तर यह अनुमान करना भी अनुचित नहीं है कि विक्रम ने कुछ अपने बालकपन में तो ऐसा बड़ा साका किया ही न होगा किन्तु उस समय उस की कम से कम २५ वर्ष की वय तो भी होगी कि १३५ + २५ = १६० एक सौ साठ वर्ष की सब वय सिद्ध होती है । निदान उसको हम पृथ्वीराजजी और समरसीजी के ९० वर्ष तक न जीव सक्ने के अनुमान की अपेक्षा से बहुत ही असंभव समझ सक्ते हैं । सारांश यही है कि चंद ने विक्रम की १६० वर्ष की वय की असम्भाव्यता से जो अपने लिखे संवतों को आनन्द संवत् संज्ञा दियी है वह अन्यथा नहीं है और प्रचलित विक्रमी संवत् कि जिस को हम सनन्द कहते हैं उस में अवश्यमेव कुछ नन्द का समय मिला हुआ है और वह चंद के संवत् को दोष देने जैसा स्वयम् निर्दोषी प्रमाण रूप नहीं है । जब कि प्रचलित विक्रमी संवत् अपने को भले प्रकार सिद्ध कर प्रमाण नहीं दे सक्ता तो वह जिस प्रकार से आज माना जाता है उसी प्रकार पृथ्वीराजरासे के संवत् ९० । ९१ वर्ष के अंतर से माने जाने में भी कुछ हानि दृष्टि नहीं आती । हमको एक बड़ा शोक इस बात का है कि यदि विद्वानों ने रूपक ३५५ और ३५६ को एक दूसरे की संगति लगा कर विचारे होते और रूपक ३५६ को बिलकुल ही न छोड़ दिया होता तो रासे के संवतों के विषय में संदेह ही नहीं हुआ होता क्योंकि वे दोनों रूपक मानों खड़े हुए पुकार २ कर कह रहे हैं कि हमारे आशय यह हैं ॥ ५ पांचवें चंद के नवें नन्द के समय को नहीं ग्रहण करने का एक यह भी प्रबल कारण सब के ध्यान में आय सक्ने जैसा है; कि महानन्द को नौ पुत्र थे, आठ तो विवाहिता रानियों से और एक चंद्रगुप्त नामक मुरा नाम की नाइन उपस्त्री से । हमारी इस बात को भी स्मरण में रखनी चाहिये कि मुरा नाम की नाइन से उत्पन्न होने के कारण चंद्रगुप्त और उस के वंशज मौर्य्य कहलाये हैं । अन्य देश देशान्तर के मनुष्यों की अपेक्षा हमारे स्वदेशीय बन्धुओं के