पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १४१
है और सुख अथवा दुःख और शुभ अथवा अशुभ के स्थूल अर्थों को प्रयोग में नहीं लेता है । व्याकरण शास्त्र की रीति से भी आनन्द और अनन्द शब्दों की प्रयोग सिद्धी में अंतर है । अब हमारे अर्थ की पुष्टि में विचार कीजिये - १ प्रथम तो विचार करने पहिले ऐसे २ दुराग्रहों से अपने २ हृदय को अपवित्र नहीं कर रखना चाहिये कि चंद ऐसा मूर्ख था कि उसे अनुस्वार और विसर्ग तक का ज्ञान न था और न वह संस्कृतादि किसी भाषा में व्युत्पन्न पंडित था और जितनी भूलें इस महाकाव्य में मिलती हैं वह सब उसने ही कियीं हैं ॥ २ दूसरे देखो कि कवि यहां विक्रम के शक की संख्या के विशेषण में अनन्द शब्द का प्रयोग करता है और यहां संख्या-वाचक अर्थ का ही प्रसंग है । और इस बात की भी कुछ अत्याव- श्यकता नहीं है कि हम यहां अनन्द को आनन्द का अपभ्रंश आदि समझ कर शुभ का ही अर्थ करें क्योंकि कवि इस के साथ ही रूपक ३५६ में स्पष्ट "तृतीय साक पृथिराज कौँ लिख्यो" कहता है । और संज्ञा वाचक आनन्द का अपभ्रंश रूप अनन्द कि जो तथापि संज्ञा वाचक ही होगा, उस का गुण वाचक अर्थ शुभ auspicious कदापि नहीं बन सक्ता ॥ ३ तीसरे इस स्थल के प्रसंग से अनन्द शब्द को अ + नन्द से बना मानना चाहिये । और अ का यहां रहित अर्थ करने के लिये इस श्लोक को प्रमाण में लेना चाहिये :- "तत्साहश्यमभावश्च, तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट प्रकीर्त्तिताः" ॥ और नन्द के नव संख्या वाचक अर्थ के ग्रहण करने को वैसे ही समझे जैसे सर्प शब्द ७ सात के वाचक की भांति "नव नन्दा भविष्यन्ति-चाणक्यो यान् हनिष्यति' स्कं० पु० । तथा श्रीधर स्वामी कृत भागवत की टीका में 'तेषां सपुत्राणां नवसंख्यत्वेन तत्तुल्य संख्या के" स्पष्ट ही है अतएव अधिक प्रमाण नहीं लिखते हैं ॥ ४ चौथे चंद का अनन्द शब्द प्रयोग करने से उस का यह आन्तरीय अभिप्राय होना ज्ञात होता है कि विक्रम का जो प्रचलित संवत् है उस की मूल संख्या में संकर राजा नन्द का कुछ समय मिला हुआ है अर्थात् वह संवत् जिस गणित के अनुसार है वह उक्त नन्द के समय सहित थी और चंद ने जिस प्रकार से काल निरूपण किया है वह नन्द के समय रहित है अर्थात् चंद का लिखा विक्रमी संवत् शुद्ध विक्रमी है । इसी लिये हमने इन दोनों संवतों को अनन्द और सनन्द नामों से इस टिप्पण भर में ग्रहण किये हैं । यदि कोई मनुष्य यह हठ कर बैठे कि हमको चंद का अनन्द संवत् केवल प्रत्यक्ष प्रमाणों से ही सिद्ध कर दिखाओ तो क्या यह हमारा उसको उत्तर देना अन्यथा होगा कि जिस प्रमाण रूप प्रचलित विक्रमी संवत् की अपेक्षा से तुम चंद के लिखे अनन्द संवत् रूपी प्रमेय को सिद्ध कराना चाहते हो तो प्रथम तुम अपने प्रमाण को वैसे ही प्रत्यक्ष प्रमाणों से निर्दोषी सिद्ध कर दिखाओ कि फिर हम उसको प्रमाण रूप मान कर चंद के अनन्द संवत् रूपी प्रमेय को सिद्ध कर उसकी अशुद्धता समझ लें; क्योंकि यह दावा तुम्हारा है कि चंद का लिखा संवत् अशुद्ध है । अतएव वादो के करने का काम हम ही करके प्रचलित विक्रमी संवत् की सत्यता की परीक्षा करते हैं । परीक्षा करने के पहिले एक यह सिद्ध हुई सी बात स्मरण कर लेनी चाहिये कि आज तक सर विलियम जोन्स, मिस्टर सैम्यूऐल डेविस, कौलब्रुक, बैन्टली, हाल, लैसन, डाक्टर भाऊ दांजी, बुलर, व्हिंटनी, अलबीरुनी, डाक्टर हंटर और डाक्टर कर्ण आदि ने जो २ शोध बड़े २ परिश्रम से विक्रमादित्यजी का ठीक समय निश्चय करने के लिये कई एक प्रकारों से अर्थात् विक्रमादित्यजी के समकालीन राजा और ग्रंथकर्ता आदि के समयादि का भी विचार करके किये हैं उन से सिवाय इस प्रकार के सिद्धान्त