पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० . पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
पृथ्वीराजरासे के अनन्द संवतों का कोष्टक ।
| पृथ्वीराजजी का | रासे में लिखे आनन्द संवत में | सनन्द और आनन्द संवतों का अंतर जोड़े | यह सनन्द संवत् हुआ उस में | पृथ्वीराजजी की शेष वय जोड़ा | परीक्षा के लिये अंतिम लड़ाई का सिद्ध संवत् |
|---|---|---|---|---|---|
| जन्म | १११५ | ९० । ९१ | १२०५ । ६ | ४३ | १२४८ । ९ |
| दिल्ली गोदजाना | ११२२ * | ९० । ९१ | १२१२ । ३ | ३६ | १२४८ । ९ |
| कै मास जुद्ध | ११४० | ९० । ९१ | १२३० । १ | १८ | १२४८ । ९ |
| कनोज जाना | ११५१ | ९० । ९१ | १२४१ । २ | ७ | १२४८ । ९ |
| अंतिम लड़ाई | ११५८ | ९० । ९१ | १२४८ । ९ | ० | १२४८ । ९ |
जो कुछ हमने यहां तक कहा है उस से और सब बातें तो हमारे पाठकों के मन में बैठ गई होंगी किन्तु ३५५ रूपक में जो अनन्द शब्द प्रयोग हुआ है उस में किसी २ को कुछ संदेह रहेगा; अतएव हम फिर उस के विषय में कुछ अधिक कहते हैं। देखो संशय करना कोई बुरी बात नहीं है किन्तु वह सिद्धान्त का मूल है । हमारे गौतम ऋषि ने अपने न्याय-दर्शन में प्रमाण और प्रमेय के पीछे संशय को एक पदार्थ माना है और उसको दूर करने के लिये ही मानो सब न्यायशास्त्र रचा गया है। यदि आनन्द का नव-संख्या-रहित का अर्थ किसी की सम्मति में ठीक नहीं जंचता हो तो उस से इस स्थल में बहुत अच्छी तरह घटता हुआ कोई दूसरा अर्थ बतलाना चाहिये । परंतु बात तब है कि वह सर्व तंत्र सिद्धान्त universally true से उसी तरह सिद्ध होसक्ता हो कि जैसे हमने यहां अपना विचार सिद्ध कर दिखाया है । सब लोग जानते हैं कि हमारे इस शोध के पहिले तक युवा और मध्य वय के कोई २ कवि लोग इस अनन्द संज्ञा वाचक शब्द का गुण वाचक अर्थ शुभ Auspicious का करते रहे हैं और चारण जाति के महामहोपाध्याय कविराज श्रीश्यामलदासजी ने भी अपने इस महाकाव्य के खंडन-ग्रंथ में यही अर्थ माना है । परंतु विद्वानों के विचारने और न्याय करने का स्थल है कि इस दोहे में आनन्द पाठ नहीं है और न छंद के लक्षण के अनुसार वह बन सक्ता है किन्तु स्पष्ट अनन्द पाठ है। यदि यहां संज्ञा वाचक आनन्द पाठ भी होता तो भी उस का गुण वाचक शुभ का अर्थ नहीं हो सक्ता था परंतु संस्कृत भाषा का थोड़ासा ज्ञान रखने वाला भी यह जान सक्ता है अथवा जिनके पास संस्कृत भाषा के कोषों की पुस्तकें हैं वह उनके बल से भी जान सक्ते हैं कि वाचस्प- त्यबृहत् संस्कृताभिधान के पृष्ठ १४९ और शब्दार्थचिंतामणि के पृष्ठ ६९ में स्पष्ट अनन्द के यह अर्थ लिखे हैं कि “त्रि० न नन्दयति नन्द, आनन्दयितृभिन्ने, अनानन्दे असुखे” इत्यादि। देखो जब अनन्द शब्द का सत्य अर्थ दुःख का है तो फिर क्या सुख और शुभ का अर्थ करना अयोग्य नहीं है । यदि कवि लोग जैसे अलंकार और नायका भेद की सूक्ष्मता जान लेने के लिये परिश्रम करते हैं वैसे ही जो सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते तो झट जान लेते कि यहां कवि गूढार्थ में संवत का भेद बता रहा
- यह संवत् हमने पृथ्वीराजजी के जो पवाने हमको मिले हैं उन की काप में लिखा हुआ है उन से ग्रहण किया है किन्तु रासे की अब तक प्राप्त हुई पुस्तकों में तो किसी में ११३८ और किसी में ११३८ लिखा मिलता है ॥