पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५६ इन रूपक ३७५ और ३७६ पर हम यह टिप्पणी अत्यन्त आनन्द के साथ लिखकर हिन्दी भाषा के महा कवि चंद वरदाई की संवत् संबन्धी बड़ी कठिनता के इस शोध को पुरातत्व वेत्ताओं की सेवा में भले प्रकार विचार करने को प्रवेश करते हैं । यद्यपि हमारे ज्योतिष शास्त्रादि के अच्छे २ विद्वान इष्ट मित्रों में से कितनेक महाशय कि जिन को यह शोध विदित हो गया है हमको First discovery प्रथम शोध करने का मान देते हैं किन्तु हम उनकी परम प्रीति और न्याय बुद्धि के साथ गुण ग्राहकता के लिये अत्यन्त आभारी होकर तथापि यह कहते हैं कि जब अन्य पुरातत्ववेत्ता विद्वान् भी हमारे इस शोध को उसके गुण दोषों का अन्वेषण करके स्वीकार करेंगे तब हम अपने को स्वकीयत्या कृत कृत्य समझेंगे । अब आप चंद की संवत् संबन्धी कठिनता को इस प्रकार से समझने का प्रयत्न करें कि प्रथम तो रूपक ३७५ को बहुत ध्यान देकर पढ़ें । तदनन्तर उसका अन्वय करके यह अर्थ करें कि (एकादस से पन्दरह) ग्यारह से पंदरह (अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनन्द साक) अनन्द विक्रम का साक अथवा विक्रम का अनन्द साक (तिथि) कि जिसमें (रिपुजय) शत्रुओं को विजय करने (पुरहरन) और नगर अथवा देश देशान्तरों को हरन करने (कौं) को (प्रिथिराज नरिंद) पृथ्वीराज नामक नरेंद्र (भय.) उत्पन्न हुए ॥ तदनन्तर इसके प्रत्येक शब्द और वाक्यखंड पर सूक्ष्म दृष्टि देकर अन्वेषण करें कि उसमें चंद की Archaic style प्राचीन गूढ भाषा होने के कारण संवत् संबन्धी कठिनता कहां और क्या घुसी हुई है। कवि के प्रतिकूल नहीं किन्तु अनुकूल विचार करने पर आप की न्याय-बुद्धि झट खोज कर पकड़ लावेगी कि विक्रम साक अनन्द वाक्यखंड में-और उसमें भी अनन्द शब्द में हम लोगों को इतने वर्षों से गड़बड़ा कर भ्रमा रखनेवाली चंद की लाघवता भरी हुई है। इतनी जड़ हाथ में आय जाने पर अनन्द शब्द के अर्थ की गहराई को ध्यान में लेकर पक्षपात रहित विचार से निश्चय कीजिये कि यहां चंद ने उसका क्या अर्थ माना है । निदान आप को समझ पड़ेगा कि अनन्द शब्द का अर्थ यहां चंद ने केवल नव-संख्या-रहित का रक्खा है अर्थात् अ = रहित और नन्द = नव ९। अब विक्रमे साक अनन्द को क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनन्द साक करके उसका अर्थ करो कि नवं-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम का नव-रहित शक अर्थात् १००-९ = ९० । ९१ अर्थात् विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ९० । ९१ से प्रारंभ हुआ है । यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैकड़ों वर्षों से यह कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तो अब तक प्रचलित है और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह कर अब अप्रचलित होगया है। और हमने भी जो कुछ इस के विषय की विशेष दंत कथा कोटां राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से सुनी थी वह इस महाकाव्य की संरता में जैसी की तैसी लिख दियो है अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं । एक तो सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है। इसी के साथ इतना यहां का यहां और भी अन्वेषण कर लीजिये कि हमारे शोध के अनुसार जो ९० । ९१ वर्ष का अंतर उक्त दोनों संवतों का प्रत्यक्ष हुआ है उसके अनुसार इस महाकाव्य के संवत् मिलते हैं कि नहीं। पाठकों को विशेष श्रम न पड़े अतएव हम स्वयम् नीचे के कोष्ठक में कुछ संवतों को सिद्ध कर दिखाते हैं:-