पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व ॥ पृथ्वीराजजी का जन्म होना सुन कर सोमेसजी का उत्सव करना ॥ दूहा ॥ सुनि सोमेस बधाइ दिय । दै गै चीर गुराव ॥ अति उछाह आनंद भरि । नृप मुख चढ़िय आव ॥ कं० ॥ ई८१ ॥ रु० ॥ ३५२ ॥ ॥ सोमेसजी का पृथ्वीराजजी को अपने घर लाने को कहना ॥ दूहा ॥ तब बुलाइ सोमेस बर । लौहानी अरु चंद ॥ लै आवहुँ अजमेर घर । पछौतै घरछ सु इंद ॥ कं० ॥ ई८२ ॥ रु० ॥ ३५३ ॥ ॥ सोमेसजी का पृथ्वीराजजी को अजमेर ले आना ॥ दूहा ॥ करि आनो * उछ्छाह किय । चलिय राज अजमेर ॥ सहस बाजि है सुभर बर । सत्त सषी मनि मेर ॥ कं० ॥ ई८३ ॥ रु० ॥ ३५४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् और उनके प्रागट्य का हेतु ॥ दूहा ॥ एकादस सै पंच दह । विक्रम साक अनंद ॥ तिच्छि रिपु जय पुर हरन कां । भय प्रथिराज नरिंद ॥ कं० ॥ ई८४ ॥ रु० ॥ ३५५ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के शक की संज्ञा का सूत्ररूप कवि का वाक्य ॥ दूहा ॥ एकादस सै पंच दह † । विक्रम जम भ्रम सुत्त ॥ छतिय साक प्रथिराज कौ । लिख्यौ विप्र गुन गुप्त ॥ कं० ॥ ई८५ ॥ रु० ॥ ३५६ ॥ ३५२ पाठान्तरः-दीय । हे । गे । बीर । भर । मुंह । चढ़ियं । आब ॥ ३५३ पाठान्तरः-चलाय । सौमेस । लौहंनी । पुर गजब अति सासनह । महन तथ कवि चंद पुरं गंञ्जन अति हरि आसनहं । पुहंन तथ कवि चंद । आवहुं । घर ।
- स्त्री को उसका पति अथवा पति के सगे संबन्धी आदि उसके पिता के घर से अपने घर लाते हैं वह आना अथवा आनो कहलाता है ॥ ३५४ पाठान्तरः-उछाह । कोय । चलीय । हे । वर सत । मति । मैर ॥ ३५५ पाठान्तरः-एकादश । सैं । सं । शाकं । तिह रिपु पुर जय हरन को । हुआ । हुय । भे । पृथीराज ॥ बूंदी वाली सं० १८४५ की पुस्तक में इसके स्थान में ३५६ रूपक है और उस के स्थान में यह है ॥ † इसकी पहिली आधी तुक का पाठ हमारे पास की सब पुस्तकों में “एकादस समये सु कृत” करके है किन्तु जो हमने रक्खा है वह बूंदी राजे की पुस्तक से उद्धृत किया है । ३५६ पाठान्तरः-एकादर्श । समये । समये । धर्म । सुंत । चौर्यांत । चौर्यान । शाके । पृथीराज । प्रथिराज । कौं ॥