भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३५ ॥ अनंगपालजी का अपनी पुत्री के पुत्र को देखना और उत्सव करना ॥ कवित्त ॥ अनग पुहवै नरेस । व्यास जग जोत बुलाइय ॥ जुगंन लिद्धि अनुजा सुत । नाम चिहु चक्क चलाइय ॥ पुप्फ पानि धरि धूप । पिध्य पाइन दो अंसह ॥ कलि अवतार कुलाह । अंसपति पारन कंसह ॥ बहु जुद्ध रुद्द कलि जुग्ग वर । श्रित सित्त दैतन भिरन ॥ कवि चंद दिली थद्द कारने । इह अपुव्व अवतार लिन ॥ छं० ॥ ६७९ ॥ रु० ॥ ३५० ॥ पुत्री पुत्र उछाह । दान मानह घन दिड्डिय ॥ धाम २* गावत धम रि । मनहु अचि वन मनि लिड्डिय ॥ कनवज जैचंद मात । भयो संभरि वचनी सुत ॥ तिन पवंत दुज पठिय । धार जर चीर थपिय युत ॥ प्रछिराहू परीघह दान दुज । किय समाप सब्वन विवरि ॥ दस दिवस रषि अप्पन अवर । अति उछाह आनंग करि ॥ छं० ॥ ६८० ॥ रु० ॥ ३५१ ॥

  • इस को कोई नई बात नहीं समझना चाहिये किन्तु बहुत पुरानी रीति है कि काव्य में जहां एक शब्द दो बार प्रयोग होता है और दो बार उस का पृथक २ प्रयोग करने से छंद टूटता हो तो उस को एक बार लिख कर उसके आगे २ दो का अंक कर देते हैं और उस से अभिप्राय यह रहता है कि उस को गद्य में करने के समय अथवा उस का अर्थ करते समय उस शब्द को दो बार प्रयोग कर लेना कि उस के गौरव का नाश न हो जाय । ऐसे प्रयोग प्राचीन कवियों के काव्यों में आते हैं परंतु अब लोगों ने उन के स्थानों में नये पाठ धर दिये हैं और इस सूक्ष्म कारण पर ध्यान नहीं दिया है । किन्तु गद्य में तो अब तक यह रीति भले प्रकार प्रचलित है ॥

३५०-५१ पाठान्तर :- अनंगपाल । पुहवी । योति । भुलाईय । लिहू । दिहू । सु । तनि । नांम चिहुं चक्र चह्नाइय । चलाईय । पुफ्फ पांनि । पिथ । पायन । द्वौ । असह । कुलांह । असपति । बहुं । जुड्डु । जुंगा । जुग । भ्यत । ध्रित सित । देतन । भिरिय । करत इह अपूरव अवतार लीय । अपुव; ॥ ३५० ॥ दांन । मांन दिह्रीय । धांम धांम । धमारि । मनहुं अदि वंत मनि लह्रीय । कनवजह । कनवज्जह । जैचंद । जेचंद । पिता बहिनी सुतनी सुत । तिम । यवंग । दुजि । पठीय । थपीय । थुति । श्रुति । पहिराय । परिग्राह । परिगह । दांन । कोय । न्येमाप । समाप । सवन । विवर । दिस । रिषि । रषि । अपन ॥