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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

१४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ] कर लेने के कि वर्तमान विक्रमी में से १३५ वर्ष घटाने से शालिवाहन का शक और ५६ वा ५७ घटाने से ईसवी सन् और इसी प्रकार से अन्य संवत् भी और इसी हिसाब से ईसा मसीह के ५६ वा ५७ वर्ष पहिले कोई विक्रम नाम का राजा हुआ था कि जिस का यह संवत् प्रचलित है, न तो कोई और फल निकला है और न कोई वैसा प्रामाणिक प्रत्यक्ष प्रमाण किसी को मिला है और न कोई आज दे सक्ता है कि जैसा विचारे स्वर्गवासी चंद कवि के लिखे संवतों को सिद्ध करने के लिये बड़ी धूम धाम से हम चाहते हैं । क्या यह न्याय है कि विक्रम के प्रचलित संवत् को सिद्ध करने के समय तो हम गोल माल कर जांवे और चंद के संवत् को सिद्ध करने के लिये दूसरे से प्रत्यक्ष प्रमाण मांगे ? फिर विचार कीजिए कि संस्कृत भाषा के कोषाद्रि में जो यह :- "तत्र शककारकस्य विक्रमादित्यस्य हननात् शालिवाहनस्य शक कर्तृत्वम्" लिखा प्राप्त होता है और आईन अकबरी के ग्रंथकर्त्ता ने भी यही आशय ग्रहण किया है । इस से विक्रमादित्यजी का मरण तो १३५ में होना निश्चित ही है तथा १३५ वर्ष तक राज्य करना भी स्वतः सिद्ध है । अब रहा यह कि विक्रम के संवत् का प्रारंभ उनके जन्म से अथवा गद्दी पर बैठने के दिन से अथवा गद्दी पर बैठने पीछे किसी बड़े कार्य के करने के दिन से हुआ है । यदि ज्योतिर्विदाभरण को कदाचित् सत्य होने की अपेक्षा असत्य ही मानें और उसे किसी भी समय में बना क्यों न ग्रहण करें तथापि उस के अतिरिक्त कोई अन्य प्रमाण दृष्टि में नहीं आता कि जिस के इस :- "निहन्ति यो भूतलमंडले शकान् । सपंचकोट्यञ्जदलप्रमान् कलौ ॥ स राजपुत्रः शककारको भवेत् । नृपाधिराज्ये हुतशाककर्तृ हा ॥” वाक्य के अनुसार पचपन करोड़ शकों को अथवा किसी शक-कर्त्ता को मारने से विक्रमी संवत् का प्रारंभ होना ही अति संभावित प्रतीत होता है । तदनन्तर यह अनुमान करना भी अनुचित नहीं है कि विक्रम ने कुछ अपने बालकपन में तो ऐसा बड़ा साका किया ही न होगा किन्तु उस समय उस की कम से कम २५ वर्ष की वय तो भी होगी कि १३५ + २५ = १६० एक सौ साठ वर्ष की सब वय सिद्ध होती है । निदान उसको हम पृथ्वीराजजी और समरसीजी के ९० वर्ष तक न जीव सक्ने के अनुमान की अपेक्षा से बहुत ही असंभव समझ सक्ते हैं । सारांश यही है कि चंद ने विक्रम की १६० वर्ष की वय की असम्भाव्यता से जो अपने लिखे संवतों को आनन्द संवत् संज्ञा दियी है वह अन्यथा नहीं है और प्रचलित विक्रमी संवत् कि जिस को हम सनन्द कहते हैं उस में अवश्यमेव कुछ नन्द का समय मिला हुआ है और वह चंद के संवत् को दोष देने जैसा स्वयम् निर्दोषी प्रमाण रूप नहीं है । जब कि प्रचलित विक्रमी संवत् अपने को भले प्रकार सिद्ध कर प्रमाण नहीं दे सक्ता तो वह जिस प्रकार से आज माना जाता है उसी प्रकार पृथ्वीराजरासे के संवत् ९० । ९१ वर्ष के अंतर से माने जाने में भी कुछ हानि दृष्टि नहीं आती । हमको एक बड़ा शोक इस बात का है कि यदि विद्वानों ने रूपक ३५५ और ३५६ को एक दूसरे की संगति लगा कर विचारे होते और रूपक ३५६ को बिलकुल ही न छोड़ दिया होता तो रासे के संवतों के विषय में संदेह ही नहीं हुआ होता क्योंकि वे दोनों रूपक मानों खड़े हुए पुकार २ कर कह रहे हैं कि हमारे आशय यह हैं ॥ ५ पांचवें चंद के नवें नन्द के समय को नहीं ग्रहण करने का एक यह भी प्रबल कारण सब के ध्यान में आय सक्ने जैसा है; कि महानन्द को नौ पुत्र थे, आठ तो विवाहिता रानियों से और एक चंद्रगुप्त नामक मुरा नाम की नाइन उपस्त्री से । हमारी इस बात को भी स्मरण में रखनी चाहिये कि मुरा नाम की नाइन से उत्पन्न होने के कारण चंद्रगुप्त और उस के वंशज मौर्य्य कहलाये हैं । अन्य देश देशान्तर के मनुष्यों की अपेक्षा हमारे स्वदेशीय बन्धुओं के

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १४३ समीप कुलीन और अकुलीनों में परस्पर हाड़ बैर का होना कोई आश्चर्यदायक बात नहीं है क्योंकि यह व्यवहार सदा से चला आया है और आज भी मध्य छोटे बड़ों में विद्यमान है अर्थात् कोई अकुलीन चाहे जितनी उन्नति की दशा को क्यों न प्राप्त हो जाय और कोई कुलीन चाहे जैसा दरिद्री भी क्यों न हो जाय किन्तु वह कुलीन उस अकुलीन को संकर ही समझेगा । और इस से सदा दोनों में परस्पर द्वेष रह कर जो जब प्रबल होगा तब वह उस निर्बल को अवश्य नाश कर देगा और वे दोनों अपनी २ वंशावली में अपने २ वैरी का नाम तक नहीं गिनेंगे । इसी कारण से हमारे आर्य-काल-निरूपकों The Arya Chronologists की भी यह शैली होगई है कि जो स्वयम् कुलीन हैं अथवा कुलीनों के पक्षपाती हैं वह उस अकुलीन राजा के नाम और समय को अपनी संपादित ख्यात में नहीं लिखते हैं और उस के समय आदिक को या तो उस के आगे पीछे के किसी कुलीन राजा में मिला देते हैं अथवा ऐसे स्थलों में यह लिख देते हैं कि इतने समय तक "कटार अथवा तरवारि ने राज किया इत्यादि" । इस के अनेक उदाहरण राजपुत्रों की वंशावलियों में मिल सक्ते हैं परंतु एक ऐसा आधुनिक उदाहरण है कि जिस को सर्व साधारण जानते हैं वह मेवाड़ राज की वंशावली में बनवीर का है कि उस से ही विचार देखिये । क्या तो मेवाड़ देश के परम कुलीन महाराणाजी साहब और क्या और कुलीन उमराव सरदार और पासवानादि लोग और क्या हम जो कदाचित् मेवाड़ की ख्यात Chronicles लिखें तौ बनवीर का नाम और उस का समय हमारी कुलीन अवली में न तौ किसी २ ने मिलाया है और न हम मिलावेंगे किन्तु उस का वृत्त सब के जानने के लिये हम एक पृथक टिप्पण में लिख देंगे कि जिस से हम को पुरातत्त्ववेत्ता वृत्त का चोर न ठहरावें और जो कोई कदाचित् हम को ऐसा करने के कारण मुत्तुग्रास्सित्र अर्थात् दुराग्रही भी कहेंगे तौ हम उस को अपनी एक अति प्रिय पदवी समझ कर तथापि अभिमान करेंगे । इसी लिये कुलीन क्षत्रियों के अभिमानी चंद बरदाई ने विक्रमादित्यजी के समय में से अकुलीन मौर्य समय ९० । ८१ वर्ष का ह्रास करके शुद्ध क्षत्रिय समय ग्रहण किया है और उस का नाम विक्रम का अनन्द संवत् अर्थात् पृथ्वीराजजी का तृतीय शक रक्खा है । हम यह यहां तक भी मान कर कह सक्ते हैं कि यदि आज इस विषय को समर्थन करने को कोई भी प्रमाण न मिले तथापि चंद की निज-काल-निरूपण शैली होना तौ स्वयम् सिद्ध ही है ॥ ६ छठें चंद के प्रयोग किये हुए विक्रम के अनन्द संवत् का प्रचार बारहवें शतक तक की राजकीय व्यवहार की लिखावटों में भी हमको प्राप्त हुआ है अर्थात् हम को शोध करते २ हमारे स्वदेशी अंतिम बादशाह पृथ्वीराजजी और रावल समरसींजी और महाराणी पृथा बाईजी के कुछ पट्टे परवाने मिले हैं कि उन के संवत् भी इस महाकाव्य में लिखे संवतों से ठीक २ मिलते हैं और पृथ्वीराजजी के परवानों में जो मुहर अर्थात् छाप है उस में उन के राज्याभिषेक का सं० ११२२ लिखा है । इन परवानों के प्रतिरूप अर्थात् Photo हमने हमारी ओर से ऐशि- याटिक सोसाइटी बंगाल को भेट करने के लिये हमारे स्वदेशी परम प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डाक्टर राय बहादुर राजा राजेन्द्रलाल जी मित्र एल० एल० डी०, सी० आई० ई० के पास भेजे हैं और उन के अकृत्रिम होने के विषय में हमारे परस्पर बहुत कुछ पत्र व्यवहार हुआ है । यदि हमारे राजा साहब अकस्मात् रोग ग्रस्त न हो गये होते तो वे हमारे इस बड़े परिश्रम से प्राप्त किये हुए प्राचीन लेखों को अपने विचार सहित पुरातत्त्ववेत्ताओं की मंडली में प्रवेश किये होते । इन परवानों के अतिरिक्त हम को और भी कई एक प्रमाण प्राप्त होने की दृढाशा है कि जिन को

१४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व

हम उस समय विद्वत् मंडली में प्रवेश करेंगे कि जब कोई विद्वान् उन को कृत्रिम होने का दोष देगा । देखिए जोधपुर राज्य के काल-निरूपक राजा जयचंदजी को सं० ११३२ में और शिवजी और सैतरामजी को सं० ११६८ में और जयपुर राज्य वाले पज्जूनजी को सं० ११२७ में होना आज तक निःसंदेह मानते हैं और यह संवत् भी हमारे अन्वेषण किये हुए ९१ वर्ष के अंतर के जोड़ने से सनन्द विक्रमी हो कर संप्रत काल के शोध हुए समय से मिल जाते हैं। इस के अतिरिक्त रावल समरसींजी की जिन प्रशस्तियों को हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्यामलदासजी ने अपने अनुमान के सिद्ध करने को प्रमाण में मानी हैं वह भी एक आन्तरिक हिसाब से indirectly हमारे शोध किये इस आनन्द संवत् को और उस के प्रचार को पुष्ट और सिद्ध करती हैं । देखिए और इन दो ध्रुवों को अपने ध्यान में रख लीजिए कि प्रथम तो रावल बापाजी के नाम पर सब ख्यात की पुस्तकों में सदैव से सं० १६१ लिखा चला आता है कि जिस को कर्नल टौड साहब ने तो बल्लभी के नाश से चीतोड़ प्राप्त होने तक का समय माना है और मेवाड़ के छोटे २ लड़के तक इतना अवश्य जानते हैं कि बापाजी सं० १६१ में हुए और उन्होंने १०१ वर्ष राज्य किया अथवा उनकी वय १०१ वर्ष की हुई और ऐसे आज तक के इस बड़े निश्चय के साथ सर्वसाधारणों के मानने को महामहोपाध्याय कविराजजी भी कदापि अस्वीकार नहीं कर सक्ते हैं। दूसरे रावल समरसींजी के नाम पर भी उसी तरह सर्व साधारणों के दृढ निश्चय के साथ ११०६ का संवत् ख्यातियों में लिखा हुआ बराबर चला आता है । अब आप हमारे पाठक उक्त सब प्रशस्तियों के सब संवत् अर्थात् १३३२, १३३५, १३४२ और १३४४ में से बापा जी के पूर्व का समय १६१ घटा कर देखें तो ११७१, ११७४, ११५१ और ११५३ पावेंगे कि जो हमारे आनन्द विक्रमी से मिलजाते हैं । क्या यह प्रशस्तिये भी हमारे आनन्द विक्रमी संवतों से आंतरिक हिसाब से नहीं मिल जाती हैं? यह क्यों मिल जाती हैं इस बात के भेद को हम हमारी समझ के अनुसार जानते हुए भी अभी प्रकाश नहीं करते हैं किन्तु किसी उचित समय पर उसे शास्त्रार्थ के साथ प्रकाश करके हमारे मेवाड़ राज की वंशावली को शुद्ध और प्रतिपादन कर मेवाड़ देश की एक अमूल्य सेवा करेंगे ॥ ७ सातवें यदि कोई यह तर्क करै कि राजा नन्द के विक्रमादित्यजी से पहिले अथवा पीछे होने का मतान्तर प्राचीन समय के विद्वानों में होना कुछ भी सिद्ध हो जाय तब हम यह अनुमान कर सक्ते हैं कि आनन्द और सनन्द सवतों के भेद अवश्य हो सक्ते हैं। अतएव हमारा कहना यह है कि जिस किसी को इस विषय का कुछ मतान्तर होना समझना हो वह एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के स्थापन-करनेवाले सर विलियम जोन्स साहिब Sir William Jones के लिखित The Chronology of the Hindus हिन्दुओं का काल-निरूपण नामक विषय के अंतिम दो तीन लेख-खंड अर्थात् फिकरे पढ कर समझ लें (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक २ Asiatic Researches Vol. II) परंतु स्मरण रहे कि हम राजा नन्द का विक्रम से पहिले होना हमारे देशी शास्त्रों के अनुसार मानते हैं ॥ पाठको ! रूपक ३५६ भी पुरातत्व विद्या में बडा उपयोगी है । उस में आप को मालूम होगा कि चंद यह तात्पर्य वर्णन करता है कि जिस ११०० अथवा १११५ में पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए हैं वह संख्या कैसी है कि उसी ११०० अर्थात् १११५ में धर्म-सुत हुए थे तथा उसी ११०० अथवा १११५ में विक्रमादित्यजी भी हुए थे और उसी में अर्थात् विक्रम से ११०० अथवा १११५ वर्ष पीछे पृथ्वीराज जी हुए हैं कि जिन का यह तृतीय शक मैं ने विप्रगुप्त (ब्रह्मगुप्त)

[ आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४५ ॥ सोमेश्वरजी के अपूर्व तप से पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए ॥ श्लोक ॥ सोमेश्वर मच्चावाहो । तस्यापूर्व तपो गुणैः ॥ तेने पुण्यं जगज्जेता । गर्भान्ते पृथुराजकम् ॥ छं० ॥ ६८६ ॥ रू० ॥ ३५७ ॥ ॥ सोमेश्वरजी को राव (वेन) को बधाई देना ॥ पहरी ॥ अनगेस पुत्रि हुअ पुत्र जन्म । विज्जन्न चमक जनु मेघ घन्म ॥ बधाइ राव * सोमेश दीन । इक सहस हेम हय हुकम कीन ॥ छं० ६८७ ॥ को गुन कर लिया है (लिख्यो विप्र तुन गुप्त) क्या चंद यह अमूल्य पुरातत्व इस रूपक में नहीं कहता है? नहीं-हम को निःसंदेह यही कहता हुआ दृष्टि आता है!! यदि यहां धर्मसुत का अर्थ युधिष्ठिर का ग्रहण हो सक्ता है तो हमारे देशी महाकवि का विक्रम से युधिष्ठिर तक का ११०० अथवा १११५ वर्ष का अंतर मानना मिस्टर वैन्टली साहब के अनुमान ११२३ के से बहुत मिलता हुआ है अर्थात् उस में केवल २३ अथवा ८ वर्ष का ही अंतर है । और यह हमारे स्वदेशी काल-निरूपकों की गणना से भी मिलता हुआ है क्योंकि ११०० अथवा १११५ युधिष्ठिर से चेमक तक तथा उम से विक्रम तक ११०० अथवा १११५ और विक्रम से पृथ्वीराजजी तक ११०० अथवा १११५ और इस गणना के अनुसार ८१४ कलि गत में युधिष्ठिर हुए । तथा चंद के कहे विप्रगुप्त कि जिस को हम ब्रह्मगुप्त होना अनुमान करते हैं उस के विषय में मिस्टर वैन्टली साहब यह कहते हैं कि वह विक्रमी ५८३ तदनुसार ५२० ई० में हुआ था । उस ने ब्रह्म-कल्प की गणना का प्रकार स्थापन और प्रकाश किया था कि जिस पर आधुनिक ज्योतिष का आधार है और ऐतिहासिक संवत् भी उसी के अनुसार परिवर्तन हुए हैं (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक ८ पृष्ठ २३६-७ See Asiatic Researches Vol VIII. page 236-7.) इस ब्रह्मगुप्त की गणित में और अन्य ज्योतिषाचार्यों के सिद्धान्तों में कुछ अंतर है कि जिस के लिये अन्य कोई २ इस ब्रह्मगुप्त को दोष देते हैं कि इस का कुछ विवरण Mr. Samuel Davis मिस्टर सैम्यूएल डेविस साहब के लिखित हिन्दुओं की ज्योतिष विद्या The Astronomical Computations of the Hindus नामक लेख के पढने से ज्ञात हो सक्ता है (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक See Asiatic Researches Vol. II.) इस संवत् सम्बन्धी झगड़े में हमारा अंतिम निवेदन यह है कि यह पुरातत्वविद्या ऐसी बड़ी सूक्ष्म और अथाह गहरी है कि जो विद्वान उस में कदाचित् थोड़ा सा भी चूक जावे तो वह उस में डूब जाता है और उस को खारे पानी के समुद्र में तिरना बहुत कठिन है और उस में पड़ी हुई किसी वस्तु को वही गोताखोर अर्थात् शोधक निकाल सकता है कि जिसे धर्मरूपी प्राण को शुद्ध अंतःकरण में स्थिति करके गोता मारने का अभ्यास होता है ॥ ३५७ पाठान्तर :-सोमेसर । सोमैस्वर । तस्या । पूर्वे । तयं । गुने । गुणो । पुन्य । जगंन्जता । गर्भानं । गर्भान । प्रथ्रिराजयं । पृथुराजयं । पृथीराजये ॥ इस रूपक के शुद्ध और अशुद्ध पाठों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने से ज्ञात हो सक्ता है कि दुष्ट लेखकों ने उन को कैसे २ भ्रष्ट कर दिये हैं कि जिस के लिये स्वर्ग वासी विचारे चंद को हम लोगों के दिये अनेक दोष सहने पड़ते हैं ॥

  • देखो मालूम होता है कि चंद यहां अपने बाप का स्पष्ट नाम नहीं लेकर मुहावरे से राव शब्द प्रयोग कर राव वेन का निर्देश करता है ॥ १०

१४६ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व दिय ग्रास एक हथ इक हत्थ । परिग्रह प्रसाद सह कीन तथ्य ॥ नीसांन वाजि दरबार जोर । घन गर्ज्ज जान दरिया हिलोर ॥ कं० ॥ ६९८ ॥ पधराइ राइ मुख दरस कीन । क्रित क्रम्म पुब्ब फल मान लीन ॥ करि जात क्रम्म मति ग्रंथ सोधि । वेदोक्त विष्प बर बुद्धि बोधि ॥ कं० ॥ ६९९ ॥ मंगल उच्चार करि नृत्य गान । अच्छरि अलाप सुर भुवन जान ॥ कं० ॥ ७०० ॥ रु० ॥ ३५८ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुणों का वर्णन ॥ साटक ॥ जन्मोत्तरि गुन जन्म राजन् वरं, चालीस वर्षं चती ॥ सा भोगं धर लक्ष्कि टिल्लति वरं, पंजाब पंचौ पथं ॥ इंद्रं प्रस्थय संभरी ववरयं, सोमेसजा जोतयं ॥ भुक्तं सुक्तय वंधि गज्जन वरं, जन्मं करं सुक्तयं ॥ कं० ॥ ७०१ ॥ रु० ॥ ३५९ ॥ ॥ सोमेसजी को पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुन सुन कर हर्ष और शोक होना ॥ कवित्त ॥ सोम वत्त सुनि श्रवन । हर्ष अरु सोक उपन्नौ ॥ दैव काल संजोग । तपै ढिल्ली घर थन्नौ ॥ कथै व्यास संभरी । क्रन्न इह वत्त प्रमानं ॥ किं जानै किं होइ । घरी इक गहन जानं ॥ खिस्मान मान संभर धनी । सुनी कित्ति अनगेस बर ॥ संची प्रमान सब इष्ट गुरु। कथै राज पृथिराज बर ॥ कं०॥ ७०२॥ रु०॥ ३६०॥ † ३५८ पाठान्तरः-अनगैस । हुव । विजलं । बिजुलि । चमक । जुंनु । मेघ । जन्म । बढ़ाय । राज । सोमेस । दीय । यांम । इक । इक । हथ । हथ । परिगह । परीग्रह । कीन । तथ । वन्नि । गर्ज्ज । जांणि । पधराय । राय । मुख । सरसन । हरष । कर्म । पुब । मंनि । क्रंम्म । मनि । वेदोक्त । विप्र । बुधि । प्रमोधि । गांम । ग्यांन । अछिर । अकर । सुरं । भूवन । जांनि ॥ ३५९ पाठान्तरः-जन्मोत्तरि । राजन्म । बर । चालीस । वर्ष । घटी । सोभाग्यं । सौभाग्यं । लक्ष्छि । दिलित । दिल्लिते । घर । पंचं । पंच । इंद्रप्रस्ख । ववरय । जोतियं । जोतियं । भुक्त । वर । जन्यं ॥ ३६० पाठान्तरः-सोम्र । वती । उपनौ । उपन्नो । दैव । संजोग । ढिल्ली । घरं । धंनो । क्रन । वत । जाने । होय । यक । घटिन । जांन समानं । संभरि । सुतिकित्ती । प्रमांन । प्रथौराज । पृथीराज ॥ † यह रूपक हमारे पास की और सब पुस्तकों में तो है किन्तु सं० १७७० वाली में नहीं है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४० ॥ विक्रम के सदृश पृथ्वीराजजी हुए कि जिन की बुद्धि का वर्णन चंद करता है ॥ दूहा ॥ विक्रम राज सरीस भा । बुधि ब्रंनन कवि चंद ॥ भूत भविष्यत बत्तमन । कहत अनूपम कंद ॥ छं० ॥ ७०३ ॥ रु० ॥ ३६१ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म समय के ग्रहों की स्थिति ॥ दूहा ॥ ग्रह स पंच चव हंस छह । लगन सु अष्टम मंद ॥ दुनिया गुरु मेषच तरनि । चिच्चह जनम नरिंद ॥ छं० ॥ ७०४ ॥ रु० ॥ ३६२ ॥ ॥ सोमेस्वरजी का दरबार में बैठ ज्योतिषियों से पृथ्वीराजजी की जन्मपत्री का फल पूछना और पंडितों का फल वर्णन करना ॥ पद्धरी ॥ दरबार बैठि सोमेस राइ । लीने हजूर जोतिग बुलाइ ॥ कछौ जन्म कर्म बालक विनोद । सुभ लगन महूरत सुनत सोद ॥ छं० ॥ ७०५ ॥ संवत्त दूक्क दस पंच अग्ग । वैसाष मास पष कृष्ण खग ॥ गुर सिद्धि जोग चिचा निषच । गर नाम करन सिसु परम चित्त ॥ छं० ॥ ७०६ ॥ ऊषा प्रकास दूक घरिय रात । पल तीस अंस चय बाल जाति ॥ गुरु वुद्ध सुक्र परि दसै थान । अष्टमै वार शनि फल विनान ॥ छं० ॥ ७०७ ॥ पंच दुअ थान परि सोम भोम । ग्यारमै राह पल करन चोम ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ बारमै सूर सो करन रंग । अनमी नमाइ तिन करै भंग ॥ विन पेस सेव रचि चैन कोइ । भंजै मिवास सुप न दिन होइ ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ पृथिराज नाम बज् हरै कुंच । दिक्षीय तषत मंडै सु कूच ॥ च्यालीस तीन तिन वर्ष साज । कलि पुछमि इंद्र उद्धार काज ॥ छं० ॥ ७१० ॥ पर लछै द्रव्य पर हरै भूमि । सुष लछै अंग जब होइ झूमि ॥ बरनीय अष्ट दुय लेय व्याह । तिनं दुग्गं तात थपि अप्प वाहि ॥ छं० ॥ ७११ ॥ ३६१ पाठान्तर :- सरीर । बुद्धि । भ्रनन । वत्तैमान ॥ ३६२ पाठान्तर :- हंस सह । लग्न । थले । गुर । तसणि जन्म । नटिन । नरिदः । अरिंद । ३६३ पाठान्तर :- सोमेस राय । हंजूर । पंडित । बुलाय । कर्म्म । बालिक । मूंहूरत । संवत् । संवतह । दूँक दस । दह द्वक । दश पंच अग्र । पंच अग्र । वैशाष । वैसाष द्वितीय । पख्य । कृष्ट' लय । सिद्धि । सिंध । जोग । योग । निच्चन । नक्षन्त्र । गुर । गुरु । सिसुं । घरी । जांति । गुरुं । दसम । दशम । यांन । अष्टमे यांन । शति । विनांन । दूअ । यांनं । सोम भौम । होम । बारमे । करण । करें । सैव । हैं । कोई । कोय । भंजे । मेवास । मैवास । सुपं । तं । होइ । नांम ।

१४८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व संक्षेप विरद उच्चार कीन । क्यौं सकौं जंपि मो बुद्धि छीन ॥ सुनि राइ दान संज्यौ अपार । है गै सु वस्त्र द्रव्या न पार ॥ छं० ॥ ७१२ ॥ सब सहर नारि श्रृंगार कीन । अप अप्प झुंड मिलि चलि नवीन ॥ थपि कनक थार भरि द्रव्य दूब । पट कूल जरफ जर कसी ऊब ॥ छं० ॥ ७१३ ॥ अछ्छित अनूप रोचन सुरंग । मृदु कमल हास लोइन कुरंग ॥ इक जात मद्धि इक फिरत गेह । पचिराइ परस पर बढत नेह ॥ छं० ॥ ७१४ ॥ दरबार भीर बरनी न जाइ । सुगंध वास नासा अघाइ ॥ बिगसंत बदन छत्तीस बंस । जदुनाथ जन्म जनु जदुन वंस ॥ छं० ॥ ७१५ ॥ रु० ॥ ३६३ ॥ हरें । स्तून । श्चत्र । दिलिय । दिल्लिय । मंडे । बूंदीवाली में=चालीस वर्ष तिन मांस साज । चालीस । पुहवि । हरे । भूम । संप । भूम । वर्णीय । वरनीय । अष्ट बल । लेइ । व्यांहि । हुंनग । ढुंग । थैपि । चाहि । विश्र्द्र । उचार । सकौ । जपि । मै। । सुंनि । राय । दांन । हय । गाय । द्रव्यान । च्चय्राम । श्रंगार । झंड । नवान । कुंल । कल । उब्ब । अक्षित । रौचन । लोइन । कुरंग । जाय । मधि । येह । नैह । जाय । सुगंध । नाशा । अघाय । विगसत । छत्रीस । यदुनाथ । यदुन । जैसे कवि चंद रूपक ३५५ और ३५६ में अपनी प्राचीन गूढ भाषा के गूढार्थ में पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् वर्णन कर आया है; वैसे ही यहां भी वह इन रूपक ३६२ और ३६३ में उन की जन्मपत्री तथा उस के ग्रहों का फलादेश वर्णन करता है । इन दोनों रूपकों के पाठ जहां तक हमारे पास की पुस्तकों से शुद्ध सके वहां तक हमने शोध दिये हैं; कि उन के इतने ही शुद्धने पर जो कई एक शंका अब तक लोग करते थे वह दूर हो गई । और जो इसी तरह और भी कुछ प्राचीन पुस्तकें मिल जावैं और उन से यह रूपक फिर शोध दिये जावैं तो आशा है कि इन रूपकों में लिखी ज्योतिष शास्त्र संबन्धी सब बात मिल जावैं और विद्वानों की जो २ शंका अब भी बाकी रहती हैं वह भी निवारण हो जांय । इस के अतिरिक्त हमारे पाठक यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस रासे जैसी भ्रष्ट लिखित प्राचीन पुस्तकों में अथवा वैसे ही कोई २ बड़े प्रतापी मनुष्यों की जन्मपत्री अथवा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस का कुछ अन्वेषण किया जावे ऐसा कुछ विषय हम को वर्त्तमान समय में कहीं लिखा हुआ प्राप्त होता है उस को यथायोग्य रीति से शोध लेना कैसा कठिन है । उस में भी फिर चंद की जैसी गूढार्थ की कठिनता और ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तियों के मतान्तर पर दृष्टि दियी जावे तो प्रत्येक सज्जन मनुष्य सुख पूर्वक कह सकता है कि यह कार्य बहुत ही कठिन है और जो कदाचित् ऐसी कठिनता का कुछ पता लगा सकें तो हमारे स्वदेशी जगत विख्यात ज्योतिष शास्त्राचार्य पंडित वर श्री बापूदेवजी शास्त्री अथवा उन के शिष्य वर्ग में से भी कोई लगा सक्ते हैं; किन्तु अन्य के वश का यह कार्य नहीं है । इस जन्मपत्री को शोधने के लिये हमने बड़ा परिश्रम कर रक्खा है अर्थात् जितने पाठान्तर रासे की भिन्न २ पुस्तकों में से मिलते जाते हैं और जितनी भिन्न २ प्रकार की पृथ्वीराजजी की जन्मपत्रियें भरतखंड में से मिलती हैं वह भी एकत्र किये जाते हैं और ब्रह्मगुप्त का रचित ज्योतिष शास्त्र का पुस्तक भी प्राप्त करने का उद्योग कर रहे हैं, कि

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[ आदि पर्व ] | पृथ्वीराजरासो । | १४६ जिस का चंद का आश्रय करना उसकी शैली से अनुमान होता है। इस प्रकार से शोध होने पर हम इस जन्मपत्री के विषय में जिन विद्वान के गणित के अनुसार जो बात निश्चय होगी वह प्रकाश करेंगे। किन्तु अभी हम कुछ उन शंकाओं के विषय में भी कहते हैं कि जो इस विषय में महामहोपाध्याय कविराज श्री श्यामलदासजी ने कवि का सरल और स्पष्ट अर्थ न समझ कर केवल प्रतिदून-अनुमान-जन्यभ्रम के वश हो अपने खंडन-ग्रंथ में कियी हैं:- १ प्रथम कविराजजी ने पृथ्वीराजजी के जन्म संवत् के प्रकाश करने वाले रूपक ३५५ के साथ का रूपक ३५६ जैसे अपने खंडन-ग्रंथ में छोड़ दिया है वैसे ही यहां भी उन्होंने रूपक ३६२ को छोड़ कर केवल रूपक ३६३ के आधार पर जन्मपत्री के संबन्धित दोष दिये हैं। इन दोनों स्थलों को हमारे विद्वान पाठक विचार कर समझ सक्ते हैं कि रूपक ३५६ और ३६२ को छोड़ देना उचित था कि नहीं और उन का रूपक ३५५ और ३६३ के साथ पूर्ण संबन्ध है कि नहीं। यदि पूर्ण संबन्ध है तो निर्णय करने के समय उन का त्याग देना किसी वास्तविक पुरातत्ववेत्ता के लिये कैसा अनुचित कर्म है ॥ २ दूसरे जो कुछ दोष इस विषय में दिये गये हैं वह मालूम होते हैं कि किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही दिये गये हैं। किन्तु मैं आशा करता हूं कि डाक्टर हार्नली साहब कि जिनों ने अपने हाथ से रासे के कुछ भाग को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि देकर शोधा है वे भले प्रकार साक्षी दे सक्ते हैं कि इस ग्रंथ के पाठान्तर, अपपाठ, विशेष पाठ और न्यून पाठ आदिक की क्या दशा है और क्या किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही किसी बात का निर्णय होना उचित है ॥ ३ तीसरे यदि रूपक ३६२ न छोड़ दिया गया होता और पुरातत्ववेत्ताओं के निर्णय करने की रीति से ध्यान दिया गया होता तो कविराजजी अपनी कितनीक शंकाओं के समाधान स्वयम् इन रूपकों और भिन्न २ पाठान्तरों से जान सक्ते थे जैसे कि:- (क) रूपक ३६२ से पृथ्वीराजजी के जन्म की दूज तिथि ज्ञात होती है। यदि तिथि की संख्या का शब्द अशुद्ध भी हो तो भी हम कवि के कहे चित्रा नक्षत्र से स्पष्ट अनुमान कर सक्ते हैं कि या तो यह दूज कवि ने पड़वा उपरान्त की ग्रहण कियी है अथवा किसी और तिथी की संख्या वहां भ्रष्ट हो गई है। हम ज्योतिष शास्त्र तो नहीं जानते हैं किन्तु हम लोग पंचद्रावड़ ब्राह्मणों में अभी तक प्राचीन प्रणाली चली आती है कि यज्ञोपवीत होने पर सात वर्ष के बालक को भी पितादि वेदाङ्गों के कुक धुवे अर्थात् गुरु सिखाये कहते हैं उन के अनुसार हम यह कह सक्ते हैं कि हमारे आर्य मासों के नाम नक्षत्रों पर से पड़े हैं और प्रत्येक महिने का नक्षत्र शुदी १४ किंवा पूनम अथवा वदी प्रतिपदा के दिवस में होता है अतएव इस दूज के स्थान में कोई ऐसी ही तिथि थी कि जो भ्रष्ट हो गई है। देखो कविराजजी ने "वैसाख तृतीय पख कृष्ण लग्न" पाठ लिखा है उस के स्थान में हम को सं० १६४७ । १७९० और १८४५ की पुस्तकों में यह "वैसाख मास पष कृष्ण लग्न वा अग्न" पाठ लिखा मिलता है और वह एक प्रकार से ठीक भी दीखता है क्योंकि रूपक ३६२ में कवि तिथि कह आया है अतएव अब वह यहां शेष मास और पक्ष कहता है। चित्रा नक्षत्र के विषय में कुछ गोलमाल किसी पुस्तक में दृष्टि नहीं आती और वैशाख के विषय में कुछ गड़बड़ सी दीखती है अतएव जो कोई चित्रा से चैत्र मास का होना अनुमान करें तो हमारी सम्मति में तो वह कोई आश्चर्य दायक बात नहीं है ॥

१५० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व (ख) कविराजजी ने कवि के कहे "बारमै सूर सो करन रंग" पर ही विशेष दोष दिया है और उसका बारहवें घर में होना असंभव माना है तथा इतनी ही बात पर दोष देकर अन्य ग्रहों का कुछ शोध नहीं किया है। परंतु जो वे रूपक ३६२ के तीसरे चरण पर कुछ थोड़ी सी भी दृष्टि देते तो उनको मालूम हो जाता कि चंद कवि मेष का सूर्य होना स्वयम् कहता है कि जो संभव भी हैं "दुतिया गुरु मेषह तरनि" इस से यह भी समझ सक्ते थे कि जब मेष का सूर्य बारहवें घर में होना कवि कहता है तब वृष लग्न भी है और "ऊषा प्रकाश इक घरिय रात" से कवि का गूढार्थ भी यह है कि पृथ्वीराजजी का सूर्योदय के पश्चात् जन्म होने से ऊषा एक घड़ी थी अर्थात् ऊषा के एक घड़ी पीछे उनका जन्म हुआ ॥ (ग) कविराजजी के खंडन ग्रंथ में 'गुरू सिद्दु जोग चित्रा नखत्त' पाठ से सिद्दु योग ग्रहण किया है कि जो चित्रा नक्षत्र के साथ वा पास आना असंभव है परंतु थोड़ी सी भी सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते अथवा पुस्तकान्तर में पाठ देखते तो कितनेक पुस्तकों में सिद्धि पाठ जैसे हम को मिल गया वैसे मिल जाता ॥ (घ) कविराजजी ने अपने खंडन ग्रंथ में बड़ी २ सूक्ष्म युक्तियों से सूक्ष्मतर अनुमान किये हैं परंतु एक इस स्थान पर वे बड़ी ही बेतरह चूक गये हैं। उन्हों ने 'गुरु नाम करन सिसु परम हित्त' का गुरु पाठ से धोखा खाकर यह अर्थ किया है कि 'गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा' किंतु यह अर्थ बिलकुल ही असत्य है। यद्यपि इस गुरु पाठ का पुस्तकान्तर में गर पाठ स्पष्ट मिलता है परंतु वह न भी मिले तथापि पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान इस छंद की प्रत्येक तुक की एक दूसरी से संगति मिला कर भले प्रकार जान सक्ते हैं कि कवि "तिथि वारं च नक्षत्रं योगं करण मेवच" के अनुसार यहां यह कहता है कि "गर नामक करण शिशु को परम हितकारी है" न कि यह कि-गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा-हमारे हे सज्जन पाठको! आप सोचो, विचारो, न्याय करो, और सत्य २ कहो कि यह महा अनर्थ करने वाली भूल है कि नहीं और जो हम इतना परिश्रम केवल स्वदेश वत्सलता से उत्थापित हो कर न करते तो हमारे देश की हिन्दी भाषा और ऐतिहासिक विद्याओं की कितनी हानि संभव थी। राजपूताने के कितनेक कवि लोग अपने को हिन्दी भाषा के काव्यों में ऐसा उत्कृष्ट समझते हैं कि मानो अन्यदेशीय उनके आगे कुछ माल ही नहीं है परंतु इस अवसर पर हमको मिस्टर जोन बीम्स साहब Mr. John Beames का यह कहना स्मरण आता है कि "The Pandits of Rajputana even do not understand Chand beyond the general drift of the poem." "राजपूताने के पंडित भी चंद के काव्य को उसके एक साधारण भावार्थ के सिवाय नहीं समझते हैं" ॥ (ङ) कविराजजी के लिखे पाठ में "पंच में थान परिसोम भोम" है और हम को पुस्तकान्तर में "पंच दुग्ग थान परि सोम भोम" पाठ मिला है। क्या इस से जन्म पत्री के ग्रहों में कुछ अंतर नहीं पड़ जाता है? और क्या जब तक कि अनेक प्राचीन पुस्तकों से इन रूपकों का पाठ मिलान कर के शुद्ध न किया जावे तब तक जन्मपत्री को अशुद्ध कह देना मानों सहसा सिद्धान्त कर लेना नहीं है? यदि कोई २ विद्यमान पुरातत्त्ववेत्ता अपने सहसा सिद्धान्त कर लेने को अच्छा समझ लेना अयोग्य नहीं समझेंगे और वे इस प्रचार को एक कलम बंद नहीं कर देंगे तो पुरातत्त्वविद्या को निःसीम हानि पहुंचनी संभव है। यहां कन्या का चंद्रमा और पृथ्वीराजजी का पृथ्विीराज नाम होने के कारण उनकी कन्या राशि का होना स्पष्ट है। और

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ। १५१ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म होने पर क्या २ आश्चर्यदायक बात हुई ॥ कवित्त ॥ भयौ जनम पृथिराज । ढुग्ग पर छरिय सिपर गुर ॥ भयौ भूमि भूचाल । धमकि धम धम्म अरिनि पुर ॥ गठन कोट सें लोट । नीर सरितन बहु वढ्ढिय ॥ भै चक भय भूमिया । चमक चक्रित चित चट्टिय ॥ घुरसान थान पन्न भल परिय । ग्रभ पात भय ग्रभनिय ॥ बेताल बीर विकसे मनह । हुंकारत पच्छ देवनिय ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ रु० ॥ ३६४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी की बाल अवस्था के चरित्रों का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वरष वधै विय बाल । पिथ्य वढ्दै इक मासह ॥ घरी दीघ पल पध्य । मास लखिय त्रप तासद्द ॥ मनिगन कंठला कंठ । महि केहरि नष सोहत ॥ घूघर वारे चिहुर । रुचिर वानी मन मोहत ॥ ज्योतिष शास्त्र के एक अचल धुवे के अनुसार यह अनुमान कर लेने का काम भी चंद ने हमारे ऊपर ही छोड़ दिया है कि कन्या के चंद्रमा के साथ केतु भी है क्योंकि राहु और केतु सदा परस्पर सात में स्थान में रहते हैं ॥ ३६४ पाठान्तर:-जन्म । प्रिथीराज । पृथीराज । प्रथ्यिराज । दुग । डुंग । भूबाल । धंम । कोट । सै । लोट । वहि । वढिय । भैचक्क भय भूमियान । भय चक्रित भूमिया । चमकि । चढिय । घुरसांन । धांन । परीय । यभ । यभ । वैताल । विकसैं । नयन । हुंकारन । दैवनीय ॥ इस रूपक में जो कुछ आश्चर्यदायक बातों के भाव कवि ने कहे हैं वह कोई वास्तविक आश्चर्य नहीं है किन्तु कवि लोग बड़े २ प्रतापी पुरुषों के जन्मादि के वर्णन में अद्भुत रस का प्राश्रय करके प्रायः ऐसा प्रसंग बांधा करते हैं । देखो जैसे यहां "धमकि धम धम्म अरिन पुर" अथवा 'घुरसान थान पल भल परिय" कवि ने कहा है । वैसे ही तबकात नासरी नामक फारसी तवारीख़ में देखो कि महमूद गज़नी जिस रात्रि को उत्पन्न हुआ था उसी समय सिन्धु नदी के किनारे के एक मंदिर का फट जाना उस में लिखा है । उस से केवल इतना ही समझ लेना चाहिये कि महमूद मंदिरों को भ्रष्ट करने और मूर्तियों को तोड़ फोड़ डालने वाला हुआ है अतएव कवि ने उस के जन्म समय भी वैसा ही उस के प्रताप का एक चिन्ह वर्णन किया है । इस रूपक में बीर और अद्भुत रस मिले हुए हैं अंतएव आतेप करने वाले अथवा किसी कोमल हृदय वाले मनुष्य के कान उस के पढ़ते ही खड़े हो जाते हैं, अर्थात्, रस अपना प्रभाव उस को प्रत्यक्ष दिखा देता है ॥ ३६५ पाठान्तर :- बघे । पिथ । बाधे । पल पलघ । पष्य । पष । लष्यीय । लषीय । घष । मनिगनि । कंठला । मधि । केहरि । सौहत । वाले कैंस । वारे केस । केसरि । सुमंडि । सुंमं । दरसन । ज्योति । ज्योति । जरत । रक । किन । हुलसि । परत ॥

· १५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व केसर सु संडि सुभ भाल छवि । दसन जोति हीरा हरत ॥ नहं तखप दुक्क थह छिन रहत । हुलसि हुलसि उठि उठि गिरत ॥ छं० ॥ ७१७ ॥ रू० ॥ ३६५ ॥ दूहा ॥ रज रंजित अंजित नयन । घुंठन डोलत भूसि ॥ लेत बलैया मात ऋषि । भरि कपोल मुख चूंमि ॥ छं० ॥ ७१८ ॥ रू० ॥ ३६६ ॥ पद्धरी ॥ अंगुरिन लग्गि रगि चलत बाल । सर मड्डि उठत गज हंस चाल ॥ मिलि बाल जाल फबि रची केलि । बढि रही दुंद जनु बीज बेलि ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ जनु रमत कमल दल अमल अंग । तप तेज बढ्ढि मुख पिच नग्ग ॥ सब देव तेज देखंत चंग । उद्धार अंग अदभुत प्रसंग ॥ छं० ॥ ७२० ॥ सँग बाल बैठि भोजन करंत । परिवार वस्तु लै हठ धरंत ॥ आदर अदब्ब सघ्धीन देत । बगसीस करत चिय परम हेत ॥ छं० ॥ ७२१ ॥ है हत्थि चढत बढ़त अनंद । मन मौज वैज कवि पढत छंद ॥ जिन हृदय कमल विद्याल चेत । छल छेद भेद तिन बुद्धि लेत ॥ छं० ॥ ७२२ ॥ पाइक्क संग कायक्क केलि । धरि धूप ध्वथं बाहंत खोलि ॥ गचि बग्ग हत्थ फेरत तुरंत । नट नृत्य निपुन धावत कुरंग ॥ छं० ॥ ७२३ ॥ जल केलि करत मिलि सजन संग । अल्लोल कलभ जनु सरति रंग ॥ पकवांन पांन सुगंध पूर । सादक्क सु सोद सुख सुखन जूर ॥ छं० ॥ ७२४ ॥ खेलत अखेट संग श्वानडोर । बग्गुर बधंत खर गोस कोर ॥ सुख घरिय पहर दिन पष मास । सोमेस सूर चित बढत आस ॥ छं० ॥ ७२५ ॥ जिम राम कृष्ण सुष नंद गेह । संभरिय राय तिम दसा देह ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रू० ॥ ३६७ ॥ ३६६ पाठान्तरः-अजांत । घूठन । डौलत । वलइया । मुंख चूंम ॥ ३६७ पाठान्तरः-लाँगि । लगि लगि । लोल । कैलि । अग । तैनि । बढि । पचिगं । पन्त्रि नग । तैज । द्वेषत । उद्दार । अद्भूत । सुरंग । संग । बैठ । करत । वस्तू । वस्त । हठि । अद्वब । सधीन । दीय । हथि । वढत । मोज । वोज । रिदे । सुहेत । विद्यां सु । छल । वेदि । भैदि । छेदिं । बुधि । पाइक । झाइक । कैलि । घोप । धौप । हथ । बाहंत । वग । हथ । नृत्य निपुन्य । तुरंग । फैलि । अलोल । सरणि । सुगंघ । पुर । षैलतं । आखेट । संगि । स्वांन । डोरि । बगुरि ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५३ कवित्त ॥ कै दसरथ गृह राम । (कै)* धाम वसुदेव कृष्ण वर ॥ कै कलि कस्यप कूप । जानि उपज्यौ किरनाकर ॥ कृष्ण गेह कै काम । (कै)* काम अंगज जनु अनुरुध ॥ (कै)* नन्न कस्यप अवतार । किधौं कौमार दृष्य रुध ॥ लपिन बत्तिस वहुतरि कला । बालु बेस पूरन सगुन ॥ क्रीडंत गिलोल्ल जब लाउ कर । (तत्र*) मार जानि चापक सु मन ॥ छं० ॥ ७२७ ॥ रु० ॥ ३६८ ॥ दूहा ॥ छुटत गिलोल्ला हथ्य तैं । परत चोट पयल्ल ॥ कमल नयन जनु कामिनी । करत कटाक्ष क्यल्ल ॥ छं० ॥ ७२८ ॥ रु० ॥ ३६६ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी का गुरु राम से सब प्रकार की विद्या सीखना ॥ दूहा ॥ कोइक दिन गुर राम पैं । पढ़ी सु विद्या अप्प ॥ चवदसु विद्या चतुर वर । लई सीप पट लिप्प ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रु० ॥ ३७० ॥ संघत । पगौस । कैरि । कोरि । धारोय । परक । पष । सोमेस । सुर । चित्त । वष्ठि । षष्ठि । रांम । कष्युं । सुभि । येह । जिम रांम नंद सुप कृष्ण येह । संभरीय । राव । दैह ॥

  • यह शब्द पाठ में विशेष हैं । ऐसे उदाहरण इस ग्रंथ की लिखित पुस्तकों में बहुत हैं और वह भी किसी २ में ऊपर से लिखे हुए हैं । इस का कारण मुझे विचार करने से यह मालूम होता है कि किसी कवि ने पढ़ने के समय अर्थ के लगाने की सुगमता के लिये इन संबन्ध के सूचन करने वाले शब्दों को संकेत की भांति लिख लिये होंगे और ऐसी पुस्तक से प्रती करने वाले लेखकों ने उन को पाठ में मिलाकर प्रती कर दियो है । इस मेरे समाधान की पुष्टि में कई एक ऐसे स्थल में मेरे पास की प्राचीन पुस्तकों में बतला सक्ता हूं । अतएव इन को कवि की भूल अथवा Poetical licence नहीं समझना चाहिये ॥ ३६८ पाठान्तरः-कैं । यिह । रांम । धांम । कैं । कश्यप । जांनि । उप्पज्ज्यौ । किरनांकरि । गेह । कांम । कांम । अनिरुद्ध । कश्यप । किधौ । किधौं । कौंमार । ईश्व । लष्यन । लषन । बत्तीस । बहोतरि । वैश । सुगन । जांनि । चांपक । सुंमन ॥ : इस रूपक की पहिली चार तुकों के चरण कई एक पुस्तकों में उलट पलट हैं जैसे कि पहिली तुक के दूसरे चरण के स्थान में तीसरी तुक का दूसरा चरण; दूसरी तुक के स्थान में चौथी तुक; तीसरी के दूसरे में पहिली का दूसरा; और चौथी के स्थान में दूसरो तुक है ॥ ३६६ पाठान्तरः-हुथ । हांथ । तैं । पयल । कांमिनी । कटाछि । कटाक्ष । कयल्ल ॥ ३७० पाठान्तरः-पंचह । पंद्रह । पंच कोइक । पै । पें । सू । चउदह । चंउदै । लइ शीपि षट लिप ॥

१५४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व पद्धरी ॥ लिखि सिष्य कुँच्चर पृथिराज राज । गुरु द्रोन पास सुत धर्म्म ताज ॥ ॐ नमो सिद्धि प्रथमं पठाय । सब भाव भेद अच्छर बताय ॥ छं० ॥ ७३० ॥ दस पंच † दिन्न अध्येन कीन । दस च्यारि सार सब सीष लीन ॥ सीषी सु कला दस अठ च्यारि । तिन नाम कहत कवि अग्ग सारि ॥ छं० ॥ ७३१ ॥ गुरु गीत बाद बाजिच नृत्य । सोचक सु वाच्य संविचार वृत्य ॥ मनि मंच जंच वास्तुक विनोद । नैपथ विलास सुनि तत्त मोद ॥ छं० ॥ ७३२ ॥ साकुन्न कला क्रीडन विसार । चिचन सु जोग कवि चवत चारु ॥ कुसु सेष कला जुत इंद्र जाल । सुचि क्रम विचार आचार लाल ॥ छं० ॥ ७३३ ॥ सौभग प्रयोग सुगंध वस्त्र । पुनरोक्त छंद वेदोक्त घस्त ॥ बानिज्ज विनय भांषित्त देस । आवद्ध जुद्ध निर्जुद्ध सेस ॥ छं० ॥ ७३४ ॥ बरनंत समय हस्ती तुरंग । नारी पुरुष पंषी विचंग ॥ भू भू कटाछ सुलेष सल्य । वृष कल्प प्रण उत्तर विजय ॥ छं० ॥ ७३५ ॥ सुभ सास्त्र कहे गनिकच पठन । लिषतव्य चिच्च कविता वचन ॥ व्याक्रन्न कथा नाटकक छंद । अविधांन दरस अलंकार बंध ॥ छं ॥ ७३६ ॥ धातक सु कर्म्म सुभ अर्थ जानि । सुर सरी कला बहुतारि बषान ॥ छं० ॥ ७३७ ॥ रू० ॥ ३७१ ॥ दूहा ॥ कला बहुत्तर करि कुसल । अति निबद्ध जिय जानि ॥ हेत आदि जानन निपुन । चतुरासीत विग्यान ॥ छं० ॥ ७३८ ॥ रू० ॥ ३७२ ॥ † इस दसपंच शब्द को पंद्रह ही दिन का वाचक नहीं समझना किन्तु कुछ दिन अथवा कुछ समय अथवा थोड़े दिनों का वाचक समझना उचित है क्योंकि रूपक ३७० में स्पष्ट कोइक दिन पाठ आय गया है ॥ ३७१ पाठान्तर :—लिपि । शिष्यि । सिषि । कुंचरं । कुंच्छर प्रिथीराज । पृथीराज । गुरं गुर । द्रोणा । पासि । ध्रम । नमः सिद्धिं । पठाइ । भैद । अष्यर । बताइ । बताई । अध्ययन । अध्यैन । दस पंच छिद्दा अध्येन कीन । सीषि । अठ । नांम । कहित । अंग । सार । गुर । नत्य । सौचक । नृत्य । वास्तुन । विनौद । नैपथ । सुंनि । तत । साकुन । शाकुंन । विस्तार । विचार । सू जोग । कुंस । युत । सोभग । प्रयोग । पुनरुक्ति । वैदोक्त वस्त । बांनिज । भाषित आवध । युद्ध । नियुद्ध । सैस । पुरुष । वचंग । भूं भूं । सुलेष ब्रष । छंद । उत्तर । विजयं । कहै । पठंन । लिषितं व्याचित्र । लिपिव्य । वचन । व्याक्रन । नाटकं । नाटिक । दरसन । अलंकार । शुभ । जांनि । जांण । वषांनि । ३७२ पाठान्तर :—बहुतरि । जांनि । जांनन । विद्धान । विग्यांन ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १५५ अरिल्ल ॥ चतुरासीत विद्यानन जानन । भर मन मन आसंका भाजन ॥ मतिचा बीर सदा मन मोदन। बहुतरे विविध छचीस विनोदन ॥ बृं० ॥ ७३८॥ दरसन श्रवन गीत बर बादी । नृत्य व्रत्य पाठक पुनि आदी ॥ लेषक वित्त बाज वक्त्रवनि । सस्त्र सास्त्र जुद्धाकर तत्वनि ॥ बृं० ॥ ७४० ॥ जुद्ध गनित पंषी गज तुरगा । आषेटक द्रूतन जल उरगा ॥ जंचन मंच मछोछ्व पचन । पुप्फ कला फल कथा सु चिचन ॥ बृं० ॥ ७४१ ॥ करन पदारथ आयुध केली । बलकरि सूचह तत्व पहेली बृं० ७४२॥ रू० ३७६॥ दूहा ॥ कमल वदन रवि तेज कर । लषन संति बत्तीस ॥ कल नित प्रति सीषत कला । आवध धरन छतीस ॥ बृं० ॥ ७४३ ॥ रू० ॥ ३७७ ॥ साटक ॥ विद्या वंस विचार सत्य विनयं, सौच्यं समाधीनता ॥ सन्मानं संस्थान सौष्य विजयं, सौजन्य सौभाग्ययं ॥ संपूर्णं च सरूप रूप प्रसनं, चित्तं सदा चारनं ॥ सांगीतं च सजोग चारु सकलं, विस्तारयंते कन्ना ॥ बृं० ॥ ७४४ ॥ रू० ॥ ३७८॥ दूहा ॥ गुन गरिष्ठ गौ विप्र प्रति । पूजक दान वरीस ॥ सव्व आदि दै निपुन अति । सास्त्रह सत्तावीस ॥ बृं० ॥ ७४५ ॥रू० ॥ ३७८॥ श्लोक ॥ संस्कृतं प्राकृतं चैव । अपभ्रंशः पिशाचिका ॥ मागधी शूरसेनी च । षट् भाषाश्चैव ज्ञायते * ॥ बृं० ॥ ७४६ ॥ रू० ॥ ३८० ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के बत्तीस लक्षणों का वर्णन ॥ श्लोक ॥ विनयीगुरजनज्ञाता । सर्वज्ञः सर्व पालकः ॥ शरीरं शोभतेश्रेष्ठं । द्वात्रिंश तस्य लक्षणम् * ॥ बृं० ॥ ७४७ ॥ रू० ॥ ३८१ ॥ ३७६ पाठान्तर :- चक्र रचिति । विद्यानंन । जांनन । भानन । मोदन । नृत्य २ । चक्रवनि । चक्रवन । शस्त्र । शास्त्र । सासत्र । युद्धा । तत्वन । युद्ध । तुरंगा । आस । पेटक । उरंगा । जञ्चन । महोच्छव । प्पफ्फ । किला । करण । केली । आयुद्ध । पहेली ॥ ३७७ पाठान्तर :- तेज । तेय । लषन । लपन । बतीस । शीषत । सीषति । आयुध आउध । रन ॥ ३७८ पाठान्तर :- सार । सौख्यं । समाधीनता । समाधानता । सनमानं । संनमान । सौजन्य । सूरूप । चारणं संगीतं । संगीत । सयोग । विस्तारयंते ॥ ३७९ पाठान्तरः- विप्र । दांन । सवद । दे । सासत्रह ॥

  • इन रूपकों के इन चौथे चरणों में ९ नव अक्षरों को देख कर कुछ आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि संस्कृत भाषा के ग्रंथों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जैसे कि दुर्गापाठ के अध्याय-२ श्लोक १ में "महिषे सुराणामधिपे" ॥ ३८१ पाठान्तर :-संस्कृतं । प्राकृतं । अपभ्रंसं । अपभ्रंसि । पिसाचिका । मांगधी । सूरसेनीं ।

१५६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व काव्यजाति ॥ अरि तर वर तुंगो । कहनार्थे कुहारो ॥ कुल कमल प्रकासो । तेज तप्तो दिनेस ॥ दरसन रस सेवी । कामिनी काम मूर्त्ति ॥ पर वर प्रति पंचं । पालनं पार्थवानां ॥ छं० ॥ ७४८ ॥ रू० ॥ ३८२ ॥ अरिल्ल ॥ सूरिज ज्यौं तप सचु कमोदन । फूलत अंग महा मन मोदन ॥ भूपति भूप प्रतापन भारी । दृढ करि रावन ज्यौं अहंकारी ॥ छं० ॥ ७४९ ॥ रू० ॥ ३८३ ॥ श्लोक ॥ ज्ञानधर्मार्थकामंच । बल शत्रू सिंघासनं ॥ समारंभचित्तेश्चैवा । भिधानं अष्टधा स्मृतं ॥ छं० ॥ ७५० ॥ रू० ॥ ३८४ ॥ दूहा ॥ पाघ वीराजत सीस पर । जरकस जोति निचाय ॥ मनौं मेर के सिषर पर । रह्यौ अछ्प्पति आय ॥ छं० ॥ ७५१ ॥ रू० ॥ ३८५ ॥ ता पर तुररा सुभत अति । कहत सोभ कवि नाथ ॥ मनु सूरिज के सीस पर । धिषन धस्यौ धनु हाथ ॥ छं० ॥ ७५२ ॥ रू० ॥ ३८६ ॥ श्रवन विराजत स्वाति सुत । करत न बनै बषान ॥ मनु कमल पत्र अयज रहै। ओस उडग्गन आन ॥ छं० ॥ ७५३ ॥ रू० ॥ ३८७ ॥ कंठ माल मोतीन की । सोभत सोभ विसाल ॥ मेरु सिषर पारस फिरत । जानि नखिचन मान ॥ छं० ॥ ७५४ ॥ रू० ॥ ३८८ ॥ मिस भौंने सु मयंक मुख । निपट विराजत नूर ॥ मनौं वीर उर काम को । उगे आनि अंकूर ॥ छं० ॥ ७५५ ॥ रू० ॥ ३८६ ॥ भाषां । चैव । ध्यायते । विनयं । जनं । ग्याता । सर्व्वज्ञं । पातकं । शरीरे । सरीरे । सोभ्यते । सोभते । अष्टं । वृत्तिक्षमपि लक्षणै ॥ ३८२ पाठान्तर :-अति । धर तुंगौ । कट्टनार्थे । कुठारौ । प्रकाशौ । तप्तौ । दिनैसः । सैवी । मूर्त्ति । पंच । पार्थवाना ॥ ३८३ पाठान्तर :-सूरिज । सुरज । ज्यो । ज्यौं । शत्रू । फूलति । भूर्प । ह्यौं ॥ ३८४ पाठान्तर :-ध्यानं । सत्रु । सिंघासनं । वत्ते चैव । अभिधानं ॥ ३८५-८६ पाठान्तर :-शीस । ज्योति । कै । शिषर । शिषर । परि । अह्व्यति । अष्टपति । जूरा । सैभै मनुं । मनौ । सूरिज । मनौं सूरज । कै । शीस पर । परि । धषन । विराजित । षषांनं । मनौ । मनौं । अयजु । रहे । औस । पयोफन । पयोकर्ण । आंनि । शोनत्व । शौभ । विशाल । सोभति । मेर । शिषर । पास । जनन । द्विज्जन । मिसि । निषट । मनोँ । कांम । कै । ऊगे । उगै । आंनि । अंकूर ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५७ अरिल्ल ॥ आनन इंदु उदोत सु मानौं । जानन भोज विचषन जानौं ॥ रवि ज्यौं सहुन के तन तापन । कामिनि कौं मकरध्वज मानन ॥ छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८० ॥ अरिल्ल ॥ जा सरनागत मानव वंछै । जा सरनागत दानव डूछै ॥ जा सरनागत देव विचारै । सो प्रिथिराज पृथीपति सारै ॥ छंदं ॥ ७५७ ॥ रु० ॥ ३८१ ॥ दूहा ॥ प्रिथ्विराज पति प्रिथ्विपति । सिर मनि कुन्नी छतीस ॥ नृप सिप पर मित जस तजै। ते गुन वरनि बतीस ॥ छंदं ॥ ७५८ ॥ रु० ॥ ३८२ ॥ तिन सहाय असुरह सुभट । सत सामंत रु सूर ॥ तिन सु कित्ति प्रगटी करन। कछी चंद कवि पूर ॥ छंदं ॥ ७५६ ॥ रु० ॥ ३८३ ॥ कवित्त ॥ चहूआन कै वंस । वीर मानिक पुच दस ॥ ता सु कित्ति कवि चंद । जनम लग्गै जंपत जस ॥ ज्यौं वीत्यौ भारत्थ । आदि अंतच त्यौं जंपौं ॥ वय वानी सु प्रमान । लग्न सगनह गुन थप्पौं ॥ ज्यौं भयौ जनम कवि चंद कौ । भयौ जनम सामंत सब ॥ इक थान मरन जनमच सु इक । चल्लहि कित्ति ससि लग्गि रव ॥ छंदं ॥ ७६० ॥ रु० ॥ ३८४ ॥ ॥ एक दिन रात्रि को चंद की स्त्रीका रस में आकर पृथ्वीराज जी की आदि से अंत तक कीर्त्ति वर्णन करने के लिये चंद को कहना ॥ गाथा ॥ समयं इक निसि चंदं । वाम वृत्त वहि रस पाई ॥ दिद्धी ईस गुनेयं । कित्ती कहो आदि अंताई ॥ छंदं ॥ ७६१ ॥ रु० ॥ ३८५ ॥ ३८० पाठान्तर :-आनंन । इंदु । इंद । उद्दोत । समानौ । मानौ । ज्ञांनन । जातन । भौज । विचख्यन । जांनो । भांन । शत्रुंन । सचुंन । कै । कांमिनी । कुं । मकरधज । मांनन ॥ ३८१ पाठान्तर :-मांनव । इच्छै । दांन । वंछैः । सरनागति । सो । प्रथ्वीराज । पृथ्विपति ॥ ३८२ पाठान्तर :-प्रिथीराज । प्रिथ्वीपति । प्रथ्वीराज पृथ्वी पति । शिर । कुंली । शिप । तजे । तै । कु तीन । छत्तीस ॥ ३८३ पाठान्तर :-आसुरह सुरह । कित ॥ ३८४ पाठान्तर :-चहुआंनारैं । चहुवाना कै । वंश । मांनिक । मानक । स । जन्म । लगे । लगै । ज्यो । वित्यौ । भारथ । ज्यो । जंप्यो । वांनी । प्रमांन । लगन लगनह । मगनं । थप्यो । जन्म । कौ । सामंत । थांन । मरेण । जन्म दिन इक । जनंम । कित्त । शसी । ससो । रिव । रवि ॥ ३८५ पाठान्तर :-यांहू । इस । कहों ॥

१५८ : पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चंद का अपने घर में कथा कहना और उस की स्त्री का उसे सुनते हुए जो स्मरण आवे वह पूछते जाना ॥ दूहा ॥ एक दिवस कवि चंद कथ । कही अपनें भौन ॥ जिम जिम श्रवनत संभरी । तिम पुछि सारंग नैन ॥ छं० ॥ ७६२ ॥ रु० ॥ ३८६ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उस से पूछना कि कौन दानव, मानव, और नृप कीर्त्ति करने के योग्य है ॥ दूहा ॥ कह्यौ. कंत सौं कंति इम । हौँ पूछौं गुन तोहि ॥ को दानव मानव सु को । को नृप कित्तिक होहि ॥ छं० ॥ ७६३ ॥ रु० ॥ ३८७ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को गूढ उपलक्षणों के द्वारा उत्तर दे कहना कि केवल हरि कीर्त्ति करने योग्य है क्योंकि उस की भक्ति के विना मुक्ति नहीं है ॥ कवित्त ॥ पेट काज चढि बंस । परैं फर हरैं अवनि पर ॥ पेट काज रिन भौम । मरै मारैं सु ठुरैं धर ॥ पेट काज बंधि भार । पार पाछारन पारैं ॥ पेट काज तरु तुंग । छिन्न परि घर पर ढारै ॥ दूति पेट काज पापी पुरुष । वधै बह लछ्की चरन ॥ नर वर सुक्रम कछा नच करै ॥ इहै उदर दुब्भर भरन ॥ छं० ॥ ७६४ ॥ रु० ॥ ३८८ ॥ ... इस रूपक से अंत तक कवि इस आदि पर्व का तो उपसंहार और दशम की कथा का प्रसंग अपनी स्त्री के वार्तालाप के द्वारा बड़े गूढार्थ में वर्णन करता है । हम आशा करते हैं कि काव्य के रसिक इस प्रसंग के दोहों और उन के अर्थ के गांभीर्य को अनुभव करके बहुत ही प्रसन्न होंगे ॥ ३८६ पाठान्तर :- सुदिन । वद । कहोय । अपनै । भौन । श्रवनंत । श्रवनन । श्ववनह । पूछीय । सारंग । नेन ॥ ३८७ पाठान्तर :- कंति । सो । सों । सौ । कंत । ईम । हौं । है । पुछ्यौँ । पूछूं । गुंन । तोहि को । दांनव । मांनव कौ । कौं । को नप । कसिं । कहोहि ॥ ३८८ पाठान्तर :- काजि । वंस । वंश । परंयइं फरअकहरैं । परहूं । फरहरहं । पेट । काजि । रन । भोमि । मरे । मारे । मरै । मरैं । मारैं । सुं । ठरे । ठरइं । पेट । काजि । पाहारम । पैटू । काजि । तरु । त्रिंच । तिन । त्रिन । परि । परिय । टारै । इन । इत । काजि । पुरुष । बंधै । बधे । लछी । चर । सुक्रमम् । कह । करहि । इहइ । ईह । भरख ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५६ कवित्त ॥ मेह बिना नहि तेह । नेह बिन गेह चरस रन ॥ पिय बिन तिय न उमंग । अंग श्रृंगार रूप रस ॥ नायक बिन नह सेन । दंत बिन भुक्ति न होई ॥ तेग त्याग तैं रहित । कछै कीरति को लोई ॥ बिन नीर मीन राजन कहूं । छवी बिन सूर तरिन ॥ मन वच क्रम तिम जानि जिय । न है मुक्ति हरि भक्ति बिन ॥ छं० ॥ ७६५ ॥ रु० ॥ ३९९ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि चित्रनेवाले को चित्र कि जिस से तू दुस्तर के पार उतरै-चहुवान की कीर्ति कविने से वह क्या रंजैगा ॥ दूहा ॥ चिचनहारे चिचि तुं । रे चतुरंगौ नाह ॥ का चहुआन सु कित्ति कवि । मन मनुष्य हरि जाह ॥ छं० ॥ ७६६ ॥ रु० ॥ ४०० ॥ कवित्त ॥ तत्त चीन पुत्तरी । पंच बंधी कर नंचै ॥ आसा नदी सपूर । जीय मनोरथ संचै ॥ बहु तरंग तिस्नाह । राग बहु ग्रेह कुरंगी ॥ का चहुआना कित्ति । कंत धीरज तिर भंगी ॥ मन मोह मूढ विस्तारि रह्यौ । चिंता तट घट भंजह्य ॥ उत्तरहि पार दुत्तर कवी । का चहुआना रंजह्य ॥ छं० ॥ ७६७ ॥ रु० ॥ ४०१ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि मैं चहुआन का ऋण उतारता हूं ॥ दूहा ॥ कहे गुपत गुन तैं भले । मो जिय हूय अंदेस ॥ रिन अप्पौ चहुआन कौ । पुब्बह पिथ्थ नरेस ॥ छं० ॥ ७६८ ॥ रु० ॥ ४०२ ॥ ३९९ पाठान्तर :- बिना । नह । तेहु । नेह । यह । गेह । पीड । त्रिय । तीय । श्रृंगार । सैन । दन्त । खिन । भुक्ति । होइ । तैग । त्याग । तै । नन । लोइ । जीवन । नही । सूरं तरिन । सूर तरिज । बच । क्रम । कम । जानि । जीय । सु न । है । नही मुक्ति हरि भक्ति बिनां ॥ ४०० पाठान्तर :- चित्रनहारे । श्रं । चहुंवांन । कवि । मनुछ ॥ ४०१ पाठान्तर :- तत्र । तत । पुतरी । पूतली । बंधा । नच्चै । नच्चै । नंदी । संपूर् । जीव । मनोरथ । वहां । संचै । बहुतं । रंग । तृस्नाह । बहुं । येह । कुरंगी । कां चहुवांना । मौह । मुंढ । यतां । भंजर्दय । उत्तरिहि । उतरहि । हुतर । कट्टी । कां । चहुवांन । रंजईय । रंजरह ॥ ४०२ पाठान्तर :- कहे । तै । तें । भलो । भलैं । मो । रंह । अंदेश । रिण । अप्पो । की । पुब्बइ पंच नरेस । पुब्बह पित्यि नरेस ॥

॥ चंद की स्त्री का कहना कि राजा को ऋण देता है तौ गोविन्द को क्यों नहीं सुमरता ॥ दूहा ॥ चिंचनहारे हेरि चिंत । चिंचन हेरि कविंद ॥ जो रिन अप्पै राज कौ । तौ सुमरै न गुविंद ॥ छं० ॥ ७६९ ॥ रु० ॥ ४०३ ॥ भ्रम जल मन संदान करि । भ्रम जल भेष न फेरि ॥ चित्त न अप्पै चित्त कौं । चिंचनहारे हेरि ॥ छं० ॥ ७७० ॥ रु० ॥ ४०४ ॥ ॥ चंद का उत्तर देना कि मैं कमलासन को देख कर अकुलाया हूं केवल भक्ति विलंब करने वाली है ॥ दूहा ॥ कमलासन देषत थक्यो । भगत विलंबन चार ॥ क्रोध अप्प सब जग ग्रसै । ग्रसंत न लग्गै वार ॥ छं० ॥ ७७१ ॥ रु० ॥ ४०५ ॥ ॥ तथा चंद का कहना कि संसार में जो कुछ और सर्वव्यापी है वह कमलासन ही है उसी की उपमा करके मैं पृथ्वीराज जी की कीर्त्ति वर्णन करता हूं ॥ भुजंगी ॥ वही तत्त चैलोक संसार सारं । वही तारनं सत्त भौ सिंध पारं ॥ जगत्तं अधारं निराधार वोची । वही अव्वदा संपदा नित्य सोची ॥ छं० ॥ ७७२॥ वही भेद संचं गजानंत लोयं । वही पूरनं ब्रह्म संसार भोयं ॥ नवं भक्ति कौ संव ही रूप धारी । भयौ ब्रह्म बुझ्यौ वही सिद्ध तारी ॥ ७७३ ॥ जगत्तं सुरत्तं वही है निनारं । वही वासना वासुदेवं प्रकारं ॥ वही भक्त हथ्थं नच्यौ कप्पिमानं । वही यै वही यै वही यै निधानं ॥ छं० ॥ ७७४ ॥ इकं एक अचिज्ज कीनें गुसांई । चवै चंद जो रंग गोव्यंद पाई ॥ वही की उपम्मा करै कित्ति भासैं । वही सब्ब संसार मज्झे प्रकासैं ॥ छं० ॥ ७७५ ॥ वही अंतरंगी सुरंगौ निनारं । वहै राज राजीव लोचन सारं ॥ छं०॥७७६ ॥ रु०॥४०६ ॥ ४०३-४०४ पाठान्तर :- चिंचनहारे चित्त तूं । कवि चंद । ज्यौ अप्पो । अपैं । को । तौ । समरै । समरि । गोविन्द ॥ ३६८ ॥ मंदा करि । भैष न फैरि । चित्तन अप्पो । अपैं । को । चिंचनहारे ॥ ४०५ पाठान्तर :- दैषत । क्रोध । सप्पै । यहै । लगो । लगै ॥ ४०६ पाठान्तर :- तत्त । तारणं । भव । सिंधु । जगतं । सोही । ऊंही । ऊही । सरदा । सोही । भेद । मंत्र । गंजा मंत । लोयं । पूरन । सोयं । भोयं । नव । भांति । शव । भयौ । जगतं । सुरंतं । हेनि । हैनि । वासता । वास । है वं । वास हेवं । भक्ति हथ्थं । कष्यिमानं । कपिमानं । नधानं । वहीं यै वही यै निधानं निधानं । इकं । अकं । अंकं । अश्चिर्ज । कीनै । कीने । गुंसाइ । गुसाई । जौ । रंगी । गोविद । उपमा । करे । भासै । कही । सकल । मझे । प्रकासै । कहै । लोवंच ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६१ ॥ चंद की स्त्री उसे कहती है कि ब्रह्म रूप ब्रह्म से देख जो उसे देखता है उसे वह दीखता है, नर की कीर्त्ति मत गा क्योंकि उस से और कोई बलवंत नहीं है ॥ दूहा ॥ ब्रह्म देषि ब्रह्मान्तरव । हरि दिषियन दिष्पाइ ॥ बिज्ज छटा अभ्यांन मन । गोपी हरि गो गाहू ॥ छं० ॥ ७७७ ॥ रु० ॥ ४०७ ॥ ब्रह्म ब्रह्म घररात वर । नर जानी न गुविंद ॥ सकल घटं घट हरि रमै । ज्यौं अनेक घट चंद ॥ छं० ॥ ७७८ ॥ रु० ॥ ४०८ ॥ जस अपजस लामिष्ट दोइ । अवगति गति न बुझाइ ॥ गोप ग्वाल वृझै नहीं । गोपन बूझी गाइ ॥ छं० ॥ ७७९ ॥ रु० ॥ ४०६ ॥ कवित्त ॥ कढ़ि मद्धियन बल कित्तौ । एक दट्टं हरि धारिय ॥ कढ़ि वासिग बल कित्तौ । सु पुनि करि नेत्रां सारिय ॥ सुमुंद कित्तौ गरुअत्त । अप्प भुज जोर छिलोरिय ॥ कित्तौक सबल मेरु गिरि । कमठ होइ पिट्ठ तौल्लिय ॥ लघु वली सेस वंमानवै । सुर असुरानन दिठ्ठ सह ॥ कवि चंद अवर बल वैम कढ़ि । कह तौ हरि बलवंत कह ॥ छं० ॥ ७८० ॥ रु० ॥ ४१० ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को उत्तर दे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस है ॥ दूहा ॥ चिय धर ज्यौ नर ज्यौ सु कवि । नर कित्ती नन गाहू ॥ अंग अंग हरि रूप रस । ब्रन दिषाइ सुनाइ ॥ छं० ॥ ७८१ ॥ रु० ॥ ४११ ॥ ४०७ पाठान्तर :- ब्रह्नांतरवर। हरिर्पादिपियन दिपायं । विन । अपांन । गौपो । गौ । पाय ॥ ४०८ पाठान्तर :- ब्रंह्म ब्रंह्म । जांनी । गोविंद । घटमै । ज्यौ । मै रामचंद्र ॥ ४०६ पाठान्तर :- लामिष्टकी । बुझाय । ग्योप । बुझो । बुझै । गौपन । बुझी । गाय ॥ ४१० पाठान्तर :- दठ्ह । धारीय । कितो । किनो । फुंनि । सारीय । सारी । समुंद । किसौ । गुरु घत्त । गुरुवत्त । अप्प य । भुज । जोर । हिलोरीय । कितक । मेरु । मेर । गिर । होइ । पिठह । तौलिय । शैस । असुरार्डन । दिठं । कहै । त । बलिवंत । कहि ॥ ४११ पाठान्तर :- चीय । सुं किती लाई । गाय । ब्रचि । दिपाई । दिपाय । सुंनाई । सुनाय ॥ २१