पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५३ कवित्त ॥ कै दसरथ गृह राम । (कै)* धाम वसुदेव कृष्ण वर ॥ कै कलि कस्यप कूप । जानि उपज्यौ किरनाकर ॥ कृष्ण गेह कै काम । (कै)* काम अंगज जनु अनुरुध ॥ (कै)* नन्न कस्यप अवतार । किधौं कौमार दृष्य रुध ॥ लपिन बत्तिस वहुतरि कला । बालु बेस पूरन सगुन ॥ क्रीडंत गिलोल्ल जब लाउ कर । (तत्र*) मार जानि चापक सु मन ॥ छं० ॥ ७२७ ॥ रु० ॥ ३६८ ॥ दूहा ॥ छुटत गिलोल्ला हथ्य तैं । परत चोट पयल्ल ॥ कमल नयन जनु कामिनी । करत कटाक्ष क्यल्ल ॥ छं० ॥ ७२८ ॥ रु० ॥ ३६६ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी का गुरु राम से सब प्रकार की विद्या सीखना ॥ दूहा ॥ कोइक दिन गुर राम पैं । पढ़ी सु विद्या अप्प ॥ चवदसु विद्या चतुर वर । लई सीप पट लिप्प ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ रु० ॥ ३७० ॥ संघत । पगौस । कैरि । कोरि । धारोय । परक । पष । सोमेस । सुर । चित्त । वष्ठि । षष्ठि । रांम । कष्युं । सुभि । येह । जिम रांम नंद सुप कृष्ण येह । संभरीय । राव । दैह ॥
- यह शब्द पाठ में विशेष हैं । ऐसे उदाहरण इस ग्रंथ की लिखित पुस्तकों में बहुत हैं और वह भी किसी २ में ऊपर से लिखे हुए हैं । इस का कारण मुझे विचार करने से यह मालूम होता है कि किसी कवि ने पढ़ने के समय अर्थ के लगाने की सुगमता के लिये इन संबन्ध के सूचन करने वाले शब्दों को संकेत की भांति लिख लिये होंगे और ऐसी पुस्तक से प्रती करने वाले लेखकों ने उन को पाठ में मिलाकर प्रती कर दियो है । इस मेरे समाधान की पुष्टि में कई एक ऐसे स्थल में मेरे पास की प्राचीन पुस्तकों में बतला सक्ता हूं । अतएव इन को कवि की भूल अथवा Poetical licence नहीं समझना चाहिये ॥ ३६८ पाठान्तरः-कैं । यिह । रांम । धांम । कैं । कश्यप । जांनि । उप्पज्ज्यौ । किरनांकरि । गेह । कांम । कांम । अनिरुद्ध । कश्यप । किधौ । किधौं । कौंमार । ईश्व । लष्यन । लषन । बत्तीस । बहोतरि । वैश । सुगन । जांनि । चांपक । सुंमन ॥ : इस रूपक की पहिली चार तुकों के चरण कई एक पुस्तकों में उलट पलट हैं जैसे कि पहिली तुक के दूसरे चरण के स्थान में तीसरी तुक का दूसरा चरण; दूसरी तुक के स्थान में चौथी तुक; तीसरी के दूसरे में पहिली का दूसरा; और चौथी के स्थान में दूसरो तुक है ॥ ३६६ पाठान्तरः-हुथ । हांथ । तैं । पयल । कांमिनी । कटाछि । कटाक्ष । कयल्ल ॥ ३७० पाठान्तरः-पंचह । पंद्रह । पंच कोइक । पै । पें । सू । चउदह । चंउदै । लइ शीपि षट लिप ॥