भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १५५ अरिल्ल ॥ चतुरासीत विद्यानन जानन । भर मन मन आसंका भाजन ॥ मतिचा बीर सदा मन मोदन। बहुतरे विविध छचीस विनोदन ॥ बृं० ॥ ७३८॥ दरसन श्रवन गीत बर बादी । नृत्य व्रत्य पाठक पुनि आदी ॥ लेषक वित्त बाज वक्त्रवनि । सस्त्र सास्त्र जुद्धाकर तत्वनि ॥ बृं० ॥ ७४० ॥ जुद्ध गनित पंषी गज तुरगा । आषेटक द्रूतन जल उरगा ॥ जंचन मंच मछोछ्व पचन । पुप्फ कला फल कथा सु चिचन ॥ बृं० ॥ ७४१ ॥ करन पदारथ आयुध केली । बलकरि सूचह तत्व पहेली बृं० ७४२॥ रू० ३७६॥ दूहा ॥ कमल वदन रवि तेज कर । लषन संति बत्तीस ॥ कल नित प्रति सीषत कला । आवध धरन छतीस ॥ बृं० ॥ ७४३ ॥ रू० ॥ ३७७ ॥ साटक ॥ विद्या वंस विचार सत्य विनयं, सौच्यं समाधीनता ॥ सन्मानं संस्थान सौष्य विजयं, सौजन्य सौभाग्ययं ॥ संपूर्णं च सरूप रूप प्रसनं, चित्तं सदा चारनं ॥ सांगीतं च सजोग चारु सकलं, विस्तारयंते कन्ना ॥ बृं० ॥ ७४४ ॥ रू० ॥ ३७८॥ दूहा ॥ गुन गरिष्ठ गौ विप्र प्रति । पूजक दान वरीस ॥ सव्व आदि दै निपुन अति । सास्त्रह सत्तावीस ॥ बृं० ॥ ७४५ ॥रू० ॥ ३७८॥ श्लोक ॥ संस्कृतं प्राकृतं चैव । अपभ्रंशः पिशाचिका ॥ मागधी शूरसेनी च । षट् भाषाश्चैव ज्ञायते * ॥ बृं० ॥ ७४६ ॥ रू० ॥ ३८० ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के बत्तीस लक्षणों का वर्णन ॥ श्लोक ॥ विनयीगुरजनज्ञाता । सर्वज्ञः सर्व पालकः ॥ शरीरं शोभतेश्रेष्ठं । द्वात्रिंश तस्य लक्षणम् * ॥ बृं० ॥ ७४७ ॥ रू० ॥ ३८१ ॥ ३७६ पाठान्तर :- चक्र रचिति । विद्यानंन । जांनन । भानन । मोदन । नृत्य २ । चक्रवनि । चक्रवन । शस्त्र । शास्त्र । सासत्र । युद्धा । तत्वन । युद्ध । तुरंगा । आस । पेटक । उरंगा । जञ्चन । महोच्छव । प्पफ्फ । किला । करण । केली । आयुद्ध । पहेली ॥ ३७७ पाठान्तर :- तेज । तेय । लषन । लपन । बतीस । शीषत । सीषति । आयुध आउध । रन ॥ ३७८ पाठान्तर :- सार । सौख्यं । समाधीनता । समाधानता । सनमानं । संनमान । सौजन्य । सूरूप । चारणं संगीतं । संगीत । सयोग । विस्तारयंते ॥ ३७९ पाठान्तरः- विप्र । दांन । सवद । दे । सासत्रह ॥

  • इन रूपकों के इन चौथे चरणों में ९ नव अक्षरों को देख कर कुछ आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि संस्कृत भाषा के ग्रंथों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जैसे कि दुर्गापाठ के अध्याय-२ श्लोक १ में "महिषे सुराणामधिपे" ॥ ३८१ पाठान्तर :-संस्कृतं । प्राकृतं । अपभ्रंसं । अपभ्रंसि । पिसाचिका । मांगधी । सूरसेनीं ।