भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १५६ कवित्त ॥ मेह बिना नहि तेह । नेह बिन गेह चरस रन ॥ पिय बिन तिय न उमंग । अंग श्रृंगार रूप रस ॥ नायक बिन नह सेन । दंत बिन भुक्ति न होई ॥ तेग त्याग तैं रहित । कछै कीरति को लोई ॥ बिन नीर मीन राजन कहूं । छवी बिन सूर तरिन ॥ मन वच क्रम तिम जानि जिय । न है मुक्ति हरि भक्ति बिन ॥ छं० ॥ ७६५ ॥ रु० ॥ ३९९ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि चित्रनेवाले को चित्र कि जिस से तू दुस्तर के पार उतरै-चहुवान की कीर्ति कविने से वह क्या रंजैगा ॥ दूहा ॥ चिचनहारे चिचि तुं । रे चतुरंगौ नाह ॥ का चहुआन सु कित्ति कवि । मन मनुष्य हरि जाह ॥ छं० ॥ ७६६ ॥ रु० ॥ ४०० ॥ कवित्त ॥ तत्त चीन पुत्तरी । पंच बंधी कर नंचै ॥ आसा नदी सपूर । जीय मनोरथ संचै ॥ बहु तरंग तिस्नाह । राग बहु ग्रेह कुरंगी ॥ का चहुआना कित्ति । कंत धीरज तिर भंगी ॥ मन मोह मूढ विस्तारि रह्यौ । चिंता तट घट भंजह्य ॥ उत्तरहि पार दुत्तर कवी । का चहुआना रंजह्य ॥ छं० ॥ ७६७ ॥ रु० ॥ ४०१ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि मैं चहुआन का ऋण उतारता हूं ॥ दूहा ॥ कहे गुपत गुन तैं भले । मो जिय हूय अंदेस ॥ रिन अप्पौ चहुआन कौ । पुब्बह पिथ्थ नरेस ॥ छं० ॥ ७६८ ॥ रु० ॥ ४०२ ॥ ३९९ पाठान्तर :- बिना । नह । तेहु । नेह । यह । गेह । पीड । त्रिय । तीय । श्रृंगार । सैन । दन्त । खिन । भुक्ति । होइ । तैग । त्याग । तै । नन । लोइ । जीवन । नही । सूरं तरिन । सूर तरिज । बच । क्रम । कम । जानि । जीय । सु न । है । नही मुक्ति हरि भक्ति बिनां ॥ ४०० पाठान्तर :- चित्रनहारे । श्रं । चहुंवांन । कवि । मनुछ ॥ ४०१ पाठान्तर :- तत्र । तत । पुतरी । पूतली । बंधा । नच्चै । नच्चै । नंदी । संपूर् । जीव । मनोरथ । वहां । संचै । बहुतं । रंग । तृस्नाह । बहुं । येह । कुरंगी । कां चहुवांना । मौह । मुंढ । यतां । भंजर्दय । उत्तरिहि । उतरहि । हुतर । कट्टी । कां । चहुवांन । रंजईय । रंजरह ॥ ४०२ पाठान्तर :- कहे । तै । तें । भलो । भलैं । मो । रंह । अंदेश । रिण । अप्पो । की । पुब्बइ पंच नरेस । पुब्बह पित्यि नरेस ॥