पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ : पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चंद का अपने घर में कथा कहना और उस की स्त्री का उसे सुनते हुए जो स्मरण आवे वह पूछते जाना ॥ दूहा ॥ एक दिवस कवि चंद कथ । कही अपनें भौन ॥ जिम जिम श्रवनत संभरी । तिम पुछि सारंग नैन ॥ छं० ॥ ७६२ ॥ रु० ॥ ३८६ ॥ ॥ चंद की स्त्री का उस से पूछना कि कौन दानव, मानव, और नृप कीर्त्ति करने के योग्य है ॥ दूहा ॥ कह्यौ. कंत सौं कंति इम । हौँ पूछौं गुन तोहि ॥ को दानव मानव सु को । को नृप कित्तिक होहि ॥ छं० ॥ ७६३ ॥ रु० ॥ ३८७ ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को गूढ उपलक्षणों के द्वारा उत्तर दे कहना कि केवल हरि कीर्त्ति करने योग्य है क्योंकि उस की भक्ति के विना मुक्ति नहीं है ॥ कवित्त ॥ पेट काज चढि बंस । परैं फर हरैं अवनि पर ॥ पेट काज रिन भौम । मरै मारैं सु ठुरैं धर ॥ पेट काज बंधि भार । पार पाछारन पारैं ॥ पेट काज तरु तुंग । छिन्न परि घर पर ढारै ॥ दूति पेट काज पापी पुरुष । वधै बह लछ्की चरन ॥ नर वर सुक्रम कछा नच करै ॥ इहै उदर दुब्भर भरन ॥ छं० ॥ ७६४ ॥ रु० ॥ ३८८ ॥ ... इस रूपक से अंत तक कवि इस आदि पर्व का तो उपसंहार और दशम की कथा का प्रसंग अपनी स्त्री के वार्तालाप के द्वारा बड़े गूढार्थ में वर्णन करता है । हम आशा करते हैं कि काव्य के रसिक इस प्रसंग के दोहों और उन के अर्थ के गांभीर्य को अनुभव करके बहुत ही प्रसन्न होंगे ॥ ३८६ पाठान्तर :- सुदिन । वद । कहोय । अपनै । भौन । श्रवनंत । श्रवनन । श्ववनह । पूछीय । सारंग । नेन ॥ ३८७ पाठान्तर :- कंति । सो । सों । सौ । कंत । ईम । हौं । है । पुछ्यौँ । पूछूं । गुंन । तोहि को । दांनव । मांनव कौ । कौं । को नप । कसिं । कहोहि ॥ ३८८ पाठान्तर :- काजि । वंस । वंश । परंयइं फरअकहरैं । परहूं । फरहरहं । पेट । काजि । रन । भोमि । मरे । मारे । मरै । मरैं । मारैं । सुं । ठरे । ठरइं । पेट । काजि । पाहारम । पैटू । काजि । तरु । त्रिंच । तिन । त्रिन । परि । परिय । टारै । इन । इत । काजि । पुरुष । बंधै । बधे । लछी । चर । सुक्रमम् । कह । करहि । इहइ । ईह । भरख ॥