पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४० ॥ विक्रम के सदृश पृथ्वीराजजी हुए कि जिन की बुद्धि का वर्णन चंद करता है ॥ दूहा ॥ विक्रम राज सरीस भा । बुधि ब्रंनन कवि चंद ॥ भूत भविष्यत बत्तमन । कहत अनूपम कंद ॥ छं० ॥ ७०३ ॥ रु० ॥ ३६१ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म समय के ग्रहों की स्थिति ॥ दूहा ॥ ग्रह स पंच चव हंस छह । लगन सु अष्टम मंद ॥ दुनिया गुरु मेषच तरनि । चिच्चह जनम नरिंद ॥ छं० ॥ ७०४ ॥ रु० ॥ ३६२ ॥ ॥ सोमेस्वरजी का दरबार में बैठ ज्योतिषियों से पृथ्वीराजजी की जन्मपत्री का फल पूछना और पंडितों का फल वर्णन करना ॥ पद्धरी ॥ दरबार बैठि सोमेस राइ । लीने हजूर जोतिग बुलाइ ॥ कछौ जन्म कर्म बालक विनोद । सुभ लगन महूरत सुनत सोद ॥ छं० ॥ ७०५ ॥ संवत्त दूक्क दस पंच अग्ग । वैसाष मास पष कृष्ण खग ॥ गुर सिद्धि जोग चिचा निषच । गर नाम करन सिसु परम चित्त ॥ छं० ॥ ७०६ ॥ ऊषा प्रकास दूक घरिय रात । पल तीस अंस चय बाल जाति ॥ गुरु वुद्ध सुक्र परि दसै थान । अष्टमै वार शनि फल विनान ॥ छं० ॥ ७०७ ॥ पंच दुअ थान परि सोम भोम । ग्यारमै राह पल करन चोम ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ बारमै सूर सो करन रंग । अनमी नमाइ तिन करै भंग ॥ विन पेस सेव रचि चैन कोइ । भंजै मिवास सुप न दिन होइ ॥ छं० ॥ ७०८ ॥ पृथिराज नाम बज् हरै कुंच । दिक्षीय तषत मंडै सु कूच ॥ च्यालीस तीन तिन वर्ष साज । कलि पुछमि इंद्र उद्धार काज ॥ छं० ॥ ७१० ॥ पर लछै द्रव्य पर हरै भूमि । सुष लछै अंग जब होइ झूमि ॥ बरनीय अष्ट दुय लेय व्याह । तिनं दुग्गं तात थपि अप्प वाहि ॥ छं० ॥ ७११ ॥ ३६१ पाठान्तर :- सरीर । बुद्धि । भ्रनन । वत्तैमान ॥ ३६२ पाठान्तर :- हंस सह । लग्न । थले । गुर । तसणि जन्म । नटिन । नरिदः । अरिंद । ३६३ पाठान्तर :- सोमेस राय । हंजूर । पंडित । बुलाय । कर्म्म । बालिक । मूंहूरत । संवत् । संवतह । दूँक दस । दह द्वक । दश पंच अग्र । पंच अग्र । वैशाष । वैसाष द्वितीय । पख्य । कृष्ट' लय । सिद्धि । सिंध । जोग । योग । निच्चन । नक्षन्त्र । गुर । गुरु । सिसुं । घरी । जांति । गुरुं । दसम । दशम । यांन । अष्टमे यांन । शति । विनांन । दूअ । यांनं । सोम भौम । होम । बारमे । करण । करें । सैव । हैं । कोई । कोय । भंजे । मेवास । मैवास । सुपं । तं । होइ । नांम ।