भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६१ ॥ चंद की स्त्री उसे कहती है कि ब्रह्म रूप ब्रह्म से देख जो उसे देखता है उसे वह दीखता है, नर की कीर्त्ति मत गा क्योंकि उस से और कोई बलवंत नहीं है ॥ दूहा ॥ ब्रह्म देषि ब्रह्मान्तरव । हरि दिषियन दिष्पाइ ॥ बिज्ज छटा अभ्यांन मन । गोपी हरि गो गाहू ॥ छं० ॥ ७७७ ॥ रु० ॥ ४०७ ॥ ब्रह्म ब्रह्म घररात वर । नर जानी न गुविंद ॥ सकल घटं घट हरि रमै । ज्यौं अनेक घट चंद ॥ छं० ॥ ७७८ ॥ रु० ॥ ४०८ ॥ जस अपजस लामिष्ट दोइ । अवगति गति न बुझाइ ॥ गोप ग्वाल वृझै नहीं । गोपन बूझी गाइ ॥ छं० ॥ ७७९ ॥ रु० ॥ ४०६ ॥ कवित्त ॥ कढ़ि मद्धियन बल कित्तौ । एक दट्टं हरि धारिय ॥ कढ़ि वासिग बल कित्तौ । सु पुनि करि नेत्रां सारिय ॥ सुमुंद कित्तौ गरुअत्त । अप्प भुज जोर छिलोरिय ॥ कित्तौक सबल मेरु गिरि । कमठ होइ पिट्ठ तौल्लिय ॥ लघु वली सेस वंमानवै । सुर असुरानन दिठ्ठ सह ॥ कवि चंद अवर बल वैम कढ़ि । कह तौ हरि बलवंत कह ॥ छं० ॥ ७८० ॥ रु० ॥ ४१० ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को उत्तर दे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस है ॥ दूहा ॥ चिय धर ज्यौ नर ज्यौ सु कवि । नर कित्ती नन गाहू ॥ अंग अंग हरि रूप रस । ब्रन दिषाइ सुनाइ ॥ छं० ॥ ७८१ ॥ रु० ॥ ४११ ॥ ४०७ पाठान्तर :- ब्रह्नांतरवर। हरिर्पादिपियन दिपायं । विन । अपांन । गौपो । गौ । पाय ॥ ४०८ पाठान्तर :- ब्रंह्म ब्रंह्म । जांनी । गोविंद । घटमै । ज्यौ । मै रामचंद्र ॥ ४०६ पाठान्तर :- लामिष्टकी । बुझाय । ग्योप । बुझो । बुझै । गौपन । बुझी । गाय ॥ ४१० पाठान्तर :- दठ्ह । धारीय । कितो । किनो । फुंनि । सारीय । सारी । समुंद । किसौ । गुरु घत्त । गुरुवत्त । अप्प य । भुज । जोर । हिलोरीय । कितक । मेरु । मेर । गिर । होइ । पिठह । तौलिय । शैस । असुरार्डन । दिठं । कहै । त । बलिवंत । कहि ॥ ४११ पाठान्तर :- चीय । सुं किती लाई । गाय । ब्रचि । दिपाई । दिपाय । सुंनाई । सुनाय ॥ २१