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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६१ ॥ चंद की स्त्री उसे कहती है कि ब्रह्म रूप ब्रह्म से देख जो उसे देखता है उसे वह दीखता है, नर की कीर्त्ति मत गा क्योंकि उस से और कोई बलवंत नहीं है ॥ दूहा ॥ ब्रह्म देषि ब्रह्मान्तरव । हरि दिषियन दिष्पाइ ॥ बिज्ज छटा अभ्यांन मन । गोपी हरि गो गाहू ॥ छं० ॥ ७७७ ॥ रु० ॥ ४०७ ॥ ब्रह्म ब्रह्म घररात वर । नर जानी न गुविंद ॥ सकल घटं घट हरि रमै । ज्यौं अनेक घट चंद ॥ छं० ॥ ७७८ ॥ रु० ॥ ४०८ ॥ जस अपजस लामिष्ट दोइ । अवगति गति न बुझाइ ॥ गोप ग्वाल वृझै नहीं । गोपन बूझी गाइ ॥ छं० ॥ ७७९ ॥ रु० ॥ ४०६ ॥ कवित्त ॥ कढ़ि मद्धियन बल कित्तौ । एक दट्टं हरि धारिय ॥ कढ़ि वासिग बल कित्तौ । सु पुनि करि नेत्रां सारिय ॥ सुमुंद कित्तौ गरुअत्त । अप्प भुज जोर छिलोरिय ॥ कित्तौक सबल मेरु गिरि । कमठ होइ पिट्ठ तौल्लिय ॥ लघु वली सेस वंमानवै । सुर असुरानन दिठ्ठ सह ॥ कवि चंद अवर बल वैम कढ़ि । कह तौ हरि बलवंत कह ॥ छं० ॥ ७८० ॥ रु० ॥ ४१० ॥ ॥ चंद का अपनी स्त्री को उत्तर दे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस है ॥ दूहा ॥ चिय धर ज्यौ नर ज्यौ सु कवि । नर कित्ती नन गाहू ॥ अंग अंग हरि रूप रस । ब्रन दिषाइ सुनाइ ॥ छं० ॥ ७८१ ॥ रु० ॥ ४११ ॥ ४०७ पाठान्तर :- ब्रह्नांतरवर। हरिर्पादिपियन दिपायं । विन । अपांन । गौपो । गौ । पाय ॥ ४०८ पाठान्तर :- ब्रंह्म ब्रंह्म । जांनी । गोविंद । घटमै । ज्यौ । मै रामचंद्र ॥ ४०६ पाठान्तर :- लामिष्टकी । बुझाय । ग्योप । बुझो । बुझै । गौपन । बुझी । गाय ॥ ४१० पाठान्तर :- दठ्ह । धारीय । कितो । किनो । फुंनि । सारीय । सारी । समुंद । किसौ । गुरु घत्त । गुरुवत्त । अप्प य । भुज । जोर । हिलोरीय । कितक । मेरु । मेर । गिर । होइ । पिठह । तौलिय । शैस । असुरार्डन । दिठं । कहै । त । बलिवंत । कहि ॥ ४११ पाठान्तर :- चीय । सुं किती लाई । गाय । ब्रचि । दिपाई । दिपाय । सुंनाई । सुनाय ॥ २१

१६२ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस वर्णन कर दिखाओ ॥ दूहा ॥ अंग अंग हरि रूप रस । विविधि विवेक वरेन ॥ सुकति समर्प्पन कंत रस । जुग तिनि जोग सरेन ॥ छं० ॥ ७८२ ॥ रु० ॥ ४१२ ॥ ॥ चंद का उत्तर दे कहना कि कान दे सुन मैं वर्णन कर दिखाता हूं ॥ दूहा ॥ कह्यो आंसि सौं कंत इम । जो पूछै तंत ओचि ॥ कान धरौ रसना सरसं । बन्नि दिषाऊं तोचि ॥ छं० ॥ ७८३ ॥ रु० ॥ ४१३ ॥ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथ्वीराज रासो को आदि पर्व्वनाम प्रस्ताव संपूर्ण ॥ ४१२ पाठान्तर :- विविध । वरचं । सुगति । जुंग । जोग । सरचं ॥ ४१३ पाठान्तर :- आंमिन । सौ । जो । पुछइ । पुछै । कांन । दिषांऊं नौहि ॥

॥ उपसंहारिणी टिप्पणी ॥ यद्यपि इस महाकाव्य के महाकवि चंद बरदाई ने इस आदि पद्य का उपसंहार अपनी निज काव्य-रचन-शैली के अनुसार ३८५ रूपक से लेकर ४१३ तक में बड़े गूढ़ार्थ के साथ वर्णन कर दिया है परंतु यह भी उचित और अत्यावश्यक है कि हम भी हमारी शैली के अनुसार हमारी टिप्पणी के उपसंहारार्थ कुछ थोड़ा सा अपने पाठकों की सेवा में सविनय निवेदन करें कि जिस से सर्व साधारणों को हिन्दीभाषा के इस महाकाव्य का कुछ स्वरूप-ज्ञान हो ॥ इस महाकाव्य का नाम पृथ्वीराजरासो है और यह दो शब्दों से मिलकर बना है अर्थात् पृथ्वीराज और रासो। इस संज्ञा का अर्थ यह होता है कि "पृथ्वीराज का रासो"। ग्रंथकर्त्ता ने पृथ्वीराज नामक संज्ञा से, हमारे उन पृथ्वीराजजी चौहान को अपने इस महाकाव्य का नायक [ग्रंथ-संज्ञा] वर्णन किया है, कि जो विक्रम के बारहवें शतक में हमारे स्वदेशी अंतिम राजरा- जेश्वर अर्थात् बादशाह हुए हैं; कि जिन की शूरवीरता का अभिमान आज तक प्रत्येक आर्य को है, और जिन के नाम का ओटा रात्रिदिन की बोल चाल में हमारे देश के सर्व साधारण दिया करते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वे एक कैसे बड़े कट्टर आर्य और शूरवीर राजा हुए हैं; कि जिनों ने सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी को कई बार घोर युद्ध कर २ के पराजित किया था परंतु होनहार परम बलवान होती है कि जिस से अचिंतित घटनां भी झट उपस्थित हो जाती है। देखो, ईश्वरही की इच्छा हिन्दुओं की बादशाहत स्थिर रखने की न थी, कि दैवयोग से पृथ्वीराजजी चौहान जैसे शूरवीर राजा, सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी के हाथ से, अपनी अंतिम लड़ाई में, अंत को प्राप्त हुए। वह भी फिर कैसे-कि वे हिन्दुओं की बादशाहत के सब ठाठ पाटरूपी सर्वस्व को मानो अपने साथ ही लोकान्तर में लेगये और जगत को यह निर्देश कर गये कि लौकिक में जो प्रायः यह कहा करते हैं कि किसी के अंत समय उसके साथ कुछ नहीं जाता है यह एक प्रकार से असत्य है-अब रहा हिन्दी रासो शब्द वह संस्कृत रास अथवा रासक से है और संस्कृत भाषा में रास के "शब्द, ध्वनि, क्रीडा श्रृंखला, विलास, गर्जन नृत्य और कोलाहल आदि" के अर्थ और रासक के काव्य अथवा दृश्यकाव्यादि के अर्थ परम प्रसिद्ध हैं। मालूम होता है कि ग्रंथकार ने संस्कृत भारत शब्द के सदृश रासो शब्द को भावार्थ से महाकाव्य के अर्थ में ग्रहण कर प्रयोग किया है। यह रासो शब्द आज कल की ब्रज भाषा में भी अप्रचलित नहीं है किन्तु अन्वेषण करने से वह काव्य के अर्थ के अतिरिक्त अन्य अनेक अर्थों में भी प्रयोग होता हुआ विद्वानों को दृष्टि आवेगा, जैसे:-"हमने चौदैके गदर को एक रासो जोड़ौ है-कल बहादर सिंघजी की बैठक में चंदर नैं गदर कौ रासो गायो हो-फिर मैं ने भरतपुर के राजा सूरजमल को रासो गायो सो सब देखते ही रह गये-अंजी ये कहा रासो है-मैं तो कल्ल एक रासे मैं फंस गयौ या सूं तुम्हारे वहां नाँय आय सक्यौ-अजी रामगोपाल बड़ौ दिवारिया है, वाके रासे में फंस कैं रुपैया मत बिगाड़ दीजो-हमने आज घिन कौ रासो निमटांय दीनौ है-देखो साब! रासे के संग रासो है, बुरो मत मानौं"-तथा लुगाइयें भी गाया करती हैं।

१६४ उपसंहारिणी टिप्पणी । गीत ॥ मत काची तोन्ह रखियो घानी नान्द कहंगी आँत रासा गुर राख, पक्कावा, मत काचा । इत्यादि ॥ १ ॥ जिण लोगन की रास उठेगी तोन्ह के खाक उठावेगा, हल जोत, नहीं पछतावेगा । इत्यादि ॥ २ ॥ २ यद्यपि इस महाकाव्य का केवल नाम सुनते ही उस का विषय यह प्रतीत होने लगता है कि उस में पृथ्वीराजजी चौहान के जन्म से लेकर मरण तक के ही सब चरित्र वर्णन किये गये हैं; [विषय] परंतु उस के गर्भित वृत्तों की परीक्षा करने से जानने में आता है कि महा कवि चंद ने उस में पृथ्वीराजजी के चरित्रों के साथ ही उन के सब समकालीन शूर, सामंत, आधीन राजा इष्ट मित्र और सगे संबन्धी और सहायक यावदार्य राजकुलों के भी कुछ न कुछ चरित्र और शौर्य वर्णन किये हैं । अतएव यह कदापि नहीं समझा जा सक्ता कि यह महाकाव्य पृथ्वीराजजी चौहान के नायक होने के कारण से केवल चौहानों की ही बापौती का ग्रंथ है किन्तु वह वास्तव में यावदार्य राजकुलों का सर्वस्व है । देखो, पृथ्वीराजजी से लेकर जिन २ शूर वीरों के चरित्र उस में वर्णन किये गये हैं उन सब की विद्यमान संतान वर्तमान काल की हमारी श्रीमती भारत-राजराजेश्वरी विक्टोरिया के सिंहासन के चारों ओर उपस्थित होकर अपनी २ प्रतिष्ठा के अनुसार तन मन और धन के द्वारा परम राज-भक्ति को प्रकाश कर रहे हैं और श्रीमती के प्रस्वेद के साथ मानो अपना रक्त तक बहाने को प्रस्तुत खड़े हैं । क्या पृथ्वीराज- जी के एक बड़े शूर वीर सामंत पञ्जनजी के वंश में श्रीमहाराज साहब जयपुर और उनके राज वंशीय सरदार नहीं हैं ? क्या पृथ्वीराजजी के सगे संबन्धी जयचंदजी के वंशज श्रीमहाराज साहब जोधपुर और कृष्णगढ़ और उनके भाई बेटे नहीं हैं? क्या पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और परम शूर धीर संहायक रावल समरसीजी की कुलीन संतान में श्रीमहाराज साहब नैपाल, श्रीमहाराणाजी साहब उदयपुर, श्रीदरबार डूंगरपुर और प्रतापगढ़ अपने २ राजवंशी उमराव और सरदारों के सहित नहीं हैं? क्या चौहानजी के अनेक वंशज बूँदी, कोटा सिरोही, नीमराणा, भदावर, बेदला, कोठारिया, और पारसोली आदि के राजा महाराजा और सरदारों को आज हम अपनी आंखों से नहीं देखते हैं ? इसी तरह अन्य सब की विद्यमान संतानों को भी हमारे पाठक स्वयम् विचार देखें और इस थोड़े में ही बहुत कर के समझ लें कि इस महाकाव्य का विषय बारहवें शतक के यावदार्य राजकुलों के संवलित चरित्रों से परम विभूषित है ॥ ३ इस पृथ्वीराज रासे को जो हम अपने लेखों में महाकाव्य कर के लिखते हैं वह कुछ [काव्य] अन्यथा और आश्चर्यदायक नहीं है किन्तु साहित्यदर्पण में महाकाव्य का जो नीचे लिखा हुआ लक्षण लिखा है उस से वह विशेषांस में मिलता हुआ है:- सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्त गुणान्वितः ॥ एकवंशभवा भूपाः कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद्वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् । आदौ नमस्क्रियाशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा ॥ क्वचिन्निन्दा खलादीनां सताञ्च गुणकीर्त्तनम् । एकवृत्तमयैः पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकैः ॥ नातिस्वल्पा नातिदीर्घाः सर्गा अष्टाधिका इह । नानावृत्तमयः क्वापि सर्गः कश्चन दृश्यते ॥

उपसंहारिणी टिप्पण । १६५ सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथायाः सूचनं भवेत् । सन्ध्या सूर्य्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासराः ॥ प्रातर्मध्याह्न मृगया शैलर्तुवनसागराः । सम्भोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वराः ॥ रणप्रयाणोपयम मन्त्रपुत्रोदयादयः । वर्णनीया यथायोगं साङ्गोपाङ्गा अमी इह ॥ कवेर्वृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा । नामास्य सर्गोपादेयकथया सर्ग नाम तु ॥ सा० द० ५५९ ॥ जब कि वह महाकाव्य के लक्षण के अनुसार वास्तविक् एक महाकाव्य है तो फिर उस के रचनेवाले का भी साहित्यशास्त्र में एक अच्छा व्युत्पन्न महाकवि होना क्या अनुमान नहीं किया जा सक्ता है ? जैसे कि इस महाकाव्य का विषय पृथ्वीराजजी चौहान और उन के समकालीन यावदार्य राजकुलों के चरित्रों से संवलित् है वैसे ही उसका काव्य भी भिन्न २ प्रकार के छंदों से विभूषित अनेक प्रकार के काव्यों का एक ऐसा संवलित काव्यात्मक है कि जिस को हम किसी एक प्रकार के काव्य की संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते हैं । उसके काव्य को श्राव्य-काव्य की संज्ञा देने में तो हम आशा करते हैं कि किसी विद्वान को भी कुछ शंका न होगी किन्तु सूक्ष्मतर अन्वेषण करने से ज्ञात होगा कि उस में दृश्य-काव्य के अनेक अंगों का भी कवि ने अपनी सूक्ष्मतर युक्तियों से ऐसा समावेश किया है कि उस को कोई दृश्य-काव्य का अच्छा व्युत्पन्न परीक्षक झट शोधकर जान सक्ता है । क्या हम यह नहीं विचार सक्ते कि इस महाकाव्य के छंदों को कवि ने रूपक के नाम से क्यों गिने हैं ? इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से यहां तक भी स्पष्ट विदित हो सक्ता है कि महाकवि चंद ने उसको काव्य की अनेक उत्तमताओं के इन तीन मूलों से भी भले प्रकार विभूषित किया है । प्रथम तो महाकवि ने अपने वचन का शृंगार, रस, अनुप्रास, और अलङ्कारादिक से परम विचित्र किया है। दूसरे उसने भाव में योज रक्खा है। तीसरे इस महाकाव्य के सब छंद प्राचीन और नवीन प्रकार की गानविद्या के अनुसार गाये भी जा सक्ते हैं । इस के अतिरिक्त महाकवि ने पृथ्वीराजजी और उनके समकालीन यावदार्य राजकुलादि के इतिहास भी जहां तक उस से हो सके हैं भले प्रकार से वर्णन किये हैं। हिन्दी भाषा में साहित्यशास्त्र और सब पौराणिक अनुवाद विषयक ग्रंथ जो अब तक प्राप्त हो सके हैं वह बारहवें शतक के अथवा उस के पहिले के नहीं है किन्तु वे सब इधर के समय के रचित हैं अतएव हम को समझना चाहिये कि चंद ने संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों के आधार से ही यह महाकाव्य रचन किया है और जब कि यह बात ऐसे ही है, तो फिर हमको उस के परम परिश्रम के लिये कितना आभारी होकर उसकी प्रशंसा करना चाहिये । क्या हमको इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से चंद की उक्ति, साहित्यशास्त्र विषयिक नियम, और पौराणिक कथा आदि में उसका संस्कृत भाषा के अनेक विद्या ग्रन्थों का अनुकरण करना नहीं दृष्टि आता है ? जहां तक हिन्दी भाषा के ऐसे अनेक ग्रंथ कि जो चंद के पीछे के रचित हैं हमारे पढने में आये हैं, उन सब से यही ज्ञात होता है कि उनके रचनेवाले चंद कवि जैसे संस्कृत भाषा से भले प्रकार परिज्ञात नहीं थे और उनों ने चंद की शैली का ही निःसंदेह अनुकरण किया है । हमारे कहने का सारांश यह है कि इस महाकाव्य को उसके अति क्लिष्ट और हमारी बुद्धि को चल विचल कर देनेवाला होने के कारण निन्दनीय नहीं ठहराना चाहिये किन्तु साहित्यशास्त्रादि के संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों को हाथ में लेकर और अपने हृदय को चारण और भाटादि के वंश परंपरा के हाड-बैर के दुराग्रह से शुद्ध करके सूक्ष्मतर परीक्षा करनी चाहिये कि उस से हमको निःसंदेह यह ज्ञात हो जावेगा कि हमारे स्वदेशी और यूरोपियन बड़े २ विद्वान जो इस महाकाव्य की प्रशंसा अब तक करते चले आये हैं वह वास्तव में वैसा ही अमूल्य महाकाव्य है और वह ऐसा भी है-कि मानों चंद अपने समय

१६६ उपसंहारिणी टिप्पण। तक के हिन्दी भाषा के सर्व प्रकार के काव्यों का एक अमूल्य संग्रह हमारे लिये प्रस्तुत कर के हमारी हिन्दी भाषा को अति धनाढ्यकर गया है। क्या यह बात पक्षपात रहित विद्वानों को अति आश्चर्य और अट्टाट्टहास कराने वाली नहीं है, कि हम इस महाकाव्य को अभी तक बहुत ही अच्छी तरह से पढ़ पढ़ा और समझ समझा तो सक्ते ही नहीं और न इस महाकाव्य में यूनी- वर्सिटी University की परीक्षा की शैली के अनुसार परीक्षा देकर उत्तीर्ण हो सक्ते हैं किन्तु उसको दोष देकर विध्वंस करने को तो हम सब से आगे आखड़े होने को प्रसन्नतापूर्वक तयार हैं? निदान किसी कवि के कहे अनुसार जो जिस के गुण को नहीं जानता वह उस की निन्दा निरंतर करता है:-“न वेत्ति, यो यस्य गुणप्रकर्षं स तस्य निन्दां सततं करोति। यथा किराती करिकुंभजाता मुक्ताः परित्यज्य विभाति गुंजाः” ॥ जैसे इस महाकाव्य का काव्य अनेक प्रकार के काव्यों का एक संवलित् काव्य है वैसे ही उसकी भाषा भी उसके ग्रंथकर्त्ता के समय तक की अनेक प्रकार की प्राचीन हिन्दी भाषाओं की एक अति संवलित् भाषा | हिन्दीभाषा है। यदि किसी को इसमें कुछ संदेह हो तो वह इस आदि पर्व्व को ही ध्यान देकर पढ़ देखे कि उसके किसी छंद की तो कैसी भाषा है और किसी की कैसी। क्या विद्वानों से यह बात छिपी हुई है कि भाषा और काव्य का नित्य-संबन्ध नहीं है? जब कि उन में नित्य-संबन्ध का होना यथार्थ है तो फिर क्या प्रत्येक का अपने २ अनेक प्रकारों से संवलित् होना भी स्वतः सिद्ध नहीं है? इस महाकाव्य की भाषा के योज को वह विद्वान भले प्रकार से जान सक्ते हैं कि जो वर्त्तमान समय में फिलौलोजिस्ट Philologists अर्थात् शब्दोत्पत्तिविद्याज्ञ कहलाते हैं। और वैसे तो हमारे पढ़ने में वर्त्तमान समय के ऐसे २ सहसा सिद्धान्त कर लेने वाले विद्वानों के भी लेख आये हैं कि जिनों ने ऐसा अत्यन्ताभाव का वाक्य भी कहा है, कि इस महाकाव्य के महाकवि को अनुस्वार और विसर्ग तक के प्रयोग करने का बोध नहीं था। और विद्वान भलेई ऐसा कहने में सम्मत हों परंतु हमारे मुख से तो इस महाकाव्य के काव्य को देखते हुए ऐसा सुन कर वारंवार यही निकलता है कि-त्राहि गोविन्द! त्राहि गोविन्द!! ग्रंथकर्त्ता ने इस ग्रंथ को जिस भाषा में लिखा है वह उसने स्वयम् ही इस आदि पर्व्वके रूपक ३९ में स्पष्ट कह दिया है और जैसा उसने कहा है वैसी ही भाषा हम इस महाकाव्य की पाते भी है। फिर आश्चर्य क्या है? वह यही है-कि न तो हम इस ग्रंथ को आदि से लेकर अंत पर्य्यंत पढ़ते हैं, न समझते हैं, न कवि के अभिप्राय को लक्ष में लाते हैं, न यह विचारते हैं कि बड़े २ विद्वान कि जिन के वचन पर अनेक मनुष्य विश्वास करते हैं उनके सिर पर कुछ सम्मति देते समय बड़ी भारी जिम्मेदारी अर्थात् अनुयोज्यता का बोझ भी रक्खा हुआ है कि नहीं-किन्तु, जो मन में आया वही हम लिख डालते हैं; क्योंकि न तो चंद कवि, न पृथ्वीराजजी चौहान, और न रावल समरसीजी हम से हमारे ऐसा कहने के लिये अब लड़ने को आ सक्ते हैं, और न किसी क्षीर-नीर का सा न्याय करने वाले विद्वान का हमको डर है। देखो, हमने हमारी प्रथम टिप्पण में ही कह दिया है कि इस महाकाव्य की हिन्दी भाषा तीन प्रकार की है। प्रथम षट्- भाषा-और-कुरान-की भाषा-की-योनिवाली दूसरें षट्-भाषा-और-कुरान-की-भाषा-के- सम, और तीसरे देशी-प्रसिद्ध। इसके अतिरिक्त विद्वानों को इस महाकाव्य की भाषा की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से ज्ञात होगा कि चंद कवि ने साहित्यदर्पण में लिखे हुए भाषा के प्रयोग के निम्न लिखित नियमों का भी अपने निज विचार और शैली के संस्कार सहित इस महाकाव्य के रचने में कुछ अनुकरण किया है:-

उपसंहारिणी टिप्पणी । १६७ पुरुषाणामनीचानां संस्कृतं स्यात्कृतात्मनाम् । शौरसेनी प्रयोक्तव्या तादृशीनाञ्च योषिताम् ॥ आसामेव तु गाथासु महाराष्ट्रीं प्रयोजयेत् । अत्रोक्ता मागधीभाषा राजान्तःपुरचारिणाम् ॥ चेटानां राजपुत्राणां श्रेष्ठिनां चार्द्ध मागधी । प्राच्या विदूषकादीनां धूर्तानां स्यादवन्तिका ॥ योधनागरिकादीनां दाक्षिणात्या हि दीव्यताम् । शकाराणां शकादीनां शाकारीं संप्रयोजयेत् ॥ बाह्लीकभाषा दिव्यानां द्राविडी द्रविडादिषु । आभीरेषु तथाऽभीरी चाण्डाली पुक्कसादिषु ॥ आभीरी शाबरी चापि काष्ठपत्रापजीविषु । तथैवाङ्गारकारादौ पैशाची स्यात् पिशाचवाक् ॥ चेटीनामध्येनीचानामपि स्यात् शौरसेनिका । बालानां पण्डकानाञ्च नीचग्रहविचारिणाम् ॥ उन्मत्तानामातुराणां सेवे स्यात् संस्कृतं क्वचित् । ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य दारिद्र्योपस्कृतस्य च ॥ भिक्षुत्वन्ध्यरादीनां प्राकृतं संप्रयोजयेत् । संस्कृतं संप्रयोक्तव्यं लिङ्गिनीषूत्तमासु च ॥ देवीमन्त्रिसुतावेश्या स्वपि कैश्चित्तथोदितम् । यद्देशं नीचपात्रन्तु तद्देशं तस्य भाषितम् ॥ कार्य्या तश्चौत्तमादीनां कार्य्यो भाषाविपर्य्यः । योषित् सखीबालावेश्या कितवाप्सरसां तथा ॥ वैदग्ध्यार्थं प्रदातव्यं संस्कृतं चान्तरान्तरा ॥ सा०द० ४३२ ॥ इस बात की कुछ परीक्षा हम इस आदि पर्व्व में ही कर सक्ते हैं । देखिये रूपक ३३, ३६, आदि शुद्ध संस्कृत भाषा में हैं और रूपक १६, २२, ४७, ५७, ५९, इत्यादि में षट्भाषाओं का सादृश्य और नाटकों में प्रायः संस्कृतादि भाषाओं का सादृश्य है । इसी प्रकार हमारे पाठक इन भाषा संबन्धी सब बातों को इस समय ग्रन्थ में अन्वेषण कर जांच देखें । यदि इस प्रकार की परीक्षा करने पर सब विद्वानों की सम्मति में यही तुलेगा कि चंद कवि वज्र-मूर्ख था तौ हम भी उस को-बड़ा-वज्र-मूर्ख कहने लगेंगे क्योंकि वह हमारा कोई संबन्धी नहीं है और न हम को हमारे कहे का कुछ हठ है बरुक हमारा सिद्धान्त यही है कि सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग । इस महाकाव्य की भाषा में दो एक वर्ष से एक यह भी बड़ी भारी शंका लोगों ने खड़ी कियी है कि उस में आठ या १० दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द हैं और फारसी शब्द अकबर बादशाह के समय से हिन्दी भाषा में मिले हैं अतएव यह महाकाव्य सं० १६४० से १६७० के बीच में क्रित्रिम बना है । हम इस बात से बिलकुलही असहमत हैं और ऐसा अनुमान करने- वाले को हम समझते हैं कि उसने न तौ यह पृथ्वीराज रासा कभी आदि से अंत पर्य्यंत अच्छी तरह से पढ़ा है और न उसको ऐतिहासिक विद्या का पूरा २ बोध है क्योंकि यह अनुमान बिलकुलही अदृढ़ और अपरिपक्व है । बरन अब तक के ऐतिहासिक शोधों के अनुसार हमारी सम्मति में फारसी शब्दों का मेल हमारे भरतखण्ड की बोलचाल की भाषाओं में सातवें शतक तक पाया जा सक्ता है कि फिर इस बारहवें शतक की हिन्दी भाषा की तौ क्याही कथा कहनी है ! टुक विचार कर देखिये कि किसी देश की भाषा में अन्य देशीय भाषा के शब्दादि का मेल बहुधा करके प्रथम बोलचाल की भाषा में ही हुआ करता है न कि किसी मृतः प्रायभाषा में और वह विदेशियों के किसी देश में आने जाने, बसने बसाने, रहने सहने, मिलने मिलाने वाणिज्य करने कराने राज्य के बदलने बदलाने, मत के बिगड़ने बिगड़ाने आदि के कारणों से ही हुआ करता है । तदनन्तर आप नीचे लिखे कारणों को विचार कर देखिये और निर्णय कीजिये कि चंद की हिन्दी में जो फारसी शब्दों के प्रयोग संबन्धी दोष दिये जाते हैं वह वास्तव में यथार्थ हैं अथवा नहीं :- १ पृथ्वीराज रासे के किसी भी समय में आठ या दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द नहीं हैं और जब प्रत्येक समय में नहीं हैं तब समय ग्रन्थ में भी न होना स्वतः सिद्ध है।

१६८ उपसंहारिणी टिप्पणी । यदि किसी को निश्चय करना हो तो इस आदि पर्व्व से ही गिन कर निश्चय करले । हां ऐसा तो हम निःसंदेह कह सक्ते हैं कि उस में अनेक फारसी शब्द हैं किन्तु बिना गिने ऐसी असात्य संख्या स्थिर नहीं कर सक्ते हैं ॥ २ ग्रन्थकर्त्ता ने रूपक ३८ में स्वयम् कहा है कि उस ने कुरान की भाषा का भी आश्रय किया है ॥ ३ ग्रंथकर्त्ता महाकवि चंद पंजाब देश के लाहौर नगर में उत्पन्न हुआ था, जहां कि उस के जन्म होने के १०० वर्ष पहिले से ही महमूदी सल्तनत का होना और उस का पृथ्वीराज जी के साथ ही साथ नाश होना तबक़ात नासरी से ही सिद्ध है। फिर क्या कोई विद्वान यह अनुमान कर सक्ता है कि इस सौ १०० वर्ष के समय में लाहौर नगर की भाषा में कोई एक भी शब्द मुसलमानी भाषा का नहीं मिल सका था और न चंद कवि एक भी फारसी शब्द जानता था और न उस के सुनने में कभी कोई एक भी फारसी शब्द आया था किन्तु वह इस वाक्य “नवदेत यावनी भाषा कंठे प्राण गते रपि” का ही अनुरूप था? क्या महमूदी सल्तनत के राज्य समय में कोई एक भी हिन्दू मुसलमान नहीं हुआ था, न कोई मस्जीद बनी थी, न कोई नगर आदि मुसलमानी नाम से बसे थे ? । ४ क्या पृथ्वीराजजी के राज्य की और महमूदी सल्तनत की परस्पर सीमा नहीं मिली हुई थी? क्या इन दोनों राज्यों के दूत एक दूसरे के राज्य में आते जाते और नहीं रहते थे ? क्या इन दोनों राज्यों में कभी एक बार भी कुछ परस्पर लिखने पढ़ने का काम नहीं पड़ा था? यदि परस्पर लिखा पढ़ी का काम पड़ा था तो क्या वह शुद्ध वैदिक संस्कृत भाषा में लिखा पढ़ी हुई थी और क्या महमूदी सल्तनत वाले भी संस्कृतादिमृतः प्राय भाषाओं में ही अपना राज कार भार चलाते थे? ५ क्या हसन निजामी आदि से हम को यह ज्ञात होता है कि पृथ्वीराजजी के राज्य समय में उन की सेवा में अथवा उन के राज्य में न तो कोई फारसी जानने वाला था न कोई सुलतान की ओर से कभी कुछ संदेसा लेकर पृथ्वीराजजी के पास गया, न कोई मुसलमान सिपाही थे, न कोई मुसलमान सौदागर था न कोई मुसलमान यात्री वहां आया था न कोई मुसलमान उन के आधीन देश में रहता था; मानो पृथ्वीराजजी के राज्य समय की हिन्दी भाषा को मुसलमानी भाषा की किंचित् वायु ही नहीं लगी थी ? क्या चित्ररेखा नाम की सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी की एक परम प्रिया पासवान को हसननामक का उड़ा लाना तबकातानासरी से कुछ भी सिद्ध नहीं होता और क्या यही सुभगा पृथ्वीराजजी की शरणागत में रह कर हमारी हिन्दुओं की बादशाहत को समूल नाश को प्राप्त कराने वाली नहीं हुई है ? ६ क्या सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी ने कई बार पृथ्वीराजजी और लाहौर की महमूदी सल्तनत पर चढ़ाईयां नहीं कियीं थीं ? क्या इन अवसरों में भी जो फारसी शब्द चंद ने प्रयोग किये हैं वह चंद और पृथ्वीराजजी की सेना के सुनने और समझने में कभी नहीं आये थे और न उन में का कोई एक शब्द भी उन की भाषा में मिल गया था ? क्या जब शहाबुद्दीनजी ने लाहौर की महमूदी सल्तनत पर चढ़ाईयां कियीं तब लाहौर वालों ने पृथ्वीराजजी से कुछ मंत्रणा नहीं कियी थी और न उन की कुछ सहायता लियी थी ? ७ क्या मसूद ने हांसी पर चढ़ाई नहीं कियी थी? क्या वह लाहौर के एक वाईसराय Viceroy के साथ बनारस तक नहीं आया था और न उसने उस शिवपुरी को लूटा था? क्या इस समय में भी कोई एक भी शब्द मुसलमानी भाषा को हमारी हिन्दी भाषा में नहीं मिला था ?

उपसंहारिणी टिप्पणी । १६६ ८ क्या महमूद गजनवी की १६ वा १७ चढ़ाइयां (सन् ९९६ से १०३० तक) हमारे देश की भाषाओं में कोई एक भी मुसलमानी शब्द नहीं मिला सकी थीं? क्या हमारे गुजराती बन्धुओं को महमूद गजनवी के निज मुख के "बुताशिकन्" और "बुतफरोश" शब्द सोमनाथ के नाश के दिन से आज तक नहीं याद रहे हैं? क्या गुजरात के नागर ब्राह्मणों में से जिन्होंने अपने देश की संरक्षा के लिये पुरुषार्थ किया और मुसलमानी बादशाहों की सेवा करना अंगीकार किया उनका नाम "सिपाही नागर" नहीं पड़ा है? क्या महमूद के समय में कोई भी हिन्दू मुसलमान नहीं हुआ था? क्या मथुरापुरी में उसके लशकर में अनेक हिन्दू गुलाम दो २ रुपयों में नहीं बिके थे? क्या उसकी १००००० एक लाख सवार और २०००० बीस हजार पैदल फौज के साथ हमारे स्वदेशी व्यापारियों की बोलचाल देववाणी में होती थी और कोई एक भी मुसलमानी शब्द उस की फौज हमारे देश के अनेक नगरों में अपने पीछे अपने स्मारक चिन्ह की भांति नहीं छोड़ गई थी? क्या महमूदाबाद नामक कोई भी नगर महमूद का बसाया हुआ हमारे देश में नहीं है? ९ क्या अबुलुअसो ने सन् ६३६ ई० के लगभग बंबई के समीप के थाना पर चढ़ाई नहीं कियी थी? क्या इराक के परम प्रसिद्ध जालिम गवरनर Governor हज्जाज के समय में राजा दाहिर से सिंध विजय नहीं किया गया था? क्या फिर सन् ७१२ ई० में मोहम्मद कासिम ने सिंध पर चढ़ाई करके सिन्ध को नष्ट भ्रष्ट और लूट खसोट नहीं किया था और राजा दाहिर को नहीं मारडाला था? क्या राजा दाहिर का लड़का जयसिंह उस समय कितनेक और छोटे मोटे सिन्ध के राजा और सरदारों सांहत मुसलमान नहीं होगया था और क्या तब से ही मुसलमानी धर्म्म का आज तक सिन्ध में बराबर चला आना ऐतिहासिक शोध नहीं सिद्ध करते हैं? क्या सिन्धी मुसलमान पृथ्वीराजजी के पीछे हुए हैं? क्या इस दशा में कोई एक भी अरबी शब्द हमारी देश भाषाओं में उस समय नहीं मिला है? १० क्या ऐतिहासिक शोध हमको यह नहीं विदित करते हैं कि पारसी लोग सैसेनियन् Sassanian Dynasty वंश की अवनति के समय Persia परशिया से भाग कर हमारे देश के बंबई नगर के आस पास आकर बसे हैं? क्या इन लोगों ने अपनी मातृभाषा का कोई एक शब्द भी पृथ्वीराजजी के समय तक हमारी देश भाषा में नहीं मिलाया था? क्या उन को हमारे देश के लोग पारसी के बदले कोई अन्य वैदिक शब्द से पुकारते थे? ११ क्या गुजराती भाषा में फारसी शब्दों के मिलने का शोध सं० १३५६ तक शास्त्री ब्रजलाल कालिदासजी के रचित गुजराती भाषा के इतिहास नामक ग्रन्थ से पहुंचना नहीं विदित होता है? जो इसी तरह हम को देश भाषा के प्राचीन ग्रन्थादि बराबर मिलते जांय तो क्या हम सातवीं सदी तक कोई एक भी मुसलमानी शब्द हमारी देश भाषाओं में मिला हुआ नहीं शोध सकते हैं? १२. क्या पुरातत्ववेत्ताओं ने यह शोध लिया है कि हिन्दी भाषा का अमुक समय में प्रागट्य हुआ है? क्या बारहवें शतक के पहिले और उसके एक दो शतक पीछे के कोई पुस्तक ताम्र- पत्र प्रशस्ती पट्टे परवाने आदि हम को ऐसे प्राप्त हो गये हैं कि जिन की अपेक्षा से हम यह कह सकें कि बारहवें शतक के पहिले अथवा उसके कुछ पीछे के समय तक भी मुसलमानी भाषा के शब्द हिन्दी में नहीं मिले थे? क्या अब तक के प्राप्त हुए पुरातत्व संस्कृतादि मृतः प्राय भाषाओं में नहीं हैं और उन की अपेक्षा से हिन्दी भाषा के विषय में कल्पना करना बहुत ही आश्चर्य दायक और अयोग्य नहीं है?

५७० उपसंहारिणी टिप्पण । १३ क्या संस्कृत भाषा के उन ग्रंथों में, कि जिनको पुरातत्ववेत्ता बारहवें शतक के पहिले के बने हुए मानते हैं, ऐसे २ शब्द हमको प्राप्त नहीं होते हैं कि उन नाम के देश और मनुष्य यूरोप आदि अन्य खंडों में आज भी विद्यमान है ? क्या विक्रमादित्यजी की “शकारि” पदवी साधु संस्कृत भाषा की है ? क्या र.वल समरसीजी की आबू की प्रशस्तिके ४५ वें श्लोक में “तुरुक्क” शब्द नहीं प्रयोग हुआ है ? क्या व्याकरण महाभाष्य से बहुत सी धातुओं के प्रयोग द्वीपान्तरों में होना विदित नहीं होता है ? क्या महाभारत में पांडवों का यावनी भाषा में बात करना नहीं लिखा मिलता है ? १४ क्या वर्त्तमान समय के अच्छी हिन्दी लिखनेवालों में से कोई किसी विद्वत मंडली में खड़े होकर यह कह सक्ते हैं कि चिट्ठी पत्री से लेकर ग्रन्थ. तक जो कुछ उन्होंने आज तक हिन्दी भाषा में लिखे हैं उन सब की हिन्दी एक सी ही है अर्थात् उनके अनेक लेखों में से ऐसे २ उदाहरण बिल्कुल नहीं मिल सकेंगे कि उनके किसी लेख में तो एक भी फारसी शब्द नहीं आया होगा और किसी में अनेक फारसी शब्द प्रयोग हुए होंगे ? यदि पृथ्वीराज रासो की भांति एक हजार वर्ष के पीछे कोई ऐसे हमारे स्वदेशीय बन्धु के ऐसे लेखों को हाथ में लेकर वाद विवाद करें तो क्या दोनों पक्षकारों को प्रत्येक के अनुकूल तर्क नहीं मिल सकेंगी ? जब आज ही. हम लोगों की यह दशा है कि कभी कैसी हिन्दी लिखते हैं और कभी कैसी तो फिर प्राचीन समय के ग्रंथकर्त्ताओं में से जिसने यह स्पष्ट कह दिया है कि मैं कुरान की भाषा को भी प्रयोग में लेता हूं उसको हम क्योंकर दोष दे सक्ते हैं क्या हम अनुमान नहीं कर सक्ते कि प्राचीन ग्रंथकारों में से जिसने जैसी हिन्दी पसन्द कियी उसने वैसी ही लिखी है ? १५ क्या आज कल के विद्यमान देशी राजसथानों में अस्मात्ते समय से अब तक मुसलमान बादशाह सिपहसालार, सरदार, सौदागर, मोलवी मुल्ला और काज़ी आदि के नाम अपनी देश भाषा हिन्दी और मृतः प्राय भाषा संस्कृतादि के होते हुए भी फ़ारसी अक्षरों और उसी भाषा में चिट्ठी पत्री और फ़रमान खरीते आदि के लिखे जाने का प्रचार नहीं प्रचलित है ? क्या आज के एक-छंकी अंग्रेजी राज्य शासन समय में भी राजपूताने के अंतरगत राज्यों से श्रीमान् वाइसराय और गवर्नर जनरल साहब बहादुर के नाम उभय की विदेशी फ़ारसी भाषा और लिपी में खरीते नहीं लिखे जाते हैं ? बहुत समय के व्यतीत होजाने पर जब कि वर्त्तमान समय के वृत्त पुरातत्व संज्ञा से माने जावेंगे और वे ऐसे ही अलभ्य होंगे जैसे कि आज पृथ्वीराजजी के समय के हैं तब फिर क्या उस समय के विद्वानों का वैसी ही तर्कों से कि जैसी से आज हम लोग रासो में दोष देते हैं इन देशी राज्यों के इन फ़ारसी लिपी और भाषा में गवर्नमेंट हिन्द के नाम लिखे हुए खरीतों को भी जाली समझना यथार्थ होगा ? क्या यह व्यवहार भी वर्त्तमान समय में देशी राजसथानों में प्रचलित नहीं है कि जब गवर्नमेंट हिन्द के नाम खरीता लिखने का काम पड़ता है तब फ़ारसी भाषा के विद्वानों को घेर घार कर, फ़ारसी कोषों में शब्दों को ढूंढ़ ठांढ़ कर, और एकान्त में बैठ बाठ कर, कई दिनों तक अति परिश्रम कर के नहीं लिखे जाते हैं; उसी तरह जब किसी मंदिर आदि की प्रशस्ति का काम पड़ता है तब वैसेही देशी और विदेशी पंडितों को चाहे वे राज के नोकर हों अथवा नहीं परंतु उने घेर घार कर संस्कृत भाषा में प्रशस्तियें नहीं लिखाई जाती हैं और जब किसी राजा की बिरदावली का कोई कवित्त बनवाने का काम पड़ता है तब षट भाषाओं की भाषा से बिगड़ कर बनी हुई डिंगल भाषा में काव्य नहीं रचवाया जाता है और जब लाट साहंब की पंधरावनी का उत्सव किया जाता

[header] उपसंहारिणी टिप्पणी । १७१ [/header]

है तब उस में Address अर्थात् अभिवादन अंग्रेजी भाषा में नहीं दिया जाता है ? क्या यह सब भाषा आज प्रचलित हैं और क्या आज मुसलमानों की बादशाहत है ? क्या जो आज हम महाराणाजी श्री सज्जनसिंहजी के राज्य शासन समय के सर्व प्रकार के सब राजकीय लेख एकत्र कर के देखें तो वे सब एक ही भाषा में हम को लिखे मिलेंगे ? क्योंकि क्या सब राजा साहबों के स्वर्गवास होने पर राज की मोहर छाप और स्टाम्प और सिक्के आदि में उसी दिन नवीन राजा साहब का नाम पलट कर के वैसे ही हुक्म जारी हो जाते हैं कि जैसे आज अंग्रेजी राज्य में होते हैं कि जिस राजकीय व्यवहार के संस्कार से विद्यमान पुरातत्ववेत्ता Antiquarians उपलब्ध पुरातत्वों को जांचा करते हैं ? क्या मेवाड राज्य में महाराणाजी श्री शंभूसिंहजी के नाम का स्टाम्प आज तक नहीं जारी है ? क्या महाराणाजी श्री सज्जन- सिंहजी के नाम की छाप वर्त्तमान महाराणाजी साहब के राज्य शासन समय में कई वर्षों तक नहीं जारी रही है ? क्या ऐसे स्टाम्प पर लिखी हुई दस्तावेजें और ऐसी छाप लगे पत्र बहुत समय के व्यतीत हो जाने पर जाली समझे जांयगे और जिन २ के पास यह राजकीय लेखादि उस समय में मिलेंगे वे सब जाल के अपराधी समझे जाकर क्या फांसी लगाये और कालेपानी भेजे जावेंगे ? सारांश हमारे निवेदन करने का यह है कि हिन्दी भाषा में अन्य देशीय भाषाओं के शब्दादि के मिलने का प्रश्न बड़ा ही सूक्ष्म और कठिन है और जो हमारी तरह विद्वान लोग यह मान लें कि जब जिस अन्य देशीय का आना हमारे भरतखंड में हुआ तब ही से उसकी भाषा के शब्दों का भी मेल होना अति संभावित है तो यह प्रश्न बड़ा ही सरल है । हमारे सिद्धान्त को माने बिना इस प्रश्न का निर्णय होना बहुत दुस्तर है क्योंकि जो चंद कवि के पहिले अथवा उसके समय के भी हिन्दी भाषा के पुस्तकादि मिल जांय और उनमें मुसलमानी भाषाओं के शब्द न भी मिलें तो भी हम सुखसे यह अनुमान कर सक्ते हैं कि उनके रचने वालों ने उनको जानकर प्रयोग नहीं किये हैं और चंद ने रूपक ३९ की प्रतिज्ञा पूर्व्वक प्रयोग किये हैं जैसे कि वर्त्तमान समय में भी हिन्दी भाषा के अनेक विद्वान अनेक प्रकार की हिन्दी लिखते हैं ॥ कविराजजी ने इस महाकाव्य की भाषा के प्रसंग में जैसे मुसलमानी शब्दों के प्रयोग होने का दोष दिया है वैसे ही उनों ने इन सत्त । चावद्विस । भारत्थ । पारत्थ । सारत्थ । और चूरू शब्दों को भी राजपूताने की कविता के ही शब्द होना समझ कर इस महाकाव्य का मेवाड राज्य में जाली बनना भी अनुमान किया है । तथा इस ग्रंथ में बहुत से शब्द अनुस्वार सहित प्रयोग हुए हैं उनके विषय में भी उनों ने महाकवि चंद पर आक्षेप करके यह कहा है कि "अनुस्वार लगाने से यह स्पष्ट जान पड़ता है कि वह संस्कृत कुछ भी नहीं जानता था क्योंकि उस को बिन्दु विसर्ग का भी ठीक ज्ञान न था" परंतु हमारी तुच्छ सम्मति में महामहोपाध्या कविराज श्री श्यामलदासजी महाशय का यह सब कहना बिलकुल ही असत्य और निर्मूल है । अब जो प्रमाण हमारे इस कहने को समर्थन करने को हम आगे दिखावेंगे उन से यह भी स्पष्ट सिद्ध होगा कि जिन २ ग्रंथों से हमने उन को उद्धृत किये हैं वे कविराजजी के पढ़ने में नहीं आये होंगे नहीं तो वे ऐसे अत्यन्ताभाव के अनुमान कदापि नहीं करते :- १ यद्यपि सत्त शब्द का आज कल की बोल चाल की ब्रजभाषा में भी प्रयोग होना हमने हमारी लिखित प्रथम संख्या में इन वाक्यखंडों के उदाहरणों से सिद्ध कर दिखाया है जैसे :- जबै वांकूं सत्त चढ़ आयौ तबै वो सत्ती भई-सत्त हर दंत गुह दंत दांता-राम राम सत्त है, दो

१७२ उपसंहारिणी टिप्पण । चार नित्त हैं-तथापि एक यह दोहा भी हम कविवचनसुधा से उद्धृत कर के प्रमाण में प्रवेश करते हैं-"सत्त सुबचन कबीर के, चित्त देय सुन लेहु ॥ अरु नानक गुरु के वचन, सत्त मत्त करि गेहु" ॥ तथा लालशाकृत विनयपत्रिका में:-"दान्च मोत पात्र देख हर्ष सर्व सत्त लेप मे। दीन रेख मेख मार भाल मन्द के" । यह शब्द ऐसा अप्रसिद्ध नहीं है कि जिस के प्रयोग के विषय में हिन्दी भाषा के विद्वानों को किंचित् भी संदेह होय अतएव हम अधिक उदाहरण नहीं लिखते हैं ॥ २ श्रीमद्वल्लभ संप्रदाय में जो अष्ट-छाप कर के प्रसिद्ध हैं उन में के एक कुंभनदासजी ने "चावद्विसि हरि रूप रम्या" अपने एक कीर्त्तन में कहा है ॥ ३ इन भारत्थ । सारत्थ । और पारत्थ शब्दों के प्रयोग के विषय में हमने हमारी प्रथम संख्या में बहुत कुछ कह ही है परंतु फिर भी हम एक प्रमाण अष्ट-छापवाले छीत स्वामी के एक कीर्त्तन में से यह बताते हैं "भारत्थ में सारत्थ है हरि जू कहाये सारथी" और पंडित कन्हैयालालजी कृत छंद ! प्रदीप नामक ग्रंथ से वैसे ही अन्य शब्दों के प्रयोगों के उदाहरण भी विदित करते हैं यथा :-(१) करि गहि भार समत्थ । (२) यश पायो नृप मत्थ । (३) मत्यन नत करि लज्जित दिगज । (४) सुसज्जिय अगति । (५) उत्थिय समुद वट्ठिय लहरि । (६) रहि तदत्यक्ति जियसुलरि (७) लखि दव्वत सब नृपति (८) सिंहवली समरत्थ हत्थिवर मत्य विदारन ॥ ४ अब शेष चूक शब्द के विषय में भी हमारी लिखित संख्या में लिखे के सिवाय हमको यह कहना है कि उस के शब्दार्थ तौ वहीं हैं कि जो डाक्टर होर्नली साहब ने हिन्दी शब्दों की धातुओं के संग्रह में वर्णन किये हैं, किन्तु यह शब्द जिस विषय के प्रसंग में प्रयोग होता है वैसा ही उसका भावार्थ हो जाता है जैसे कि छन के अर्थ में अष्ट-छापवाले परमानन्ददासजी ने उस को प्रयोग किया है "अहो हरि बाँल सों चूक करी" इसी तरह समझ लेना चाहिये कि जब वह छल से मारने के प्रसंग में प्रयोग होता है तब उस का वैसा भावार्थ, ग्रहण किया जाता है । राजपूताने के किसी २ कवि को हमने ऐसा भी कहते हुए सुना है कि यह चूक शब्द राजपूताने की भाषा में ही प्रयोग हुआ मिलता है और हिन्दी भाषा के किसी काव्य में किसी भी अर्थ में यह शब्द प्रयोग नहीं हुआ है परंतु उनका यह कहना हमारे नीचे लिखे प्रमाणों से बिलकुल ही असत्य प्रतीत होता है ॥ ॥ वृन्द सतसही ॥ दोहा ॥ पिशुन छल्यो नर सुजन सों, करत विसास न चूक । जैसे दाध्यो दूध को पीवत छाछहि फूंक ॥ मूरख गुन समझै नहीं, तौ न गुनी में चूक । कहा भयो दिन की विभौ, देखौ जौ न उलूक ॥ ॥ नाथ कवि अर्थात् कवि लोकनाथजी चौबे कृत ॥ कवित्त ॥ सुखद रसाल को रिसाल तह तापै बैठि, ऐंठि बोल बोलै पिक, मधुप दुहू दुहू ॥ कुंज कुंज कारे हैं कुटिल अलि पुंज पुंज, गुंज गुंज फूल रस, चुहकै चुहू चुहू ॥ चूक बिन प्यारीं कीन्ह मेरो मन टूक टूक, कूक सुनै हूक परै, करत उहू उहू ॥ नाथ दिसि चार अंधियार ही जनात मोहि तातें किल कोकिला, कहत कुहू कुहू ॥

उपसंहारिणी टिप्पणी । १७३ ॥ सूरसागर ॥ राग काफी ॥ मैं अपने कुलकानि डरानी । कैसे श्याम अचानक आये मैं सेवा नहीं जानी ॥ यहै चूक जिय जानि सबी सुनि मन लै गये चुराई । तनतैं जात नहीं मैं जान्यौं लियो श्याम अपनाई ॥ ऐसे ठगत फिरत हरि घर घर भूलि कियो अपराध । सूर श्याम मन देहि न मेरो पुनि करिहौं अनुराग ॥ राग विहागरा ॥ कहा करौं गुरजन डर मान्यां । आये श्याम कौन हित करि कैं मैं अपराधििन कछु न जान्यों ॥ ठाढे श्याम रहे मेरे आँगन तब तैं मन उन हाथ विकान्यों । चूक परी मोकों सबही अंग कहा करौं गई भूल सयान्यों ॥ वै उनही को नए रूप मन मेरी करनी समुझि अयान्यों । सूर श्याम संगम उठि लाग्यौ मो पर बारं बार रिसान्यों ॥ ३७ ॥ बीच कियो कुल लज्जा आई । सुनि नागरी बकस यह मोकों सन मुख आये धाई ॥ चूक परी हरि तैं मैं जानी मन लै गये चुराई । ठाहे रहे सकुच तो आगैं राख्या बदन दुराई ॥ तुम हो बडे महर की चेटी काहे गई भुलाई । सूर श्याम हैं चोर तुम्हारे छांडि देहु डरपाई ॥ ९० ॥ ॥ कवि लल्लूलाल कृत ॥ दोहा ॥ धरम राज सौं चूक करि । दुरजोधन लै लीन्ह ॥ राज पाट अरु वित्त सब । घनेवास दै दीन्ह ॥ करी चूक प्रहलाद पै । हिरन असुर परचंड ॥ हरि सहाय हित अवतरे । असुरन किये बिखंड ॥ ॥ रामायण ॥ छमहु चूक प्रान जानत केरी । चहिये विप्र अरु कृपा घनेरी ॥ ॥ स्त्रियें गाया करती हैं ॥ मेरा भया चुक्यान हियारी । कार करत मैं घर वर चूकूं फुंका जात सई जीया री ॥ ॥ कबीर ॥ काशी का मैं बासी कहिये, करम दशा का हीना । राम भजन में चूक पडी तब पकर जुलाहा कीना ॥ : ॥ कहावत ॥ आहार चूके वह गये व्योहार चूके रह गये । दरबार चूके बह गये सुसराल चूके बह गये ॥

१७४ उपसंहारिणी टिप्पणी । ॥ चूरनवाले ॥ है चूरन खट्टा चूक । जिस सें नित्त लगेगी भूक ॥ ५ हम अनुस्वार सहित शब्दों के प्रयोग के विषय में जो ऊपर कह आये हैं उस के नीचे लिखे उदाहरणों को अवलोकन करने से आशा है कि हमारे पाठकों को पूर्ण संतोप हो जावेगाः- ॥ सूरसागर ॥ राग भैरवी ॥ भजि श्री विट्ठल चरण सरोजं । नखमणि दीधिति दमित मनोजं ॥ इच्छसि यदि सततं सुख सारं । त्यजसि न किमिति विषय धृतभारं ॥ यदि बांछसि हरि भक्ति सुखं । कुरु चपलं शरणागत यत्नं ॥ प्राप्य सुदुर्ल्लभ नर वर देहं । परि हर सकल निगम संदेहं ॥ मानय हृदय मयोदित वचनं । तदया सिनो चेदतिशय पवनं ॥ वत्सपदं भावय भव जलधिं । अंत समै भवधिन बर्बधिं ॥ नाथ तबाह मतीरण रावं । पूरय सततं मिमं मयि भावं ॥ तब गुण गण कथिता मृत गाये । प्रार्थ्य मिदं दिश तव रघुनाथे ॥ ॥ दासयशा ॥ छंद ॥ दै भक्ति रमा निवास त्रास हरण शरण सुखदायकं ॥ सुपधाम राम नमामि काम अनेक कवि रघुनायकं ॥ १०४ ॥ सुर वृंद राजत द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलित बलं ॥ ब्रह्मादि शंकर सेव्य राम नमामि करुणा कोमलं ॥ १०५ ॥ तोटक छंद ॥ गुण ज्ञान निधान अमान मजं । निति राम नमामि विभुं विरजं ॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल वृंद निकंद महाकुशलं ॥ १०६ ॥ बिनु कारण दीन दयालु हितं । छवि धाम नमामि रमा सहितं ॥ भव तारण कारण कार्य परं । मनसं भव दारुण दोष हरं ॥ ९० ॥ शर चाप मनोहर तूणि धरं । जल जारुण लोचन भूप वरं ॥ सुप मंदिर सुंदर श्रीरमणं । मद मार महा ममता शमनं ॥ ९१ ॥ ॥ खालशा कृत विनय पत्रिका ॥ भैरवी ॥ रे मन सन्त चरण धरु माथं । निस वासर जिनके जग नायक वास करत हैं साथं ॥ १ ॥ तिन को छोड़ विश्व में भटके वेश्याको करि नाथं । भक्ति सहित सेवा तुम करते वह मारत है लाथं ॥ २ ॥ तत्रापी कहु लाज न आवत मलत चरण धरि हाथं ॥ सिंह मदन गोपाल साधु पद गहु अघहर सम पाथं ॥ ३ ॥

उपसंहारिणी टिप्पण । १७५ ॥ गोस्वामी श्री लक्ष्मीनाथजी परमहंस कृत पदावली ॥ नमो नमो गीता हरि वंशं । सुर नर मुनि सज्जन अवतंसं ॥ कोमल पद उपनिष श्रुति अंगं । हरि मुख कथित सन्त हिय हंसं ॥ विमल श्याम भाषित गन संगं । देव दनुज मानव अघि घंसं ॥ भक्ति विराग ज्ञान परगाशं । काम क्रोध मद मोह विनाशं ॥ सकल शास्त्र सम्मत निति शोशं । आर्य धर्म सुत्र दायक हंस ॥ श्रुति सागर तीरथ फल देशं । कलि मल तिमिर प्रकास दिनेशं ॥ गुण अनन्त कहि गावत शेषं । चतुरानन गण देव महेशं ॥ सुनत सकल मन होत हुलाशं । लक्ष्मीपति अति पाप विनाशं ॥ १ ॥ ॥ नरहरदास कृत अवतार चरित्र ॥ भुजंगी ॥ सुगन्धं विगन्धं न अस्तुति गारी । विभेदं न सत्रुं न मित्रं विचारी ॥ न मंहिमा न माया न मूढं न मोहं । न रंगं विरंगं न दावा न द्रोहं ॥ न सीतं न तापं न संगं कुसंगं । न भावं न भिष्यान अंगं अनंगं ॥ मुखं भूमि सज्या न हासं न वासं । यहै बाहैं आनै ततौ पंच यासं ॥ सम विष्वहं भूमि पंथ सहज्ज । बसंतं दिगं बीत रागं विलज्जं ॥ विमोहं विदेहं न इन्द्री विकारं । अघानैं रहे नित्ति वातं अहार ॥ विलेपं न ओपंऽ आगो विचार । धरी पुष्प माला गलै बिष्य धारं ॥ प्रकासी जु निंदा महा मोद पावै । हसे ताल दे आप औरै हसावे ॥ अलेपं अकेले रहे अप्रकासं । निरा पेत निर्बंध नग्नं निरासं ॥ अनाजूत अवधूत माया अतीतं । अमोहं अछोहं अद्रोहं अभोतं ॥ अनाम अकामं अठामं अजेयं । अनाधार आकार महिमा अमय ॥ पशु वृत्ति लीने भषै पान पानी । विचारं प्रचारं विहारं बिमानी ॥ यह महाकाव्य आज तक महाकवि चंद का बारहवीं शताब्दी का रचा हुआ एक बड़ा प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ कर के हमारे स्वदेश में प्राचीन काल से चला आता है अकृत्रिमता और उसकी यथार्थता में आज तक क्या तो स्वदेशी और क्या किसी विदेशी विद्वान को कोई ऐसी शंका नहीं हुई है कि जैसी हमारे परम प्रिय मित्र महामहोपाध्याय कविराजजी श्री श्यामलदासजी को बैठे बैठाये हो गई है । यद्यपि हम इस महाकाव्य को अभी तक अनुकूल दृष्टि से ही देखते हैं किन्तु उसी के साथ हम उसकी परीक्षा करने में प्रतिकूल दृष्टि देकर उसके गुण-दोषों को भी देखते जाते हैं और जब हमको उस में कोई दोष देने जैसी बात नहीं मिलती तब उसी स्थान पर हम अपनी टिप्पण में अपना अभिप्राय लिख प्रकाश करते हैं। हमारे पाठकों को यह भले प्रकार समझ रखना चाहिये कि जिस दिन जिस स्थान में जो कुछ हम को क्रित्रिम दीखेगा उसे हम उतने ही बल पूर्वक दोष देकर प्रकाश कर देंगे कि जैसे हम उसके गुणों को प्रकाश करते हैं और जो कोई बात हमको उस में दोष देने जैसी मिलेगी ही नहीं तो फिर हम अशक्त हैं। इस महाकाव्य की क्रित्रिम अनुमान करने में जितने हेतु दिये गये हैं उन में से प्रत्येक के विषय में हम निम्न लिखित कुछ निवेदन करते हैं:-

९७६ उपसंहारिणी टिप्पण । १ इस महाकाव्य में संवत् लिखे हुवे हैं वह मुसलमानी तवारीखों में लिखे और संवत शोध हुवे संवतों से नहीं मिलते और उन में ९० वा ९१ वर्ष का अन्तर पड़ता है अतएव इस बात का निर्णय करने को हमारी टिप्पण १६८ और ३५५ । ५६ वादी पढ़ें कि उनके पढ़ने और पक्षपात रहित मनन करने से हम आशा करते हैं कि वादी की संवत् के अंतर विषयिक शंका निवारण हो जायगी ॥ २ इस ग्रंथ में मुसलमानी भाषादि के शब्द प्रयोग हुवे दृष्टि आते हैं उनके विषय का समाधान हमारी इसी उपसंहारिणी टिप्पण का भाषा संबन्धी चौथा लेख खंड अवलोकन करने से भले प्रकार हो सक्ता है ॥ ३ अब तक पृथ्वीराजजी के समकालीनों में से केवल रावल समरसीजो को ही आक्षेप करने वाले ने उदाहरण में ग्रहण किये हैं कि उसके विषय में केवल आबू और चीतोड़ की पांच चार प्रशस्तियों से ही संशय-करने वाले को संशय होता है अर्थात् संशय का आधार उन ही प्रशस्तियों पर है। यदि उन प्रशस्तियों के संवतों को विद्वान लोग भले प्रकार परीक्षा कर के यह निश्चय कर लें कि वे रावल समरसी जी के ही समय की हैं और उनके संवत् अमुक प्रकार के हैं और इसको पृथ्वीराजजी समरसीजी और पृथाबाईजी के जो पखाने प्राप्त हुवे हैं उन के संवतों को भी उसी प्रकार जांच देखें तो फिर रावल समरसीजी के समकालीन होने में कुछ झगड़ा ही न रहेगा क्योंकि झगड़ा तभी तक रहता है कि जब तक किसी विद्वान को किसी प्रकार का पक्षपात होता है और वह दर्पण लेकर मुख दिखते हुवे भी नहीं दूर होता है। जहां तक हमने रावल समरसीजी के विषय में शोध किया है वहां तक हमको इस बात में कुछ संदेह नहीं है कि वे पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और समकालीन थे। आबू और चीतोड की प्रशस्तियों के संवतों को समझ लेने के लिये एक रोज की बात हमने हमारी टिप्पण ३५५ । ५६ में अति संक्षिप्त रूप से कही है। इस के अतिरिक्त हम एक बड़ी अद्भुत अपूर्व बात पर विद्वानों को ध्यान दिलाते हैं कि कविराजजी ने इस महाकाव्य के संवत् १६४० से १६७७ के भीतर जाली बनने के सिद्ध करने में नीचे लिखे प्रमाण कहा है :- “इस किताब में मेवाड़ के राजाओं की बहुत सी प्रशंसा रावल समरसिंहजी के नाम से की है और एक स्थान में उनको आशिंस देने में यह शब्द लिखे हैं- (१) कंलकियां राय केदार ॥ (२) पापियां राय प्रयाग ॥ (३) हत्यारां राय वणारसी ॥ (४) मदवान राय राजान री मंग ॥ (५) सुलतान यहण मोरखन ॥ (६) सुलतान मान मलन ॥ इन पदवीयों से मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत है”—इत्यादि ॥ अब विद्वानों को रासे के उस रूपक को अवलोकन कर के परीक्षा कर समझना चाहिये कि जिस में से यह वाक्यखंड उद्धृत किये गये हैं, वह रूपक नीचे लिखे प्रमाण हैं :- छंद पद्धरी ॥ सामंत सब्ब मनुहार कीन । प्रोहित्त राम आसीस दीन ॥ हरि सिंहि दिदु वरदान भट्ट । उच्छल्यो चंद पैपै सु घट्ट ॥ हुहु पष्ष चँवर सिर धरिय छत्र । वरदाइ दंत आसी तत्र ॥

उपसंहारिणी टिप्पणी । १७७ दृट्टियो सिंघ बरदाइ देपि । बोलंत विरद बहु बिधि विसेपि ॥ चीतोर राज कारम्म कौन । पुम्मान पाट पग अचल दीन ॥ मेर गिरि सरिस चित्तौर मानि । किरनाल तेज बढ्ढे पुमान ॥ जैचंद समह जिन जुद्ध कीन । मानों कि उरग जनु मौर पीन ॥ कलंकिया राय केदार राय । कवदेत विरद मनउमँग चाय ॥ पापी राय प्राग वड समान । कृषन दरिद्र करतार जान ॥ हित्यार राइ कासी अभंग । मद्रुआंन राइ गंगा उतंग ॥ सुरतान मलन बंधन समोप । हिंदूक राइ टालच दोप ॥ उज्जैन राइ बंधन समत्थ । आचार राइ जुज्वरह पथ्थ ॥ भीमंगराइ भंजन सुपेत । जस लयो धवल रानिंद जेत ॥ रिनथंभ राय सिर दंड कीन । अव्वुन्ना राइ गढ लेइ दीन ॥ उय्याप राइ छापन समत्थ । सोपन सरीर प्रथिराज सत्थ ॥ दप्यनी साह भंजन अलग । चंदेरि लिहु किय नाम जग ॥ ४१ ॥ हमारे पाठकों को इस रूपक का तात्पर्य निकालने के पहिले यह जान लेना अत्यावश्यक है कि वह रासे के समरसी दिल्ली सहाय नामक समय में का है। रासे की किसी पुस्तक में तो यह समय पृथक है और किसी में वह बड़ी लड़ाई नामक समय के आदि में ही मिला हुआ है। इस रूपक के अन्तर्गत वृत्त का प्रसंग यह है कि रावल समरसीजी अपनी महाराणीजी श्री पृथा- बाईजी सहित अपने साले पृथ्वीराजजी की सहायता करने को चीतोड़ से दिल्ली पहुंचे और वहां उन का आदर सम्मान वहां के सब राज-पुरुषों ने करना प्रारंभ किया कि उसी प्रसंग में महाकवि चंद बरदाई ने भी वैसे ही रावलजी को आशीष दियो कि जैसे वर्तमान काल में प्रत्येक देशी राजस्थानों में चारण और राव आदि स्तुति पाठक दिया करते हैं । रावलजी श्रीसमरसीजी में जो २ मुख्य गुण थे और उनों ने जो २ बड़े २ काम अर्थात् शौर्य किये थे उन सब को उन की प्रशंसा में कवि चंद ने प्रयोग कर के यह बिरदावली कही है । अब इस में यह बात विचारने की है कि कविराजजी ने जो इस रूपक में के-“कलंकिया राय केदार”-जैसे विशेषणों का महाराणाजी श्रीसंग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत होना अनुमान करके रासे के जाली बनने के समय के प्रारंभ का सं० १६४० निश्चय किया है वह इस मूल रूपक के अवलोकन करने से सत्य मालूम होता है कि नहीं । यदि हम कविराजजी के अनुमान को यथार्थ होना भी मान लें परन्तु इस रूपक में-“कलंकिया राव केदार”-आदिकों के साथ ही-“जैचंद समह जिन जुद्ध कीन-” और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ” जैसे स्पष्ट विशेषणों के वाक्यखंडों को हम महाराणा जी श्रीसांगाजी में कैसे घटा सकते हैं । क्या यह बात विद्वानों के कहने की है कि-“जैचंद समह जिन जुद्ध कीन”-और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ”-जैसे स्पष्ट विशेषणों को छोड़ देना-और- “कलंकिया राय केदार”-आदिक को सांगाजी पर घटा कर केवल उन ही तुकों को क्षेपक बताईं होतीं तो भी यह एक प्रकार से कुछ ध्यान में बैठने जैसी बांतें होतीं । हम यह भी नहीं समझ सक्तें हैं कि इस रूपक से सं० १६४० कैसे सिद्ध होता है क्योंकि महाराणाजी श्रीसांगाजी का राज्य समय कविराजजी के मानने के अनुसार सं० १५६५ से सं० १५८४ तक ही और संवत् १६४० का वर्ष महाराणाजी श्री बड़े प्रतापसिंहजी के राज्य समय सं० १६५३ से १६५४ तक के में आता १९२

१७८ उपसंहारिणी टिप्पण । है । रासे की सं० १६३१ । ३२ और १६४५ की लिखित पुस्तकें हमारे पास विद्यमान हैं । तथा अकबर बादशाह ने पृथ्वीराज रासे की कथा अपने दरबारी भाट गंगजी से सं० १६२७ । २८ में सुनी थी कि जिस के वृत्तान्त की एक सं० १६२९ की लिखी हुई चंद छंद वर्णन की महिमा नामक पुस्तक हमको प्राप्त हो चुकी है और उसी के साथ जो समय स० १६४० से १६९० तक का रासे के जाली बनने का अनुमान किया गया है उस समय में मेवाड़ में एक राणारासा नामक ग्रंथ राव दयाल कवि ने बनाया है कि जिस को भी हमने शोध काढ़ा है । इस राणारासे की पुस्तक सं० १६७५ की लिखी हुई से हम ने हमारे पुस्तकालय के लिये एक प्रति करवाई है और हमारी प्रति से बहुत से अन्य भद्रपुरुष प्रतियें करवाते हैं । खैर यह सब बातें तो जाने दीजिये और एक इस छोटी सी बात पर ही ध्यान दीजिए कि रासे की उन सब पुस्तकों के अंत में कि जो मेवाड़ राज की एक पुस्तक से प्रति हुई हैं मूल पुस्तक के लिखने वाले लेखक के लिखे हुए नीचे लिखे छंद प्राप्त होते हैं कि जिन में यत्किंचित वृत्त लिखा हुआ है । यह छंद हम आशा करते हैं कि उन पुस्तकों में भी अवश्य होंगे कि जो एशियाटिक सोसाईटी बंगाल के पुस्तकालय में हैं :- कवित्त ॥ मिलि पंकज गन उदधि । करद कागद कातरनी ॥ कोटि कवी काजलह । कमल कटिकतैं करनी ॥ हितिथि संख्या गुनित । कहै कक्का कवियांने ॥ दृह श्रम लेपन हार । भेद भेदै सोइ जाने ॥ दून कष्ट ग्रन्थ पूरन करय । जन सभ्या दुप नां लहय ॥ पालिये जतन पुस्तक पवित्र । लिपि लेपक बिनती करय ॥ १ ॥ गुन मनियन रस पोइ । चंद कवियन कर दिट्ठिय ॥ छंद गुनीतें तुट्टि । मंद कवि भिन भिन किट्ठिय ॥ देस देस विष्परिय । मेल गुन पार न पावय ॥ उद्दिम करि मेल वत्त । आस बिन अलस आवय ॥ चित्रकूट रान अमरैस नृप । हित श्रीमुप आयस दयौ ॥ गुन बीन बीन कहना उदधि । लपि रासो उद्दिम कियौ ॥ २ ॥ दोहा ॥ लघु दीरघ ओको अधिक । जो कछु अंतर होइ ॥ सो कवियन मुष सुद्धतैं । कहो आप बुधि सोइ ॥ ३ ॥ इन छंदों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि किसी कक्का नामक पुरुष ने मेवाड़राज्य के अधीश बड़े श्री अमरसिंहजी (चित्रकोट रान अमरैस नृप) के आज्ञानुसार राज के पुस्तकालय के लिये उक्त पुस्तक लिखी थी । इन महाराणाजी का राज्य समय कविराजजी के मानने के अनु- सार सं० १६५३ से १६७६ तक का है । जब कि मेवाड़ राज की पुस्तक का उसकी अन्य प्रतियों से सं० १६५३ से १६७६ के बीच में लिखा जाना अनुमान होता है तो फिर इस समय में जाल बनना भला कोई कैसे मान सक्ता है । अब रहा संवत १६७१ की भविष्य बातों का विदित करने वाला दोहा उसके विषय में हमने हमारी संरक्षा के लेखखंड २७ पृष्ठ ३५ में सविस्तर कह दिया है अतएव यहां कुछ अधिक नहीं वर्णन करते हैं ॥ ४ यद्यपि इस महाकाव्य के जाली बनने के अनुमान का प्रश्न तो रीति से किया गया है कि "इस ग्रन्थ में लिखे पृथ्वीराजजी के समय के मनुष्यों के नाम और वृत्त उस समय की मुसलमानी तवारीखो में लिखे हुओं से नहीं मिलते हैं परन्तु जिस प्रकार से उस प्रश्न का निर्णय किया

उपसंहारिणी टिप्पण । १७६ गया है उस से प्रश्नकर्त्ता की प्रतिज्ञा हानि और हेत्वाभास स्वयम् सिद्ध हैं । हमने इस विषय में हमारी लिखी पृथ्वीराज रासे की सारता की अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ १५ और ३७ लेखखंड ११ और २८ और हिन्दी की के पृष्ठ १८ और ३६ और लेखखंड ११ और २८ में बहुत कुछ लिख कर प्रकाश किया है। क्या जितना अंश इस महाकाव्य का मुसलमानी तवारीखों से मिलता हुआ है वह उसके बनाने वाले ने उन तवारीखों को सोलहवीं सदी में पढ कर यह जाल निर्माण किया है? क्या उस समय की हसन निजामी की तवारीख, तबक़ात नासरी, और अबुलफ़िदा, आदि नामक तवारीखों में परस्पर कोई ऐसे विरोध नहीं हैं और क्या वे एक दूसरे से सर्व प्रकार से परम सम्मत हैं? कविराजजी ने स्वयम् यह स्वीकार किया है कि तब- क़ात नासरी ने मनुष्यों के अशुद्ध नाम लिखे हैं और अबुलफ़िदा ने संवत ही नहीं लिखे हैं फिर उनके दोषों से यह महाकाव्य क्योंकर दूषित हो सक्ता है? क्या उक्त मुसलमानी तवारीखों के कर्त्ताओं ने सब वृत्त यथातथ्य लिख कर केवल सत्य ही लिखने और मिथ्या कुछ भी न लिखने का एक भंडा हाथ में लिया है? देखो क्या यह शोक की बात नहीं है कि तबक़ात नासरी का ग्रंथकर्त्ता विचारा स्वयम् कहता है कि जिस वर्ष में पृथ्वीराजजी की अंतिम लड़ाई हुई थी उसमें तौ वह उत्पन्न हुआ था और उसके ३५ वर्ष पीछे वह पहिले ही पहिल हिन्द में आया था, उस ने जो कुछ इस विषय में लिखा है वह उसने एक मनुष्य से सुनकर लिखा है, फिर हम नहीं जानते कि कविराजजी मिनहाज-इ-सिराज जैसे एक भले आदमी को क्यों प्रत्यक्ष प्रमाण की साक्षी में घेरते हैं। हम पृथ्वीराजरासे और उस समय की सब मुसलमानी तवारीखों को एक दृष्टि से देखकर यह कहते हैं कि जिस २ ग्रन्थकर्त्ता ने जो, जितना, और जैसा, देखा और सुना, वह उसने अपनी इच्छा और शैली के अनुसार लिखा है; यदि उन में से किसी की कोई बात हमको अयथार्थ प्रतीत और सिद्ध हो तौ हम उसको अस्वीकार कर. सक्ते हैं, किन्तु हम उनमें से किसी को भी लोर्ड हेस्टिङ्गस के समय में जैसे नन्दकुमार को जाल के अपराध में फांसी की शिक्षा दियी गई है वैसी शिक्षा विद्वानों के हाथ से कदापि नहीं दिलाना चाहते हैं। निदान हम फिर भी प्रसन्नता और विचार पूर्व्वक कह सक्ते हैं कि प्रत्येक ग्रन्थकर्त्ता ने अपने २ ज्ञान के अनुसार ऐतिहासिक वृत्त लिखे हैं चाहे उसमें कोई बात असत्य भी क्यों न हो परन्तु उस असत्य बात के कारण से आदि से अंत पर्यंत कोई ग्रन्थ जाली नहीं हो सक्ता । इस बात के मान लेने में हमको कोई लज्जित होने की भी बात नहीं है कि यह पृथ्वीराज रासा चंद का लिखा हुआ सच्चा है, उसके दो एक समय उसके बड़े बेटे जल्ह के लिखे हुवे हैं और उसमें जो कहीं २ कुछ क्षेपक अंश पीछे से किसी ने मिलाया होगा वह विद्वानों के परीक्षा करने से स्वयम् तरजावेगा। अब तौ कोई बात अड़चल की रही ही नहीं है क्योंकि यह आदि पर्व्व तौ हमने यथाशक्ति संशोधित करके हमारे पाठकों की सेवा में अर्पण कर ही दिया है, कि उसी से हम इस महाकाव्य की अकृत्रिमता की परीक्षा करना प्रारंभ कर सक्ते हैं और प्रति मास में हम यह भी सिद्धान्तकर सक्ते हैं कि यहां तक तौ कुछ जाली अंश है अथवा नहीं । इस बात के जानने से हमारे पाठकों को बहुत प्रसन्नता होगी कि हमको शोध करने से पृथ्वीराजजी और रावलजी श्रीसमरसीजी और महाराणी श्रीपृथाबाईजी के थोडे से खास रुक्के और पट्टे परवाने प्राप्त हुवे हैं कि जिन में वही आनन्द विक्रमी संवत् है कि जो पृथ्वीराज रासे में लिखा हुआ मिलता है । इन सब के फोटोग्राफ हमने एशियाटिक सोसाईटी बंगाल को

१८० उपसंहारिणी टिप्पणी । {|c|} \hline पृथ्वोराजजी, समरसीजो और पृथाबाईजी के खास रुक्के पट्टे परवाने आदि \hline भेंट करने तथा उनकी सत्यता की परीक्षा करने के लिये हमारे स्वदेशी परम प्रसिद्ध विद्वान मित्र राय बहादुर डाक्तर राजा श्रीराजेन्द्रलालजी मित्र ऐल० ऐल० डी०, सी० आई० ई० की सेवा में भेजे हैं । उक्त डाक्तर साहब अकस्मात् रोगग्रस्त हो गये कि जिससे यह हमारे बड़े परिश्रम से शोध किये हुवे लेख उक्त विद्वत् मंडली में प्रवेश नहीं हो सके हैं किन्तु हम को आशा है कि राजा साहब के नैस्थ्य होते ही उक्त लेख सोसार्टी में प्रवेश होकर यह विषय विद्वत् मंडली में छिडेगा । यह विषय अभी हमारा सौंपा हुवा एक महान पुरातत्ववेत्ता विद्वान के हात में है अतएव हम उन लेखों की प्रतियें तथा अपने निज विचारों को प्रकाश नहीं कर सक्ते परंतु इतना तो निःसंदेह कह सक्ते हैं कि अभी तक हम उनको अकृत्रिम समझते हैं और ऐसा समझने को सतर्क सिद्ध भी कर सक्ते हैं । इसके साथ हमको इस कहने में कुछ भी लज्जा नहीं है कि यदि उक्त डाक्तर मित्र, हमारे विद्या-गुरु डाक्तर होर्नली साहब, मिस्टर याऊज साहब और मिस्टर ग्रियरसन साहब, जैसे पक्षपात रहित और सहसा सिद्धान्त न करने वाले पुरातत्ववेत्ता विद्वान उनको अप्रमाणिक सिद्ध कर ग्रहण करेंगे तो हम भी उन्ही से सम्मत होंगे क्योंकि हमको किसी बात का वास्तव में दुराग्रह नहीं है बरुक्त इसमें भी कुछ संदेह नहीं है कि जो कोई अन्य मनुष्य बिना किसी योग्य कारण के हमारे स्वदेश और उसकी विद्या पुस्तकों को दोष दे तो हम उस दशा में उन के एक बड़े कट्टर पक्षकार हैं ॥ अंत में हमारा सब विद्वानों से यही सविनय निवेदन है कि इस महाकाव्य को उस की भले प्रकार परीक्षा कर के पढ़ें और पढावें और जो कहीं उस में कुछ हमारा कहना तथा कोई अनुमानादि का करना अयोग्य प्रतीत हो तो हम को क्षमा करें । यही प्रार्थना हम विशेष कर {|c|} \hline समाप्ति \hline के हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्रीश्यामलदासजी की सेवा में भी करते हैं क्योंकि उनके विचारों और अनुमानों का हमने विशेष कर के एक बलिष्ट भाषा में खंडन कर हमारे स्वदेशाभिमान और उसकी हिन्दी विद्या की संरक्षा कियी है । इस के साथ यह भी वक्तव्य है कि जैसे हम ने इस उपसंहारिणी टिप्पण में इस महाकाव्य के पांच चार विषयों के विषय में अपने विचार प्रकाश किये हैं वैसेही चंद के व्या- करणादि जैसे शेष विषयों के विषय में भी हम यथावकाश लिखेंगे इत्यलम् ॥ मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ।